
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: भ्रष्टाचार के ‘कीचड़’ में ‘कम दागदार’ होने की जंग, जनता ने अनिल दुबे को चुना ‘सबसे कम भ्रष्टाचारी’ प्रमुख
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- लोकतंत्र की विडंबना: जहाँ ‘कम लूट’ ही विकास का सबसे बड़ा पैमाना बन गई।
- कमीशनखोरी के समंदर में अनिल दुबे की ‘क्लीन चिट’: सबसे कम भ्रष्टाचारी होने का मिला तमगा।
- सिस्टम को तमाचा: ₹100 में ₹98 की बंदरबांट, फिर भी अनिल दुबे ‘सबसे कम’ भ्रष्ट!
- बस्ती मंडल की शर्मनाक हकीकत: विकास के भक्षक ही बने रक्षक, जनता ने चुना ‘कम दागदार’ चेहरा।
- नेताओं की ‘रेट लिस्ट’ में कुदरहा प्रमुख सबसे नीचे, क्या यही है आज की सुशासन वाली राजनीति?
- बीडीसी खरीद से लेकर कमीशन तक का खेल, बस्ती की पंचायत व्यवस्था में ईमानदारी का ‘अकाल’।
बस्ती। उत्तर प्रदेश की राजनीति और पंचायत राज व्यवस्था में भ्रष्टाचार इस कदर जड़ें जमा चुका है कि अब ‘ईमानदारी’ शब्द शब्दकोशों तक सीमित रह गया है। जनपद बस्ती के कुदरहा ब्लॉक से आई एक ताजा रिपोर्ट ने पूरे प्रशासनिक और राजनैतिक अमले को आईना दिखा दिया है। कुदरहा के ब्लॉक प्रमुख अनिल दुबे को जनता की रायशुमारी में जिले का ‘सबसे कम भ्रष्टाचारी’ ब्लॉक प्रमुख घोषित किया गया है।पंचायत व्यवस्था में भ्रष्टाचार अब कोई ‘खबर’ नहीं, बल्कि एक ‘परंपरा’ बन चुका है। लेकिन बस्ती जनपद के कुदरहा ब्लॉक से एक ऐसी खबर आई है, जो लोकतंत्र के चेहरे पर तमाचा भी है और व्यवस्था का कड़वा सच भी। कुदरहा के ब्लॉक प्रमुख अनिल दुबे को जनता ने ‘सबसे कम भ्रष्टाचारी’ प्रमुख के खिताब से नवाजा है।
यह खबर जितनी अनिल दुबे के समर्थकों के लिए खुशी वाली है, उससे कहीं ज्यादा व्यवस्था के लिए शर्मनाक है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि जनता अब जनप्रतिनिधियों से पूर्ण ईमानदारी की उम्मीद छोड़ चुकी है और केवल इस बात में संतुष्टि ढूंढ रही है कि ‘कम से कम किसने कम लूटा’।
सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग, जनता ने उधेड़ी बखिया
इस पूरे मामले की शुरुआत सोशल मीडिया पर हुई एक रायशुमारी से हुई। सवाल सीधा था— ‘बस्ती में सबसे कम भ्रष्टाचार वाला ब्लॉक प्रमुख कौन है?’ हैरानी की बात यह रही कि जनता ने किसी और ब्लॉक प्रमुख का नाम तक नहीं लिया। ‘ग्राम प्रधान संगठन’ ने तो अनिल दुबे के नाम पर मुहर लगाई ही, साथ ही आम जनता ने भी माना कि अन्य प्रमुखों की तुलना में दुबे जी का हाथ ‘मलाई’ पर थोड़ा कम रहा है। हालांकि, कुछ लोगों ने तंज कसते हुए इसे ‘अंधों में काना राजा’ वाली स्थिति करार दिया है।
ईमानदारी नहीं, ‘कम लूट’ का मुकाबला
हैरानी की बात यह है कि आज के दौर में जनता किसी प्रतिनिधि को ‘ईमानदार’ होने का प्रमाण पत्र नहीं दे रही, बल्कि इस बात पर मतदान कर रही है कि “किसने सबसे कम लूटा?” सोशल मीडिया पर चली एक रायशुमारी में जब जनता से पूछा गया कि जिले में सबसे कम भ्रष्ट कौन है, तो कुदरहा प्रमुख का नाम सबसे ऊपर आया। यह उपलब्धि अनिल दुबे के लिए गर्व का विषय हो सकती है, लेकिन यह समाज के लिए शर्म की बात है कि हमारे मानक ‘शून्य भ्रष्टाचार’ से गिरकर ‘थोड़े भ्रष्टाचार’ पर टिक गए हैं।
₹100 का काम, ₹2 का विकास: भ्रष्टाचार का गणित
इस रिपोर्ट के दौरान जनता का दर्द छलक कर सामने आया। चर्चा के दौरान यह कड़वा सच उजागर हुआ कि:
- कमीशनखोरी की पराकाष्ठा: आज के दौर में ₹100 के बजट में से केवल ₹2 ही धरातल पर काम में लगते हैं, बाकी ₹98 का बंदरबांट ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक के गलियारों में हो जाता है।
- निवेश के रूप में चुनाव: स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग का कहना है कि प्रमुख का चुनाव अब जनसेवा नहीं, बल्कि एक ‘बढ़िया इन्वेस्टमेंट’ बन गया है। भ्रष्टाचार की नींव चुनाव के वक्त बीडीसी (BDC) सदस्यों को खरीदने से ही शुरू हो जाती है। जो लाखों-करोड़ों खर्च करके कुर्सी पर बैठता है, वह सबसे पहले अपनी ‘लागत’ वसूलने में लग जाता है।
कमीशनखोरी की बुनियाद पर खड़ा सिस्टम
जनता की इस राय पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए स्थानीय लोगों और जागरूक नागरिकों ने व्यवस्था की बखिया उधेड़ दी है।
- कमीशन का खेल: चर्चा आम है कि ब्लॉक प्रमुख का चुनाव सेवा के लिए नहीं, बल्कि ‘कमाई’ के लिए लड़ा जाता है। नींव ही भ्रष्टाचार के ईंट-गारे से रखी जाती है।
- बंदरबांट का गणित: कहा जा रहा है कि ₹100 के काम में महज ₹2 धरातल पर लगता है और बाकी ₹98 की बंदरबांट ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक हो जाती है।
- बर्बादी के जिम्मेदार: स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिला पंचायत अध्यक्ष, प्रमुख और प्रधानों की तिकड़ी ने विकास के नाम पर जिले को लूट का अड्डा बना दिया है।
विकास के ‘भक्षक’ बने ‘रक्षक’
रायशुमारी में लोगों ने खुलकर आरोप लगाया कि जिले के विकास को बर्बाद करने वाले कोई और नहीं, बल्कि जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख और ग्राम प्रधान ही हैं। मीडिया और जनता के बीच यह चर्चा आम है कि बस्ती जनपद में एक भी ऐसा जनप्रतिनिधि नहीं बचा, जो अपनी पंचायत को एक ‘मॉडल पंचायत’ के रूप में पेश कर सके।
सत्ता बनाम विपक्ष: जनता के बीच यह धारणा घर कर गई है कि सत्ता पक्ष के नेताओं के पास लूट के कई द्वार खुले हैं, जबकि विपक्ष के पास केवल अपनी ‘निधियां’ ही लूट का एकमात्र जरिया बची हैं।
व्यवस्था पर लगा प्रश्नचिह्न
अनिल दुबे को मिले इस ‘खिताब’ ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
- क्या अब राजनीति में ‘कम भ्रष्ट’ होना ही सबसे बड़ी योग्यता है?
- क्या प्रशासन इतना पंगु हो चुका है कि वह भ्रष्टाचार को रोकने के बजाय उसे ‘कम या ज्यादा’ के पैमाने पर देख रहा है?
- क्या ‘आज का आतंक’ और ‘कमीशनखोरी’ ही उत्तर प्रदेश की पंचायत व्यवस्था की नई पहचान है?
रिपोर्ट में यह भी साफ झलकता है कि भ्रष्टाचार के इस ‘मॉडल’ में सत्ता पक्ष और विपक्ष के अपने-अपने हित हैं। सत्ता पक्ष के पास लूट के कई स्रोत हैं, तो विपक्ष अपनी निधियों के सहारे अपनी जेबें गरम करने में जुटा है। आलम यह है कि पूरे जिले में एक भी ऐसा जनप्रतिनिधि उभरकर सामने नहीं आया, जिसे ‘आदर्श’ माना जा सके।
बड़ा सवाल: > क्या ‘कम भ्रष्ट’ होना ही अब राजनीति में श्रेष्ठता का नया पैमाना है? अगर मीडिया और जनता ‘कम भ्रष्टाचार’ को उपलब्धि मान रही है, तो समझ लीजिए कि उत्तर प्रदेश की पंचायत व्यवस्था वेंटिलेटर पर है, जहाँ ईमानदारी दम तोड़ चुकी है।
निष्कर्ष: कुदरहा प्रमुख अनिल दुबे को जनता ने भले ही ‘राहत’ दी हो, लेकिन यह रिपोर्ट बस्ती मंडल के समूचे प्रशासनिक तंत्र और जनप्रतिनिधियों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। यह जीत अनिल दुबे की नहीं, बल्कि उस हताश जनता की हार है जिसने मान लिया है कि भ्रष्टाचार तो होगा ही, बस हम कम वाले को चुन लें।
















