
सिपाही जी भी अरबपति हैं: वर्दी के साये में ‘सफेद मौत’ का काला साम्राज्य
लेखक: अजीत मिश्रा (खोजी)
कानपुर। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? कानपुर में जो खुलासा हुआ है, उसने न केवल पुलिस विभाग को शर्मसार किया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि देश के भीतर बैठा ‘नार्को-सिंडिकेट’ किसी विदेशी आतंकवाद से कम घातक नहीं है। यहाँ सरहद पार से आने वाली गोलियों से ज्यादा खतरनाक वो ‘इमोजी’ और ‘मिस कॉल’ हैं, जो पुलिसिया दफ्तरों से नशा तस्करों के मोबाइल तक पहुँचती हैं।
कोडवर्ड का खेल: एक इमोजी और तीन मिस कॉल
जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं हैं। पुलिस की रेड (छापेमारी) पड़ने वाली होती, उससे ठीक पहले एक दरोगा और तीन सिपाही सक्रिय हो जाते थे। व्हाट्सप्प पर एक खास ‘इमोजी’ भेजना या ‘तीन बार मिस कॉल’ करना—ये तस्करों के लिए भागने का ग्रीन सिग्नल था। विभाग की गोपनीयता को चंद रुपयों के लिए नीलाम करने वाले इन ‘खाकीधारियों’ ने नशे के सौदागरों के लिए अभेद्य सुरक्षा चक्र बना रखा था।
सिपाही या सल्तनत का मालिक?
हैरानी की बात यह है कि एक हेड कांस्टेबल, जिसकी तनख्वाह हजारों में है, उसकी संपत्ति 100 करोड़ के पार मिली है। पत्नी और रिश्तेदारों के नाम पर खरीदी गई बेनामी संपत्तियां, आलीशान कोठियां और करोड़ों का निवेश—यह सब चरस और गांजे की उन पुड़ियों की बदौलत है जिन्होंने हजारों युवाओं का भविष्य स्वाहा कर दिया। एसएसपी की सजगता और सीडीआर (CDR) जांच ने इस ‘अरबपति सिपाही’ और उसके गिरोह का पर्दाफाश तो कर दिया, लेकिन सवाल वही है: क्या सिर्फ सस्पेंशन काफी है?
आतंकवाद से बड़ा खतरा: नार्को-टेररिज्म
नशा सिर्फ एक बुराई नहीं, बल्कि एक धीमी मौत है जो आने वाली पीढ़ी को दीमक की तरह चाट रही है। आतंकवाद एक बार हमला करता है, लेकिन ड्रग्स हर रोज एक घर तबाह करता है।
अब समय आ गया है कि सरकार से कुछ कड़े सवाल पूछे जाएं:
नशा तस्करों और उनके मददगारों का नार्को-पॉलीग्राफ और ब्रेनमैपिंग टेस्ट अनिवार्य क्यों नहीं किया जाता?
ऐसे देशद्रोहियों की 100% संपत्ति जब्त कर उसे सार्वजनिक उपयोग में क्यों नहीं लाया जाता?
क्या ऐसे अपराधियों की नागरिकता समाप्त कर उन्हें समाज से बेदखल नहीं कर देना चाहिए?
न्याय प्रक्रिया में तेजी लाकर 01 वर्ष के भीतर फांसी की सजा का प्रावधान कब बनेगा?
निष्कर्ष: > सस्पेंशन और जांच की फाइलें अक्सर ठंडी पड़ जाती हैं। जब तक ‘सिपाही से अरबपति’ बनने वाले इन गद्दारों को चौराहे पर सजा नहीं मिलेगी, तब तक नशे का यह काला कारोबार फलता-फूलता रहेगा। खाकी पर लगे इस दाग को धोने के लिए अब केवल कार्रवाई नहीं, बल्कि ‘सफाई‘ की जरूरत है।












