
विल्ली मारकुंडी पत्थर खदान हादसा: सात मजदूरों की मौत पर उग्र हुआ जनाक्रोश, राष्ट्रीय चेरो जनजाति महासंघ ने सीएम से की कठोर कार्रवाई की मांग
दुद्धी/सोनभद्र(राकेश कुमार कन्नौजिया)_
ओबरा विधानसभा के विल्ली मारकुंडी क्षेत्र में पत्थर खदान धंसने से सात मजदूरों की दर्दनाक मौत के बाद अब मामला तूल पकड़ चुका है। राष्ट्रीय चेरो जनजाति महासंघ ने इस हादसे को घोर लापरवाही का परिणाम बताते हुए मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर कठोर कार्रवाई, उच्च स्तरीय जांच और पीड़ित परिवारों को 50–50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग की है।
महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक हरीराम चेरो ने पत्र में लिखा है कि सोनभद्र आदिवासी बहुल जिला है, जहां के लोगों का जीवन खनन मजदूरी पर निर्भर है। आदिवासी परिवारों की दशकों पुरानी समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार प्रयासरत है, लेकिन अधिकारियों की उदासीनता और खनन क्षेत्र में फैली अवैध गतिविधियों ने एक बार फिर आदिवासी समाज को गहरी चोट पहुंचाई है।
पत्र के अनुसार 15 नवंबर 2025 को भगवान बिरसा मुंडा जयंती पर जब प्रधानमंत्री का कार्यक्रम क्षेत्र में लाइव दिखाया जा रहा था, उसी समय विल्ली मारकुंडी खदान में अवैध रूप से काम कराया जा रहा था। खनन बंद रहने के स्पष्ट आदेशों के बावजूद बिना अनुमति कार्य कराया गया, जिसके परिणामस्वरूप पहाड़ धंस गया और सात मजदूरों की दर्दनाक मौके पर ही मौत हो गई।
हरीराम चेरो ने कहा कि इतने बड़े हादसे के आठ दिन बाद भी पीड़ित परिवारों को न तो मुआवजा मिला और न ही प्रशासनिक राहत। अधिकारियों द्वारा घटना स्थल की जानकारी तक मुख्यमंत्री कार्यालय को समय पर नहीं भेजी गई। उन्होंने इसे अत्यंत गंभीर लापरवाही बताते हुए दोषी खनन ठेकेदारों, अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि जिस खदान में हादसा हुआ, वह 6 किलोमीटर दूर है और इलाके का 60 प्रतिशत हिस्सा आदिवासियों का है। ऐसे में मजदूरों की मौत केवल दुर्घटना नहीं, बल्कि प्रणालीगत विफलता का घोर उदाहरण है।
राष्ट्रीय चेरो जनजाति महासंघ ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि
पीड़ित परिवारों को तत्काल 50–50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाए।
दोषी अधिकारियों व खनन संचालकों पर कठोरतम कार्रवाई हो।
घटना की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
अंत में हरीराम चेरो ने चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि शीघ्र न्याय न मिला, तो आदिवासी समाज एक बड़े आंदोलन को मजबूर होगा।





