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बस्ती में खाकी की नाक के नीचे ‘धुआं-धुआं’ हुआ कानून: कैफे बने नशे के सुरक्षित ठिकाने!

सुविधा शुल्क का 'कवर फायर' और बेसमेंट में मौत का व्यापार: कब जागेगा बस्ती प्रशासन?

अजीत मिश्रा (खोजी)

🛑हुक्के के धुएं में उड़ता बचपन: आखिर किसके ‘सुविधा शुल्क’ ने पुलिस की आंखों पर बांधी पट्टी?🛑

  • विदेशी हुक्के का दम और पुलिस का ‘सूचना संकलन’ वाला भ्रम: युवाओं की रगों में जहर घोलते कैफे!
  • बस्ती की सड़कों पर गश्त, बेसमेंट में अय्याशी: क्या हुक्के के धुएं में खो गया है पुलिस का इकबाल?
  • कैफे की आड़ में ‘अडालिया’ का जहर: चंद रुपयों के लालच में बर्बाद होती बस्ती की नई पौध!
  • साहब! आपकी चुप्पी युवाओं के फेफड़ों पर भारी है: अवैध हुक्का बारों पर कार्रवाई कब?

विशेष समीक्षा: बस्ती से ग्राउंड रिपोर्ट

बस्ती जिले की फिजाओं में इन दिनों सिर्फ प्रदूषण का जहर नहीं, बल्कि अवैध हुक्का बारों से निकलता वह धुआं भी घुला है जो हमारी युवा पीढ़ी के फेफड़ों को छलनी कर रहा है। शहर के नामचीन इलाकों में ‘कैफे’ की आड़ में मौत का यह सामान खुलेआम परोसा जा रहा है, और विडंबना देखिए—कानून के रखवाले अपनी कुंभकर्णी नींद से जागने को तैयार नहीं हैं।

🎯बेखौफ कारोबार, ‘अंधा’ प्रशासन

मालवीय रोड से लेकर पचोड़िया रोड तक, सड़कों पर पुलिस की गश्त तो दिखती है, लेकिन बेसमेंट में चल रहे इन ‘धुआं केंद्रों’ तक उनकी नजर नहीं पहुँचती। क्या यह वाकई पुलिस की कार्यक्षमता पर सवाल है या फिर ‘सुविधा शुल्क’ का वह चश्मा है, जिसे पहनते ही अवैध गतिविधियां ‘पारदर्शी’ हो जाती हैं?

🎯हाल ही में हुई पड़ताल ने पुलिसिया दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं:

🔔खुफिया कैमरे का सच: एक नामी कैफे के बेसमेंट में युवाओं की भीड़, धुएं का गुबार और ₹300 से ₹500 में बिकता नशा।

🔔विदेशी फ्लेवर का लालच: ‘अडालिया’ जैसे विदेशी ब्रांड्स के नाम पर युवाओं को नशे की गर्त में धकेला जा रहा है।

🔔प्राइवेट आर्मी का पहरा: जब पड़ताल की गई, तो इन कैफे संचालकों के पाले हुए गुर्गे संदिग्धों की निगरानी करते मिले। यह साहस बिना ‘ऊपर’ के संरक्षण के संभव नहीं है।

🎯क्या ‘सूचना संकलन’ सिर्फ एक बहाना है?

अपर पुलिस अधीक्षक का यह कहना कि “पुलिस सूचनाएं संकलित कर रही है”, सुनने में एक घिसा-पिटा सरकारी जुमला मात्र लगता है। जब एक साधारण पड़ताल में खुफिया कैमरा सच सामने ला सकता है, तो भारी-भरकम खुफिया तंत्र वाली पुलिस को इसकी भनक तक न होना गले नहीं उतरता। क्या पुलिस प्रशासन तब जागेगा जब बस्ती का हर दूसरा घर नशे की चपेट में होगा?

🎯सामाजिक सरोकार या व्यापारिक मजबूरी?

ये कैफे संचालक युवाओं को केवल हुक्का नहीं, बल्कि अपराध की दुनिया का पहला रास्ता दिखा रहे हैं। इन ठिकानों पर होने वाली संदिग्ध आवाजाही किसी बड़ी आपराधिक साजिश का केंद्र भी हो सकती है।

बस्ती की जनता का सवाल: > “क्या वर्दी की हनक सिर्फ गरीबों और हेलमेट न पहनने वालों पर चलेगी, या फिर इन सफेदपोश ‘मौत के सौदागरों’ के कॉलर तक भी कानून के हाथ पहुँचेंगे?”

बस्ती पुलिस को अब ‘आश्वासन’ की पोटली छोड़कर ‘एक्शन’ के मोड में आना होगा। यदि जल्द ही इन अवैध हुक्का बारों पर बुल्डोजर नहीं चला या कड़ी कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि खाकी ने नशे के इन सौदागरों के आगे घुटने टेक दिए हैं।

वक्त आ गया है कि ‘सुविधा शुल्क’ की संस्कृति को छोड़कर भविष्य की सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए। वरना धुएं की यह चादर एक दिन पूरे समाज का दम घोंट देगी।

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