
अजीत मिश्रा (खोजी)
ब्यूरो रिपोर्ट: भ्रष्टाचार की खुदाई और मौत का “डेथ ट्रैप”
बांसी (सिद्धार्थनगर) | मंडल: बस्ती, उत्तर प्रदेश
- सिद्धार्थनगर में बवाल: रेलवे प्रोजेक्ट के नाम पर ‘डेथ ट्रैप’ बना पोखरा, ग्रामीणों ने खोला ठेकेदारों और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा!
- रेलवे ठेकेदारों की मनमानी: मिट गया पोखरे का अस्तित्व, खतरे में अस्पताल की दीवार; अधिकारी बोले- ‘हमें जानकारी नहीं’
- रेलवे ठेकेदारों की ‘गुंडागर्दी’ या प्रशासन की मिलीभगत? आबादी के बीच खोद दिया 20 फीट गहरा मौत का कुआं!
बांसी (सिद्धार्थनगर)। विकास के नाम पर विनाश का खेल कैसे खेला जाता है, इसका जीता-जागता और खौफनाक उदाहरण सिद्धार्थनगर जिले के मिठवल विकास क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। खलीलाबाद-बलरामपुर-बहराइच रेल परियोजना के नाम पर रेलवे ठेकेदारों ने नियमों को ताक पर रखकर बांसी के एक रिहायशी इलाके में स्थित पोखरे को ‘मौत के जाल’ में तब्दील कर दिया है।
अंधाधुंध और अवैध खनन का आलम यह है कि पोखरे को 20 फीट से भी ज्यादा गहरा खोद दिया गया है, जिससे न केवल मवेशियों और बच्चों की जान पर बन आई है, बल्कि पास में स्थित सरकारी अस्पताल के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है।
अस्पताल पर मंडराया खतरा: जिम्मेदार कौन?
पोखरे के ठीक बगल में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थित है। ठेकेदारों की लालच की मशीनें इस कदर चली हैं कि अस्पताल की बाउंड्री वॉल और मुख्य इमारत के ढहने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि यदि कल को अस्पताल की बिल्डिंग गिरती है या कोई मासूम इस गहरी खाई में समा जाता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
धोखे से लिए गए हस्ताक्षर: प्रधानों का आरोप
ग्राम प्रतिनिधि किशन लाल ने इस पूरे मामले में एक बड़े घोटाले और साजिश की ओर इशारा किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि:
- वर्ष 2023 में ब्लॉक स्तर पर सभी प्रधानों से यह कहकर हस्ताक्षर कराए गए थे कि नियमों के तहत सीमित मात्रा में मिट्टी निकाली जाएगी।
- लेकिन धरातल पर ठेकेदारों ने ‘मिट्टी के माफिया’ की तरह व्यवहार करते हुए मानकों की धज्जियां उड़ा दीं।
- ग्रामीणों द्वारा विरोध करने पर ठेकेदार अपनी हनक दिखाते हैं और काम बंद करने को तैयार नहीं हैं।
प्रशासन की ‘अनभिज्ञता’ या जानबूझकर अनदेखी?
हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा अवैध खनन खुलेआम हो रहा है और जिम्मेदार अधिकारी नींद में हैं। जब इस संबंध में एडीएम एफआर गौरव श्रीवास्तव से सवाल किया गया, तो उनका जवाब रटा-रटाया था— “मुझे इसकी जानकारी नहीं है, किसी को भेजकर दिखवाता हूँ।” प्रशासन का यह सुस्त रवैया ठेकेदारों के हौसलों को और बुलंद कर रहा है।
“क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? क्या रेलवे जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की आड़ में ठेकेदारों को आम जनता की जान से खेलने का लाइसेंस मिल गया है? बस्ती मंडल का यह इलाका आज चीख-चीख कर इंसाफ मांग रहा है। यदि तत्काल इस अवैध खनन को नहीं रोका गया और दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो ग्रामीण उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।”












