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दुबौलिया थाने में न्याय का ‘एनकाउंटर’: थानेदार की सुस्ती या दबंगों को खुली छूट?

बस्ती पुलिस का 'अनोखा' अंदाज़: शिकायत के बाद भी मौके पर जाना 'साहब' की शान के खिलाफ!

।। सिस्टम की ‘बहरापन’ और दबंगों की ‘धमक’: दुबौलिया में कानून को ठेंगे पर रख रहे थानेदार।।

शनिवार 24 जनवरी 26,उत्तर प्रदेश।

बस्ती। जनपद के दुबौलिया थाने में ‘न्याय’ शायद थानेदार की मेज के नीचे दबकर दम तोड़ चुका है। जिले की पुलिसिंग पर सवालिया निशान तब लग गया जब एक लाचार महिला को अपने मासूम बच्चों के साथ न्याय की भीख मांगने के लिए एसपी कार्यालय की धूल फांकनी पड़ी। सवाल यह है कि क्या दुबौलिया थाना प्रभारी को विभाग की किरकिरी कराने का विशेष ‘मैंडेट’ मिला हुआ है?

👉खाकी की सरपरस्ती में फल-फूल रहे दबंग?

धरमूपुर गांव की यह घटना सिर्फ मारपीट का मामला नहीं, बल्कि पुलिस की संवेदनहीनता का जीवंत प्रमाण है। चाचा की वसीयत क्या हुई, महिला के अपने ही रिश्तेदार भेड़िये बन गए। घर का ताला तोड़कर अवैध कब्जे की कोशिश हुई और जब महिला ने विरोध किया, तो उसे और उसके बच्चों को लहूलुहान कर दिया गया। लेकिन अफ़सोस, दुबौलिया पुलिस को न महिला की चीखें सुनाई दीं, न बच्चों के आंसू दिखे।

👉थानेदार साहब की ‘शाही अनदेखी’

चर्चा है कि साहब को चार्ज मिलते ही विवादों से गहरा लगाव हो जाता है। आरोप है कि शिकायत मिलने के बावजूद थाना प्रभारी ने मौके पर जाकर जांच करना भी मुनासिब नहीं समझा। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि दबंगों पर हाथ डालने में पुलिस के हाथ कांप रहे थे? क्या अपराधियों को ‘खास आशीर्वाद’ प्राप्त है या फिर पुलिस किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रही है?

👉साहब सुनिए! यह ‘रामराज्य’ की तस्वीर नहीं है

एक तरफ सरकार मिशन शक्ति के ढोल पीट रही है, दूसरी तरफ दुबौलिया जैसे थानों में महिलाएं न्याय के लिए बिलख रही हैं। क्षेत्राधिकारी कलवारी को दी गई लिखित शिकायत में निष्पक्ष जांच की मांग की गई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो पुलिस प्रारंभिक शिकायत पर नहीं जागी, वह जांच क्या खाक करेगी?

👉वसीयत की रंजिश और अपनों का ही प्रहार

मामला पारिवारिक रंजिश और संपत्ति विवाद से जुड़ा है। पीड़िता के अनुसार, उसके चाचा द्वारा की गई वसीयत के बाद से ही रिश्तेदार खार खाए बैठे हैं। आरोप है कि इसी रंजिश में दबंग रिश्तेदारों ने न केवल घर का ताला तोड़कर अवैध कब्जा करने का प्रयास किया, बल्कि विरोध करने पर महिला और उसके मासूम बच्चों को बेरहमी से पीटा। जान से मारने की धमकी दी गई, जिससे पूरा परिवार दहशत में है।

👉थानेदार की ‘सुस्ती’ या जानबूझकर अनदेखी?

हैरानी की बात यह है कि पीड़ित महिला जब न्याय की गुहार लेकर दुबौलिया थाने पहुँची, तो वहां उसे आश्वासन के सिवाय कुछ न मिला। पीड़िता का आरोप है कि थाना प्रभारी ने मामले की गंभीरता को समझने या मौके पर जाकर स्थिति देखने तक की जहमत नहीं उठाई। जब थाने से न्याय के दरवाजे बंद दिखे, तब मजबूरन पीड़िता को अपने बच्चों के साथ पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्यालय की चौखट चूमनी पड़ी।

👉सिस्टम से सवाल: कब तक दर-दर भटकेगा पीड़ित?

दुबौलिया थानेदार का चार्ज संभालते ही विवादों से नाता जुड़ना अब चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ सूबे के मुखिया जीरो टॉलरेंस और महिला सुरक्षा की कसमें खाते हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी शिकायतों को रद्दी की टोकरी में डाल रहे हैं।

👉मुख्य बिंदु जिन पर उठ रहे सवाल:

🔥क्या दबंगों को पुलिस का कोई खौफ नहीं है?

🔥पीड़िता की लिखित शिकायत के बाद भी मुकदमा दर्ज करने में देरी क्यों?

🔥क्या पुलिस किसी रसूखदार के दबाव में मामले को रफा-दफा करना चाहती है?

फिलहाल, पीड़िता ने क्षेत्राधिकारी (CO) कलवारी को लिखित शिकायत देकर निष्पक्ष जांच और आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। अब देखना यह है कि बस्ती पुलिस प्रशासन इस ‘सुस्त’ कार्यप्रणाली पर क्या एक्शन लेता है या फिर पीड़ित महिला की चीखें फाइलों के नीचे ही दबी रह जाएंगी।

कड़वा सवाल: क्या बस्ती पुलिस केवल वीआईपी दौरों और कागजी कार्रवाई के लिए है? अगर एक महिला अपने घर में सुरक्षित नहीं है और थानेदार उसकी सुध लेने को तैयार नहीं, तो ऐसी वर्दी का रसूख किस काम का?

पीड़िता ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। यदि आरोपियों पर जल्द मुकदमा दर्ज कर सलाखों के पीछे नहीं भेजा गया, तो यह मामला बस्ती पुलिस के माथे पर एक और कलंक साबित होगा।

ब्यूरो रिपोर्ट: अजीत मिश्रा (खोजी)

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