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गाँव-गाँव सुलग रही मौत की भट्टियां: युवाओं की रगों में घोला जा रहा कच्ची शराब का जहर!

वर्दी की ओट में मौत का व्यापार: परशुरामपुर पुलिस की मेहरबानी या माफियाओं की मनमानी?

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। परशुरामपुर: खाकी की ‘मेहरबानी’ या माफियाओं की मनमानी? कब थमेगा मौत का यह तांडव।।

बस्ती। जिले के ईमानदार और सख्त पुलिस कप्तान डॉ. यशवीर सिंह की कार्यशैली एक तरफ अपराधियों में खौफ पैदा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ परशुरामपुर थाना क्षेत्र के ‘खाकीधारी’ उनके दावों और छवि पर कालिख पोतने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। परशुरामपुर और छावनी क्षेत्र में वर्षों से जड़ जमाए अवैध कच्ची शराब के माफिया आज भी बेखौफ होकर ‘जहर’ परोस रहे हैं, और सवाल यह उठता है कि आखिर इन मौत के सौदागरों को किसका संरक्षण प्राप्त है?

दिखावे की कार्रवाई और रस्म-अदायगी

ग्रामीणों का आरोप है कि जब भी दबाव बढ़ता है, पुलिस टीम पहुंचती है, कुछ लहन नष्ट करती है और भट्टियां तोड़कर ‘फोटो खिंचवा’ लेती है। लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है। मुख्य माफिया कभी हाथ नहीं आते, और चंद दिनों बाद वही भट्टियां फिर से धधकने लगती हैं। क्या यह पुलिस की विफलता है या फिर सोची-समझी मिलीभगत? क्या ‘लहन नष्ट’ करना केवल एक कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया है?

सीमा विवाद का बहाना और माफियाओं का ‘सिल्वर स्पून’

हैरानी की बात यह है कि जब भी ग्रामीण अवैध शराब की शिकायत करते हैं, परशुरामपुर पुलिस ‘बॉर्डर का मामला’ बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती है। सूत्रों की मानें तो पुलिस और माफियाओं के बीच ‘मासिक वसूली’ का एक ऐसा तंत्र विकसित हो चुका है, जिसने कानून के हाथों में बेड़ियां डाल दी हैं। आलम यह है कि शिकायत करने वालों के नाम माफियाओं तक पहुंच जाते हैं, जिससे जनता अब पुलिस को सूचना देने से भी कतराने लगी है।

युवाओं का भविष्य और टूटते परिवार

यह केवल शराब का अवैध धंधा नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी को बर्बाद करने की साजिश है। सस्ती और आसानी से उपलब्ध इस जहरीली शराब ने क्षेत्र के युवाओं को नशे की लत में झोंक दिया है। कई परिवार उजड़ चुके हैं, लेकिन परशुरामपुर थाने के ‘जिम्मेदार’ कुंभकर्णी नींद में सोए हैं। क्या पुलिस को किसी बड़ी अनहोनी या जहरीली शराब से होने वाली सामूहिक मौतों का इंतजार है?

कप्तान की साख पर बट्टा लगाते मातहत

एसपी डॉ. यशवीर सिंह की छवि एक निष्पक्ष और भ्रष्टाचार विरोधी अधिकारी की है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि अवैध शराब के धंधे में संलिप्त पुलिसकर्मियों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि कप्तान के आदेशों का जमीन पर असर क्यों नहीं दिख रहा?

बड़ा सवाल: क्या परशुरामपुर पुलिस के इन दागदार चेहरों पर कार्रवाई होगी? क्या उन माफियाओं (जैसे- दुईज, धीरेंद्र, विनोद, कालू, बैरहा आदि) पर शिकंजा कसा जाएगा जो सरेआम कानून को चुनौती दे रहे हैं?

निष्कर्ष: अब ‘जीरो टॉलरेंस’ दिखाने का वक्त है

अब समय आ गया है कि केवल भट्टियां न तोड़ी जाएं, बल्कि उस ‘सिस्टम’ को तोड़ा जाए जो इन भट्टियों को ईधन दे रहा है। अगर समय रहते परशुरामपुर पुलिस की इस लापरवाही और मिलीभगत पर नकेल नहीं कसी गई, तो यह न केवल जनता के विश्वास की हत्या होगी, बल्कि जिले की कानून-व्यवस्था के लिए एक बड़ा धब्बा साबित होगा।

जनता की मांग है:  भ्रष्ट पुलिसकर्मियों की तत्काल बर्खास्तगी।

चिन्हित शराब माफियाओं पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई।

बॉर्डर क्षेत्रों में नियमित और निष्पक्ष छापेमारी।

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