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“सात महीने से फाइलों में दफन है इंसाफ: डिप्टी सीएमओ को डीएम की अल्टीमेटम— ‘एक हफ्ते में दो रिपोर्ट वर्ना होगी कार्रवाई'”

"मौत के सौदागरों को किसका संरक्षण? बिना पंजीकरण चल रहे अस्पताल और विभाग की रहस्यमयी खामोशी!"

अजीत मिश्रा (खोजी)

।। बस्ती स्वास्थ्य विभाग की ‘सफेदपोश’ लापरवाही: मौतों के बाद भी फाइलों में कैद है इंसाफ।।

बुधवार 21 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती।। जिले में निजी अस्पतालों की मनमानी और स्वास्थ्य विभाग की उदासीनता अब मासूमों की जान पर भारी पड़ रही है। ताज़ा मामला जिला प्रशासन की उस सख्ती से सामने आया है, जहाँ जिलाधिकारी (DM) ने विभागीय अफसरों के ढुलमुल रवैये पर कड़ा प्रहार किया है। हफ़्तों और महीनों से लंबित पड़ी जाँच रिपोर्टों ने यह साफ़ कर दिया है कि स्वास्थ्य विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारी शायद सिस्टम की कमियों को सुधारने के बजाय “दोषियों को संरक्षण” देने के खेल में व्यस्त हैं।

💫डीएम की फटकार: सात महीने बीते, पर जाँच अधूरी

सोमवार को जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में जिलाधिकारी कृतिका ज्योत्स्ना का पारा उस वक्त चढ़ गया, जब उन्हें पता चला कि कप्तागंज के एक डॉक्टर की लापरवाही से हुई नवजात की मौत के मामले में सात महीने बाद भी जाँच पूरी नहीं हुई है। डीएम ने डिप्टी सीएमओ (ACMHO) को कड़ी चेतावनी देते हुए एक हफ्ते के भीतर रिपोर्ट तलब की है। सवाल यह उठता है कि क्या विभाग किसी “बड़े आदेश” का इंतज़ार कर रहा था या फिर फाइलों को दबाकर मामले को ठंडा करने की साजिश रची जा रही थी?

💫रसूखदारों के आगे बेबस विभाग?

 चार प्रमुख मामले विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं:

🔥कप्तागंज मामला (जून 2025): प्रसव के दौरान नवजात की मौत हुई। सात महीने बीत गए, पर न रिपोर्ट आई, न कार्रवाई हुई।

🔥मालवीय रोड का निजी अस्पताल: यहाँ भी एक प्रसव के दौरान नवजात की मौत हुई। जून में हुई इस घटना की जाँच पाँच महीने से अधूरी है।

🔥दक्षिण दरवाजा अस्पताल: यहाँ तो हद ही हो गई। नवजात की मौत के बाद अस्पताल को सील किया गया, लेकिन जाँच में पता चला कि अस्पताल का एक कक्ष सील करके टीम केवल “कोरम” पूरा कर रही थी। अस्पताल का संचालन आज भी बेखौफ जारी है।

🔥बिना पंजीकरण के खेल: एक अन्य मामले में तो अस्पताल का रजिस्ट्रेशन तक नहीं था, फिर भी विभाग ने चार महीनों तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

💫रस्म अदायगी बनी ‘जाँच’

हैरानी की बात यह है कि जब भी किसी निजी अस्पताल में मौत का तांडव होता है, विभाग दिखावे के लिए नोटिस जारी करता है या अस्पताल को सील करने का नाटक करता है। लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ ‘मैनेज’ हो जाता है और अस्पताल फिर से मौत की दुकान सजाकर बैठ जाते हैं। जिला अस्पताल से लेकर निजी क्लिनिकों तक फैले इस मकड़जाल में आम आदमी पिस रहा है।

“जिन अस्पतालों की जांच चल रही है, उनमें से अधिकांश पूरी हो चुकी है। टीम में शामिल चिकित्सकों से रिपोर्ट लेकर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।” > — डॉ. राजीव निगम, सीएमओ, बस्ती

सीएमओ साहब का यह बयान कितना धरातल पर उतरेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल तो स्थिति यह है कि जनता का भरोसा सरकारी तंत्र से उठ चुका है।

💫 क्या केवल चेतावनी काफी है?

सिर्फ “चेतावनी” देने से उन माताओं की कोख नहीं भरेगी जिन्होंने सिस्टम की लापरवाही के कारण अपने बच्चों को खोया है। यदि डीएम की इस सख्ती के बाद भी डिप्टी सीएमओ और संबंधित अधिकारी एक सप्ताह में रिपोर्ट पेश नहीं करते, तो यह माना जाएगा कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं। बस्ती की जनता अब “नोटिस” नहीं, बल्कि “नतीजे” चाहती है।

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