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भ्रष्टाचार की ‘प्रयोगशाला’ बना स्वास्थ्य विभाग: अपनों को रेवड़ियां बांटने वाले ‘सफेदपोश’ लुटेरों पर कब गिरेगा गाज?

स्वास्थ्य विभाग का 'जेनेटिक करिश्मा': एक ही छत के नीचे पैदा हुए चार-चार सरकारी टेक्नीशियन! धन्य है वह पिता और धन्य है विभाग: पूरे कुनबे को ही बना दिया 'लैब टेक्नीशियन'।

अजीत मिश्रा (खोजी)

🎯भ्रष्टाचार की ‘जुगाड़-शाला’: जहाँ काबिलियत नहीं, ‘कुनबा’ काम आता है!🎯

  • भ्रष्टाचार की अनोखी ‘लैब’: जहाँ योग्यता का नहीं, सिर्फ ‘खास डीएनए’ का टेस्ट होता है। नौकरी नहीं, ‘पुश्तैनी जागीर’: जब विभाग ने मेधावियों को छोड़ अपनों पर लुटाया प्यार।
  • सिस्टम को लकवा या अफसरों की मिलीभगत? 25 साल बाद जागी जांच की ‘कुंभकर्णी’ नींद। भ्रष्टाचार का ‘सफेदपोश’ चेहरा: स्वास्थ्य महकमे में रेवड़ियों की तरह बांटी गईं नौकरियां।
  • मेधावियों के अरमानों की ‘बलि’: रसूखदारों के बच्चों के लिए नीलाम हुआ सिस्टम। घोटाले के ‘मगरमच्छ’ कब आएंगे गिरफ्त में? सिर्फ छोटी मछलियों पर जाल फेंकना बंद करे शासन।

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश दिनांक: 14 अप्रैल, 2026

उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग अक्सर अपनी ‘चमत्कारी’ शक्तियों के लिए जाना जाता है। कभी यहाँ बिना अस्पताल के दवाइयां बंट जाती हैं, तो कभी बिना डॉक्टर के ऑपरेशन हो जाते हैं। लेकिन हालिया खुलासा तो चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। वर्ष 2001 और 2007 की लैब टेक्नीशियन भर्ती में विभाग ने एक ऐसी ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग’ का नमूना पेश किया है कि विज्ञान भी शर्म से पानी-पानी हो जाए। प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ योग्यता को नहीं, बल्कि ‘जुगाड़’ और ‘वंशवाद’ को तवज्जो दी गई। वर्ष 2001 और 2007 में हुई लैब टेक्नीशियन भर्ती में हुए महाघोटाले की परतें अब खुलने लगी हैं। ताज्जुब की बात यह है कि एक ही पिता की चार-चार संतानों को लैब टेक्नीशियन बना दिया गया। क्या यह महज इत्तेफाक है या फिर सिस्टम की मिलीभगत से रची गई एक सोची-समझी साजिश?

⚙️नियमों की धज्जियां, भ्रष्टाचार का बोलबाला

स्वास्थ्य महानिदेशालय ने सोमवार को सभी मंडलीय अपर निदेशकों से रिकॉर्ड तलब किए हैं। सवाल यह उठता है कि दो दशकों तक यह फाइलें किन अलमारियों में धूल फांक रही थीं?

  • 2001 की भर्ती: 211 पद।
  • 2007 की भर्ती: 572 पद।

इन दोनों ही भर्तियों में धांधली के ऐसे कारनामे सामने आए हैं, जो प्रदेश की पारदर्शी कार्यप्रणाली के दावों पर करारा तमाचा हैं।

⚙️कुर्सी पर बैठे ‘जिम्मेदारों’ का रटा-रटाया राग

अपर मुख्य सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, अमित कुमार घोष का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। लेकिन जनता पूछ रही है—आखिर कब? निदेशक (पैरामेडिकल) डॉ. अंजू अग्रवाल ने मंडलीय निदेशकों को पत्र भेजकर चयनित लैब टेक्नीशियनों के नियुक्ति पत्र, सेवा पुस्तिका और प्रमाणपत्रों की प्रतियां मांगी हैं।

💰बड़ा सवाल: क्या विभाग उन अधिकारियों पर भी नकेल कसेगा जिन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर इन नियुक्तियों पर हस्ताक्षर किए? या फिर हमेशा की तरह छोटी मछलियों को फंसाकर मगरमच्छों को छोड़ दिया जाएगा?

⚙️मेधावियों का गला घोंटकर अपनों को ‘उपहार’

यह सिर्फ एक भर्ती घोटाला नहीं है, बल्कि उन हजारों योग्य युवाओं के भविष्य के साथ किया गया खिलवाड़ है, जो दिन-रात मेहनत कर रहे थे। एक ही परिवार के चार सदस्यों का चयन होना साफ दर्शाता है कि उस वक्त मेरिट लिस्ट लखनऊ के दफ्तरों में नहीं, बल्कि रसूखदारों के घरों में तैयार की गई थी।

⚙️एक ही चिराग के चार-चार उजाले!

धन्य हैं वे पिता और धन्य है वह विभाग, जिसने एक ही परिवार की चार-चार संतानों के भीतर ‘लैब टेक्नीशियन’ बनने वाली दैवीय प्रतिभा को पहचान लिया। प्रदेश के हजारों बेरोजगार युवा किताबों में आंखें फोड़ते रह गए और इधर एक ही छत के नीचे पूरा का पूरा ‘टेक्नीशियन कुनबा’ तैयार हो गया। इसे ‘भाई-भतीजावाद’ कहना तो इस कला का अपमान होगा; यह तो दरअसल ‘पारिवारिक स्वास्थ्य सेवा योजना’ थी, जिसे विभाग ने गुपचुप तरीके से लागू कर दिया था।

⚙️जांच की कछुआ चाल और फाइलों का ‘वनवास’

2001 और 2007 की धांधली पर 2026 में जांच बैठना यह दर्शाता है कि हमारा सिस्टम कितना ‘धैर्यवान’ है। पूरे 25 साल तक फाइलें शायद किसी सरकारी दफ्तर के कोने में योग साधना कर रही थीं। अब जब घोटाले की दुर्गंध बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो साहबान कह रहे हैं—”जांच की जाएगी, दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” सुनकर हंसी आती है! 25 सालों में तो कई ‘मुजरिम’ रिटायर होकर पेंशन का आनंद ले रहे होंगे और कई तो परलोक सुधार गए होंगे। अब क्या विभाग उनके स्वर्ग या नर्क के पते पर नोटिस भेजेगा?

⚙️सिस्टम के ‘सफेदपोश’ जादूगर

इस पूरे खेल के असली जादूगर वे अधिकारी हैं, जिन्होंने इन नियुक्तियों पर मुहर लगाई। आखिर कौन सा ऐसा ‘चश्मा’ पहनकर ये कॉपियां जांची गई थीं कि इन्हें पूरी मेरिट लिस्ट में सिर्फ एक ही परिवार के नाम नजर आए?

  • नियम: ताक पर।
  • योग्यता: कचरे के डिब्बे में।
  • नैतिकता: कोमा में।

अपर मुख्य सचिव से लेकर निदेशक तक, सब अब ‘कड़ी कार्रवाई’ का राग अलाप रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि जब तक इन ‘सफेदपोशों’ की संपत्ति की जांच नहीं होगी और इन्हें सलाखों के पीछे नहीं डाला जाएगा, तब तक ऐसी जांचें सिर्फ रद्दी के ढेर को बढ़ाने का काम करेंगी।

🔥 मेधावियों के सपनों की सामूहिक हत्या

यह सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उन हजारों मेधावी छात्रों के सपनों की ‘सामूहिक हत्या’ है, जिनके हिस्से की नौकरी किसी रसूखदार की औलाद ने छीन ली। स्वास्थ्य विभाग की यह ‘भ्रष्टाचार प्रयोगशाला’ अब जवाब चाहती है।

क्या यह जांच वाकई किसी नतीजे तक पहुंचेगी या फिर इसे भी किसी ‘अज्ञात ठंडे बस्ते’ में विसर्जित कर दिया जाएगा? बस्ती मंडल की जनता और प्रदेश का युवा टकटकी लगाए देख रहा है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ का बुलडोजर इन भ्रष्ट नियुक्तियों पर कब चलता है।

✍️बस्ती मंडल समेत पूरे प्रदेश की निगाहें अब इस जांच पर टिकी हैं। अगर योगी सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो इन ‘फर्जी’ टेक्नीशियनों और इनके आकाओं को जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए।✍️ – ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल।

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