

🚨🚨🚨 MEGA BIG BREAKING | “सहारनपुर से उठा सियासी भूचाल—‘RSS दुश्मन नहीं’, पसमांदा मंच का बड़ा ऐलान; अपने ही समाज के लोगों से सावधान रहने की नसीहत, 2027 से पहले बदलते समीकरणों के संकेत!” 🚨🚨🚨
सहारनपुर।
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सियासी सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं और पश्चिमी यूपी का महत्वपूर्ण जिला सहारनपुर एक बार फिर बड़े राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनता नजर आ रहा है। इसी बीच हिंदुस्तानी पसमांदा मंच की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने न सिर्फ स्थानीय बल्कि प्रदेश स्तर की राजनीति में हलचल मचा दी है। मंच के राष्ट्रीय प्रवक्ता मोहम्मद रिजवान अंसारी द्वारा दिए गए बयानों ने कई स्थापित धारणाओं को चुनौती देते हुए एक नए राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को जन्म दिया है, जिसकी गूंज अब दूर तक सुनाई दे रही है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अंसारी ने सबसे पहले पसमांदा समाज की स्थिति और उसकी भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि पसमांदा समाज वह मेहनतकश वर्ग है जिसने सदियों से अपने हुनर, श्रम और कारीगरी के माध्यम से देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। चाहे वह हस्तशिल्प हो, छोटे उद्योग हों या श्रम आधारित कार्य—हर क्षेत्र में इस वर्ग की भूमिका अहम रही है। इसके बावजूद, यह समाज लंबे समय से सामाजिक भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन और राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि तथाकथित सेक्युलर दलों ने पसमांदा समाज को केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन उसके वास्तविक उत्थान के लिए कभी गंभीर प्रयास नहीं किए गए।
अंसारी ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा कि अब समय आ गया है कि पसमांदा समाज अपनी अलग पहचान स्थापित करे और अपने अधिकारों के लिए खुद आवाज उठाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह संघर्ष केवल सामाजिक नहीं बल्कि राजनीतिक भी है, क्योंकि बिना राजनीतिक हिस्सेदारी के किसी भी वर्ग का समुचित विकास संभव नहीं है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आने वाले समय में पसमांदा समाज अपने हक के लिए संगठित होकर एक नई दिशा में आगे बढ़ेगा, जो पारंपरिक राजनीति को चुनौती दे सकता है।
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का सबसे चर्चित और विवादित हिस्सा वह रहा, जब अंसारी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि वर्षों से RSS के बारे में जो धारणा मुस्लिम समाज के बीच बनाई गई है, वह पूरी तरह सही नहीं है। उनके अनुसार, RSS को मुसलमानों का दुश्मन बताना एक गलत नैरेटिव है, जिसे जानबूझकर फैलाया गया है। उन्होंने कहा कि RSS एक ऐसा संगठन है जो राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की बात करता है और इसे केवल एक पक्षीय नजरिए से देखना उचित नहीं है।
अंसारी के इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि अब तक मुस्लिम समाज के बड़े हिस्से में RSS को लेकर एक अलग ही धारणा बनी हुई थी। ऐसे में पसमांदा मंच के राष्ट्रीय प्रवक्ता का यह बयान एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। यह बयान न केवल पारंपरिक राजनीतिक सोच को चुनौती देता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पसमांदा समाज अब अपने मुद्दों को लेकर स्वतंत्र सोच विकसित कर रहा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में अंसारी ने मुस्लिम धर्मगुरुओं और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर भी खुलकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ धर्मगुरु और संगठन मुस्लिम समाज को गुमराह करने का काम कर रहे हैं और उन्हें वास्तविक मुद्दों से भटका रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को RSS से डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपने ही समाज के उन लोगों से सावधान रहने की जरूरत है जो उन्हें गलत दिशा में ले जा रहे हैं।
यह बयान अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे तौर पर मुस्लिम नेतृत्व और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल खड़ा करता है। अंसारी के इस बयान को कई लोग एक साहसिक कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे विवादित भी बता रहे हैं। लेकिन इतना जरूर है कि इसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जो आने वाले समय में और तेज हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पसमांदा मंच का यह रुख केवल सामाजिक जागरूकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक रणनीति भी नजर आती है। 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह बयान काफी मायने रखता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। यदि पसमांदा समाज एक अलग राजनीतिक पहचान के साथ उभरता है, तो इससे चुनावी समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, खासकर सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों में पसमांदा समाज की अच्छी-खासी आबादी है। ऐसे में यदि यह वर्ग संगठित होकर एक नई राजनीतिक दिशा में आगे बढ़ता है, तो इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। यह भी माना जा रहा है कि पसमांदा मंच का यह कदम पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति को कमजोर कर सकता है और नए गठबंधनों और रणनीतियों को जन्म दे सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या पसमांदा मंच आने वाले चुनावों में “गेम चेंजर” की भूमिका निभाएगा? क्या मुस्लिम समाज के भीतर एक नई राजनीतिक धारा का उदय हो रहा है? और क्या यह बदलाव उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा को बदल सकता है?
फिलहाल, इतना तो तय है कि सहारनपुर में हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है और इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पसमांदा मंच अपने एजेंडे को किस तरह आगे बढ़ाता है और अन्य राजनीतिक दल इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
इस घटनाक्रम ने यह भी साफ कर दिया है कि अब राजनीति केवल पारंपरिक मुद्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक पहचान, प्रतिनिधित्व और आत्मसम्मान जैसे मुद्दे भी केंद्र में आ चुके हैं। ऐसे में पसमांदा मंच का यह कदम एक बड़े बदलाव की शुरुआत माना जा सकता है, जो आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।
✍ रिपोर्ट: एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
ब्यूरो प्रमुख – हलचल इंडिया न्यूज़
📞 संपर्क: 8217554083
📢 खबर, विज्ञापन, विज्ञप्ति एवं सूचना हेतु संपर्क करें


















