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“बस्ती भाजपा में रसूख की जंग: कार्यकर्ता का हक मार ‘पिंटू बाबा’ बने सभासद!”

"निष्ठा पर भारी पड़ा धनबल! गायघाट में पुराने भाजपाइयों का फूटा गुस्सा।"

अजीत मिश्रा (खोजी)

🙊बस्ती भाजपा में निष्ठा की बलि, ‘पिंटू बाबा’ जैसे रसूखदारों का बोलबाला!🙊

⭐”अर्श से फर्श पर कार्यकर्ता: क्या भाजपा में अब केवल ‘रसूखदारों’ की ही पूछ है?”

⭐”भ्रष्टाचार का ‘रेट कार्ड’ या राजनीतिक सेटिंग? पिंटू बाबा के मनोनयन पर उठे गंभीर सवाल।”

⭐”बस्ती का सियासी भूचाल: क्या जिला नेतृत्व के संरक्षण में हो रही समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी?”

बस्ती मंडल ब्यूरो, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। राजनीति में जब ‘सेवा’ का स्थान ‘स्वार्थ’ ले ले और ‘पद्धति’ पर ‘पहुंच’ भारी पड़ने लगे, तो संगठन की नींव हिलने लगती है। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की नगर पंचायत गायघाट में भाजपा के भीतर पनप रहा असंतोष अब सड़कों और अखबारों की सुर्खियां बन चुका है। मामला सीधा है—पार्टी के लिए सालों तक चप्पल घिसने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर, सत्ता और पैसे के दम पर रसूखदारों को उपकृत करना।

💫रसूख के आगे ‘कार्यकर्ता’ बेबस

ताजा विवाद बालकृष्ण तिवारी उर्फ ‘पिंटू बाबा’ को नगर पंचायत गायघाट में मनोनीत सभासद बनाए जाने को लेकर है। स्थानीय जनता और निष्ठावान कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश है। आरोप है कि पिंटू बाबा ने अपने राजनीतिक रसूख और धनबल का इस्तेमाल कर एक सच्चे कार्यकर्ता का हक छीन लिया है। चर्चा आम है कि जिस व्यक्ति के पास पहले से नगर पंचायत की बागडोर (अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष) रही हो, उसे फिर से सभासद बनाने की क्या मजबूरी थी?

💫’यस मैन’ और ‘कमाऊपूतों’ की चांदी

लेख के केंद्र में यह कड़वा सच है कि भाजपा, जो खुद को ‘कार्यकर्ताओं की पार्टी’ कहती है, वहां अब केवल ‘यस मैन’ (जी-हुजूरी करने वाले) और ‘कमाऊपूतों’ की पूछ हो रही है। गायघाट क्षेत्र के स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन्होंने 15-15 साल पार्टी को दिए, उन्हें नजरअंदाज कर महज 3-4 साल पहले आए रसूखदारों को पद बांट दिए गए। क्या भाजपा में अब योग्यता का पैमाना केवल ‘मनी और पावर’ रह गया है?

🔥भ्रष्टाचार और गिरता ग्राफ

लेख में कुछ गंभीर सवाल उठाए गए हैं जो जिले के शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं:

⭐अपराध को संरक्षण? चर्चा है कि पार्टी ने ऐसे लोगों को भी पद नवाजे हैं जिन पर गंभीर आरोप (गांजा/स्मैक तस्करी जैसे संकेत) लगते रहे हैं। क्या कोर कमेटी के पास इन सवालों का जवाब है?

⭐चेयरमैन पद का विवाद: पहले भी पिंटू बाबा द्वारा अपने ‘चालक’ को चेयरमैन बनवाने के प्रयास की खबरें आई थीं, जिसका खामियाजा पार्टी को हार के रूप में भुगतना पड़ा था। इसके बावजूद नेतृत्व की आंखें नहीं खुलीं।

⭐जातिगत उपेक्षा: क्षेत्र के एससी (SC) वर्ग के समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है, जिससे पार्टी का वोट बैंक खिसकने का डर है।

“जब तक पिंटू बाबा और विवेकानंद मिश्र जैसे लोग पार्टी में हावी रहेंगे, तब तक जमीन पर काम करने वाला कार्यकर्ता उपेक्षित ही रहेगा।” — क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं की सामूहिक आवाज

💫 कब जागेगा नेतृत्व?

बस्ती भाजपा में जो चल रहा है, वह किसी ‘दीमक’ से कम नहीं है। यदि समय रहते जिला अध्यक्ष और प्रदेश नेतृत्व ने इस ‘सिंडिकेट’ को नहीं तोड़ा, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘कार्यकर्ता’ केवल दरी बिछाने तक ही सीमित रह जाएगा और मलाई केवल रसूखदार खाएंगे। सवाल आज भी खड़ा है: आखिर कार्यकर्ता की रीढ़ की हड्डी पिघल जाने के बाद ही उसे सम्मान क्यों मिलता है?

क्या भाजपा अब केवल रसूखदारों की ‘जागीर’ बनकर रह गई है? क्या 15 साल से दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता की नियति केवल उपेक्षा ही है? नगर पंचायत गायघाट में बालकृष्ण तिवारी उर्फ ‘पिंटू बाबा’ को मनोनीत सभासद बनाए जाने के बाद यह सवाल जिले के गलियारों में आग की तरह फैल रहा है।

🔥 तीखे सवाल, जो जिला नेतृत्व की नींद उड़ा देंगे:

सत्ता की हवस या भ्रष्टाचार का खेल? जिसके पास पहले से रसूख है, जो ठेके-पट्टे का खिलाड़ी है, आखिर उसे ही बार-बार पद क्यों? क्या पार्टी में कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ गया है?

🔥कार्यकर्ता का हक किसने मारा? आरोप है कि जिला अध्यक्ष और पिंटू बाबा की ‘जुगलबंदी’ ने उन चेहरों को दरकिनार कर दिया जिन्होंने पार्टी को अपना खून-पसीना दिया।

🔥अपराध और राजनीति का गठजोड़? चर्चा आम है कि योग्य प्रत्याशियों को छोड़कर ‘स्मैक तस्करों’ और ‘भ्रष्टाचारियों’ को संरक्षण दिया जा रहा है। क्या यही भाजपा की नई कार्यशैली है?

🔥SC वर्ग की उपेक्षा क्यों? क्षेत्र के दलित और पिछड़े वर्ग के कर्मठ कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करना क्या आगामी चुनावों में पार्टी को भारी नहीं पड़ेगा?

“चेयरमैन की बागडोर हाथ में होने के बाद भी सभासद बनने की भूख बताती है कि सिस्टम में दीमक लग चुका है। जब तक विवेकानंद मिश्र और पिंटू बाबा जैसे लोग हावी रहेंगे, सच्चा कार्यकर्ता घुटन ही महसूस करेगा।”

📢 सावधान! यह केवल एक पद का मामला नहीं है, यह उस भरोसे का कत्ल है जो एक आम कार्यकर्ता अपनी पार्टी पर करता है। अगर कोर कमेटी अब भी चुप है, तो समझ लीजिए कि ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ का नारा अब केवल इतिहास की किताबों में रह गया है।

 

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