
अजीत मिश्रा (खोजी)
🚨बस्ती में ‘डॉक्टर विहीन’ डायग्नोसिस सेंटर! रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं, क्या ‘Form F’ के खेल में सोया है स्वास्थ्य विभाग?🚨
🏥भ्रष्टाचार की ‘अल्ट्रासाउंड’ रिपोर्ट: क्या मोटी रकम के बदले विभाग ने दी है नियमों को ताक पर रखने की छूट?
🏥जिम्मेदार मौन, सेंटर बेखौफ: बस्ती में बिना सत्यापन बांटी जा रही हैं जांच रिपोर्टें, कौन लेगा एक्शन?
🏥सरकारी आंकड़ों में ‘खेल’: रोजाना 50 जांच, पर महीने में सिर्फ 304 Form F; आखिर किसका संरक्षण?
🏥खुलासा: ‘जल्दबाजी’ या ‘जालसाजी’? वर्षों पुरानी रिपोर्टों पर भी डॉक्टरों के हस्ताक्षर गायब!
🏥बस्ती में डायग्नोसिस सेंटरों का ‘सिंडिकेट’ सक्रिय, जनसूचना के आंकड़ों से उड़ेगी विभाग की नींद।
🏥सफेद कोट के पीछे काला सच: बिना डॉक्टर के चल रहे जिले के कई सेंटर, मरीजों के भविष्य पर संकट।
बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।
बस्ती। जिले के स्वास्थ्य महकमे में इन दिनों “अंधेर नगरी चौपट राजा” वाली स्थिति बनी हुई है। ओझा डायग्नोसिस सेंटर पर लगे गंभीर आरोपों ने न केवल स्वास्थ्य विभाग की मुस्तैदी की पोल खोल दी है, बल्कि यह भी साफ कर दिया है कि जिले में अल्ट्रासाउंड और डायग्नोसिस के नाम पर एक बड़ा ‘सिंडिकेट’ सक्रिय है।
💫रिपोर्ट पर नाम है, पर ‘हाथ’ के निशान गायब
ओझा डायग्नोसिस सेंटर की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों ने सनसनी फैला दी है। मरीजों का आरोप है कि वर्ष 2022 से 2024 के बीच जारी की गई अनगिनत जांच रिपोर्टों पर संबंधित डॉक्टरों के हस्ताक्षर ही नहीं हैं। सेंटर के कागजों पर Dr. Satendra Mani Ojha, Dr. Kapis Mittal और Dr. Pramod Dixit जैसे नाम दर्ज तो हैं, लेकिन धरातल पर उनकी मौजूदगी और रिपोर्ट के सत्यापन पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा है।
सोशल मीडिया पर डॉ. सत्येंद्र मणि ओझा का यह तर्क कि “जल्दबाजी के कारण हस्ताक्षर नहीं हो पाए,” गले नहीं उतर रहा। सवाल यह है कि क्या पिछले 6 सालों से मरीज ‘जल्दबाजी’ में ही थे? बिना सत्यापन की रिपोर्ट के आधार पर अगर किसी मरीज का गलत इलाज हो जाए, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?
💫’Form F’ का गणित: 50 बनाम 10?
डायग्नोसिस सेंटरों की सबसे बड़ी हेराफेरी Form F (Pre-natal Diagnostic Techniques Act के तहत अनिवार्य फॉर्म) में छिपी नजर आ रही है। सूत्रों के मुताबिक:
सेंटर पर रोजाना 50 से अधिक अल्ट्रासाउंड किए जा रहे हैं।लेकिन सरकारी आंकड़ों में महीने भर का डेटा महज 304 Form F तक सिमट जाता है।यह सीधा-सीधा भ्रूण लिंग निर्धारण कानून की धज्जियां उड़ाने और टैक्स चोरी का मामला प्रतीत होता है। क्या स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी यह नहीं देख पा रहे कि मरीजों की संख्या और जमा किए गए फॉर्म के बीच जमीन-आसमान का अंतर है?
💫विभाग की जवाबदेही कहाँ?
इस पूरे प्रकरण में जिले के स्वास्थ्य विभाग और सीएमओ (CMO) की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध नजर आती है। केंद्रों का नियमित निरीक्षण करना, रिपोर्टों की सत्यता जांचना और Form F के आंकड़ों का मिलान करना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि जनसूचना (RTI) के माध्यम से आम जनता को डेटा जुटाकर ‘खुलासे’ करने पड़ रहे हैं, तो विभाग की सफेद हाथी जैसी मशीनरी आखिर कर क्या रही है?
💫विभागीय मिलीभगत या बड़ी लापरवाही?
जनसूचना के माध्यम से जुटाए जा रहे आंकड़े बताते हैं कि यह खेल केवल एक सेंटर तक सीमित नहीं है। पूरे बस्ती जिले में अल्ट्रासाउंड सेंटरों से ‘नियमित वसूली’ के बदले नियमों को ताक पर रखने की छूट दी गई है। जिले के स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों की चुप्पी यह इशारा कर रही है कि कहीं न कहीं संरक्षण ऊपर से प्राप्त है।
💫जवाब मांगती जनता
👉बिना हस्ताक्षर की रिपोर्ट: सीएमओ (CMO) कार्यालय ने आज तक इन सेंटरों के औचक निरीक्षण में बिना दस्तखत वाली रिपोर्टों पर संज्ञान क्यों नहीं लिया?
👉कागजी डॉक्टर: क्या डॉक्टर सिर्फ रजिस्ट्रेशन फाइल में दर्ज होने के लिए हैं? क्या वे वास्तव में सेंटर पर मौजूद रहते हैं?
👉वसूली का सिंडिकेट: क्या Form F के कम आंकड़ों के बदले विभाग में ‘महिना’ पहुंच रहा है?
बस्ती की जनता पूछती है: स्वास्थ्य विभाग के ‘मौन’ के पीछे का राज क्या है?
🔥हस्ताक्षरविहीन रिपोर्ट की मान्यता क्या?: क्या सीएमओ (CMO) महोदय बताएंगे कि बिना डॉक्टर के डिजिटल या फिजिकल सिग्नेचर के जारी की गई रिपोर्ट कानूनी रूप से वैध है? यदि नहीं, तो 6 साल से ऐसे सेंटर पर ताला क्यों नहीं लटका?
🔥डॉक्टरों की ‘कागजी’ मौजूदगी: क्या डॉ. कपिस मित्तल और डॉ. प्रमोद दीक्षित जैसे नामी डॉक्टर रिपोर्टिंग के वक्त सेंटर पर मौजूद रहते हैं? अगर हाँ, तो रिपोर्ट पर उनके हस्ताक्षर क्यों नहीं हैं? और अगर नहीं, तो क्या यह ‘रेंट-ए-डिग्री’ (डिग्री किराये पर लेना) का मामला नहीं है?
🔥Form F का जादुई गणित: रोजाना 50 से ज्यादा अल्ट्रासाउंड और महीने में मात्र 304 Form F का डेटा! बाकी मरीजों का रिकॉर्ड कहाँ गायब हो गया? क्या यह भ्रूण लिंग निर्धारण कानून (PCPNDT Act) की सीधी अवहेलना नहीं है?
🔥निरीक्षण का ढोंग: स्वास्थ्य विभाग की टीम साल भर में कितनी बार इन सेंटरों का औचक निरीक्षण करती है? क्या निरीक्षण के दौरान उन्हें बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्टें और फॉर्म की यह विसंगति कभी नजर नहीं आई?
🔥वसूली का सिंडिकेट: सूत्रों के अनुसार जिले में Form F के नाम पर जो ‘फिक्स वसूली’ का खेल चल रहा है, उसमें विभाग के किन-किन ‘सफेदपोशों’ की हिस्सेदारी है?
🔥मरीजों की जान से जोखिम: यदि बिना हस्ताक्षर वाली गलत रिपोर्ट के आधार पर किसी मरीज का गलत ऑपरेशन या इलाज हो जाता है, तो क्या स्वास्थ्य विभाग इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी लेगा?
🔥RTI का इंतजार क्यों?: विभाग खुद इन सेंटरों का डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं करता? क्या बड़े खुलासे के डर से फाइलों को दबाकर रखा गया है?
बस्ती की जनता अब जागरूक हो रही है। जनसूचना के तहत निकाला जा रहा डेटा जल्द ही कई रसूखदारों के चेहरों से नकाब हटाएगा। यदि स्वास्थ्य विभाग ने अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं त्यागी, तो मामला शासन की चौखट तक पहुंचना तय है।

















