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भारतीय भाषा परिवार सम्मेलन भारतीय भाषाओं के गौरव और संस्कृति का जीवंत उदाहरण हरिद्वार

रुचि डोलिया जिला संवाददाता हरिद्वार

 भारतीय भाषा परिवाIMG 20260129 WA00281र सम्मेलन भारतीय भाषाओं के गौरव और संस्कृति का जीवंत उदाहरण हरिद्वार

भारतीय भाषा परिवार सम्मेलन के विषय में डाश्री रविंद्र कुमार जी ने जानकारी देते हुए बतायाहरिद्वार के प्रसिद्ध श्री भगवान दास आदर्श संस्कृत विद्यालय में आयोजित भारतीय भाषा परिवार सम्मेलन भारतीय भाषाओं के गौरव और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत उदाहरण बना। इस सम्मेलन में देशभर से पधारे हिंदी तथा संस्कृत के प्रखर विद्वानों, शिक्षाविदों और भाषा प्रेमियों ने भारतीय भाषाओं की गरिमा, उनके ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान वैश्विक भूमिका पर गहन विचार साझा किए। वातावरण पूरी तरह से भाषा, संस्कृति और राष्ट्रबोध से ओतप्रोत रहा। प्रोफेसर श्री वेद प्रकाश उपाध्याय ने अपने विचारों में यह स्पष्ट किया कि हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन की संवाहक है। प्रोफेसर यशवीर सिंह ने कहा हिंदी के माध्यम से भारत की आत्मा अभिव्यक्त होती है। वक्ताओं ने बताया कि आज हिंदी न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुकी है। विश्व के अनेक देशों में हिंदी पढ़ाई और बोली जा रही है, आचार्य श्री आनंद भूषण ने कहा भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार हो रहा है और भारत की सॉफ्ट पावर सशक्त हो रही है।सम्मेलन में संस्कृत भाषा के महत्व पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया। विद्वानों ने कहा कि संस्कृत देश की प्राचीनतम भाषा होने के साथ-साथ हमारी ज्ञान परंपरा, दर्शन, विज्ञान और संस्कृति की मूल आधारशिला है। वेद, उपनिषद, पुराण और अनेक शास्त्र संस्कृत में रचित हैं, जो भारतीय चिंतन की अमूल्य धरोहर हैं। डा श्रवण कुमार शर्मा ने कहा संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि आज भी इसकी प्रासंगिकता उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भाषा तार्किक, वैज्ञानिक और अनुशासित संरचना का उत्कृष्ट उदाहरण है।वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि हिंदी और संस्कृत एक-दूसरे की पूरक हैं। प्रोफेसर श्री यशवीर सिंह अध्यक्ष प्रबंध समिति ने कहा हिंदी ने संस्कृत से शब्द, भाव और संस्कार ग्रहण किए हैं, जिससे हिंदी की अभिव्यक्ति और भी समृद्ध हुई है। यदि इन दोनों भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन किया जाए, तो भारतीय संस्कृति की जड़ें और अधिक मजबूत होंगी। नई पीढ़ी को अपनी भाषाओं से जोड़ना समय की आवश्यकता है, ताकि वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझ सकें और उस पर गर्व कर सकें|सम्मेलन के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर आया कि भारतीय भाषाएं केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान, संस्कार और सभ्यता की प्रतीक हैं। हिंदी और संस्कृत के उत्थान से ही भारतीय संस्कृति का संरक्षण संभव है। डॉ आलोक सेमवाल तथा डॉक्टर कृष्ण चंद्र शर्मा ने कहायह सम्मेलन भाषा चेतना को जागृत करने वाला और राष्ट्र के सांस्कृतिक भविष्य के लिए प्रेरणादायक सिद्ध हुआ। इस अवसर पर प्रोफेसर श्री यशवीर सिंह अध्यक्ष प्रबंध समिति प्रोफेसर श्रीनिवास बरखेड़ी डॉ रविंद्र कुमार प्रभारी आचार्य प्रोफेसर यशवीर सिंह प्रोफेसर वेद प्रकाश उपाध्याय प्रोफेसर श्रवण कुमार डॉक्टर आनंद भारद्वाज प्रोफेसर मनोज किशोर पंत शाहिद भारी संख्या में हिंदी भाषा तथा संस्कृत के प्रखर विद्वान सम्मेलन में अपने विचार साझा कर रहे थे कार्यक्रम में अनेको उच्च अधिकारी तथा विशिष्ट तथा प्रखर विद्वान उपस्थित थे

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