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बस्ती आरटीओ की ‘नींद’ खुली: 15 अप्रैल तक रस्म अदायगी या होगी कोई वास्तविक कार्रवाई?

दिखावे का दम या सुरक्षा का भ्रम? 15 दिन के 'अभियान' से सुधरेंगे खटारा स्कूल वाहन?

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष संपादकीय: कागजों पर ‘कवच’ और सड़कों पर ‘काल’—बस्ती मंडल में कब तक दांव पर लगेगी मासूमों की जान?

  • समितियों के मकड़जाल में उलझी बच्चों की सुरक्षा, क्या पोर्टल रोक पाएगा सड़कों पर दौड़ता यमराज?
  • चेतावनी या खानापूर्ति? मानक पूरे नहीं तो रद्द होगी मान्यता, क्या रसूखदारों पर गिरेगी गाज?
  • फीस में ‘सुरक्षा’ का बोझ, पर सफर में मौत का डर; स्कूल संचालकों की मनमानी पर कब लगेगा अंकुश?
  • ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। शासन का आदेश आया है कि 1 अप्रैल से 15 अप्रैल तक ‘विशेष अभियान’ चलेगा। फरमान जारी हुआ है कि मानक पूरे न होने पर स्कूलों की मान्यता रद्द होगी। सुनने में यह घोषणा किसी कड़क अनुशासन जैसी लगती है, लेकिन कड़वा सच यह है कि उत्तर प्रदेश, और विशेषकर बस्ती मंडल में, ऐसे ‘अभियान’ महज रस्म अदायगी बनकर रह गए हैं।

अभियान या महज 15 दिनों का ‘दिखावा’?

परिवहन विभाग और प्रशासन हर साल अप्रैल के महीने में नींद से जागते हैं। सवाल यह है कि क्या मासूमों की सुरक्षा सिर्फ 15 दिनों का एजेंडा है? बाकी के 350 दिन क्या आरटीओ (RTO) विभाग और पुलिस प्रशासन धृतराष्ट्र बन जाता है? बस्ती की सड़कों पर आज भी कंडम बसें, क्षमता से तीन गुना भरे ऑटो और बिना फिटनेस के दौड़ते डग्गेमार वाहन साक्षात यमराज बनकर घूम रहे हैं। क्या प्रशासन को ये ‘खटारा’ गाड़ियाँ तभी दिखती हैं जब ऊपर से डंडा चलता है?

समितियों का मकड़जाल और जवाबदेही का अभाव

बस्ती संभागीय परिवहन अधिकारी ने ‘विद्यालय परिवहन सुरक्षा समिति’ के गठन की बात कही है। नायब तहसीलदार से लेकर थानाध्यक्ष तक इसके सदस्य होंगे। सुनने में तो यह ‘सुरक्षा चक्र’ अभेद्य लगता है, लेकिन हकीकत यह है कि इन समितियों की फाइलें दफ्तरों की धूल फांकती हैं।

सत्यापन का खेल: चालकों का पुलिस सत्यापन और नेत्र परीक्षण का दावा तो होता है, लेकिन क्या कभी जमीन पर किसी ने इसकी जांच की?

मान्यता का डर: ‘मान्यता रद्द’ करने की धमकी हर साल दी जाती है, लेकिन क्या आज तक बस्ती मंडल के किसी रसूखदार स्कूल पर ऐसी गाज गिरी है?

पोर्टल से सुरक्षा या भ्रष्टाचार का नया रास्ता?

UP-ISVMP पोर्टल की शुरुआत तकनीक के लिहाज से अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन जब तक सिस्टम में बैठे लोग अपनी मंशा साफ नहीं करेंगे, पोर्टल भी महज एक ‘डेटा एंट्री’ का साधन बनकर रह जाएगा। सड़कों पर दौड़ती उन पीली बसों का क्या, जिनका धुआं फेफड़े छलनी कर रहा है और जिनकी खिड़कियों की जाली तक टूटी हुई है? क्या पोर्टल उन्हें ऑनलाइन ठीक कर देगा?

अभिभावकों की मजबूरी और प्रशासन की चुप्पी

बस्ती मंडल के अभिभावक भारी-भरकम ‘कन्वेंस चार्ज’ देने के बावजूद अपने बच्चों को मौत के साये में भेजने को मजबूर हैं। स्कूल संचालक सुरक्षा के नाम पर फीस तो बढ़ा लेते हैं, लेकिन जब सुरक्षा मानकों की बात आती है, तो वे संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं। प्रशासन का काम इन संचालकों को ‘निर्देश’ देना नहीं, बल्कि ‘दंडित’ करना होना चाहिए।

हमारा स्पष्ट नजरिया:

15 अप्रैल के बाद जब यह अभियान खत्म होगा, तो क्या फिर से वही पुरानी रफ़्तार शुरू हो जाएगी? प्रशासन को कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय यह सुनिश्चित करना होगा कि बस्ती की सड़कों पर एक भी ऐसा वाहन न दिखे जो मानकों की धज्जियां उड़ा रहा हो। बच्चों की सुरक्षा कोई ‘सीजनल बिजनेस’ नहीं है, यह एक निरंतर जिम्मेदारी है। अगर इस बार भी कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति तक सीमित रही, तो भविष्य में होने वाले किसी भी हादसे के लिए परिवहन विभाग और स्कूल प्रशासन बराबर के जिम्मेदार होंगे। — ब्यूरो, बस्ती मंडल।

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