
अजीत मिश्रा (खोजी)
सावधान! नेताओं के ‘झांसे’ में आए तो समझो ‘नौकरी’ गई; बस्ती मंडल में भ्रष्टाचार की नई पटकथा!
ब्यूरो, बस्ती (उत्तर प्रदेश)
- नियमों की बलि चढ़ाकर ‘जय कंस्ट्रक्शन’ पर मेहरबानी; अफसरों ने दांव पर लगाई अपनी कुर्सी!
- सवालों के घेरे में अफसर: आईसीआईसीआई बैंक को बताया ‘राष्ट्रीयकृत’; एडी हेल्थ की रिपोर्ट या भ्रष्टाचार की नई पटकथा?
- सावधान! जब हाईकोर्ट में खिंचेगी फाइल, तब न नेता बचाएंगे न ही ‘बॉस’ काम आएंगे।
बस्ती। सत्ता के गलियारों में नेताओं की चाटुकारिता करना कुछ अधिकारियों के लिए भले ही फायदे का सौदा लगता हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब कानून का शिकंजा कसता है, तो ‘माननीय’ अपना पल्ला झाड़ लेते हैं और अधिकारी अपनी नौकरी के साथ-साथ मान-सम्मान भी गंवा बैठते हैं। बस्ती मंडल के स्वास्थ्य विभाग में इन दिनों कुछ ऐसा ही ‘आत्मघाती खेल’ खेला जा रहा है, जहाँ नियम-कायदों को ताक पर रखकर चहेते ठेकेदारों पर मेहरबानी बरसाई जा रही है।बस्ती जिले में भ्रष्टाचार और नेताओं के दबाव में अधिकारियों द्वारा किए जा रहे खेल का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। मीडिया बार-बार उन अधिकारियों को सचेत कर रही है, जो नेताओं के झांसे में आकर अपनी नौकरी को दांव पर लगा बैठते हैं। इतिहास गवाह है कि जब मामला फंसता है, तो कोई नेता काम नहीं आता; केवल अधिकारियों को ही सब कुछ झेलना पड़ता है और उनका मान-सम्मान व पैसा सब चला जाता है।
एडी हेल्थ की ‘जादुई’ जांच: 3 महीने का काम 24 घंटे में!
स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में चर्चा है कि ‘एडी हेल्थ’ साहब के पास कोई अलादीन का चिराग हाथ लग गया है। जिस जांच रिपोर्ट को साहब तीन महीनों तक दबाए बैठे थे, उसे अचानक एक ही दिन में तैयार कर ‘क्लीन चिट’ की शक्ल दे दी गई। सवाल यह है कि आखिर रातों-रात ऐसी कौन सी फाइल पढ़ ली गई जिसने दागी को बेदाग बना दिया? क्या यह रिपोर्ट शिकायतकर्ता को दबाने और सीएमओ के भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए आनन-फानन में गढ़ी गई एक काल्पनिक कहानी है?ताजा मामला ‘जय कंस्ट्रक्शन’ को सिविल कार्यों का ठेका देने से जुड़ा है। पहले इस मामले में सीएमओ सवालों के घेरे में थे, लेकिन अब एडी हेल्थ (AD Health) भी बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं। एडी हेल्थ साहब उस फर्म के अभिलेखों को सही मान रहे हैं, जो फैजाबाद और बस्ती दोनों जनपदों में काम कर रही है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ‘जनेश्वर चौधरी’ ने सीएमओ और एडी हेल्थ को ऐसा क्या दे दिया कि दोनों अपनी नौकरी दांव पर लगाने को तैयार हो गए?
‘जय कंस्ट्रक्शन’ पर मेहरबानी या नियमों की बलि?
मामला ‘जय कंस्ट्रक्शन’ नामक फर्म को सिविल कार्यों का ठेका देने से जुड़ा है। सूत्रों की मानें तो इस फर्म के दस्तावेज खुद इसकी पोल खोल रहे हैं:
- एक्सपायर्ड हैसियत प्रमाण-पत्र: जिस हैसियत प्रमाण-पत्र के दम पर करोड़ों का टेंडर लिया गया, उसकी वैधता निविदा खुलने से एक महीने पहले ही खत्म हो चुकी थी।
- अधूरे फॉर्म, पूरा भुगतान: निविदा फॉर्म में न तो पता सही भरा गया, न तारीख का सही जिक्र था। फिर भी एडी हेल्थ साहब को इसमें ‘ईमानदारी’ नजर आ रही है।
- बैंक की जानकारी पर ‘अज्ञानता’ का चोगा: रिपोर्ट में प्राइवेट सेक्टर के आईसीआईसीआई (ICICI) बैंक को ‘राष्ट्रीयकृत बैंक’ बताकर साहब ने अपनी काबिलियत पर खुद ही सवालिया निशान लगा लिया है।
जब हाईकोर्ट का डंडा चलेगा, तब न नेता आएंगे न ‘बॉस’
अधिकारी यह भूल रहे हैं कि तत्कालीन डीएम प्रियंका निरंजन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए थे। अब विभाग के ही लोग अपने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए एक-दूसरे के ‘कवच’ बन रहे हैं। लेकिन यह कवच तब टूट जाएगा जब मामला उच्च न्यायालय की चौखट पर पहुंचेगा। तब न तो जनेश्वर चौधरी की सिफारिश काम आएगी और न ही नेताओं का ‘झांसा’।अधिकारी अक्सर नेताओं के दबाव या लाभ के लालच में पक्षपात करते हैं, लेकिन जब मामला कोर्ट या हाईकोर्ट पहुँचता है, तब न तो नेता बचाने आते हैं और न ही कोई ‘बॉस’ मदद करता है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि एडी हेल्थ ने सीएमओ के भ्रष्टाचार पर केवल मुहर लगाने का काम किया है। जब तत्कालीन डीएम प्रियंका निरंजन के पास यह मामला गया था, तब उन्होंने भी जांच मंडलीय स्तर के अधिकारी को सौंपी थी, लेकिन विभाग के ही अधिकारी द्वारा की गई जांच अब खुद संदेह के घेरे में है।
बड़ी बात: “पक्षपात उतना ही कीजिए जितना कानून की नजरों में पच सके। नौकरी दांव पर लगाकर किसी फर्म को लाभ पहुंचाना बहादुरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक खुदकुशी है।”
शिकायतकर्ता के साक्ष्यों ने उड़ाए अफसरों के होश
शिकायतकर्ता दीपक कुमार मिश्र ने जिस तरह साक्ष्यों के साथ विभाग को घेरा है, उससे साफ है कि भ्रष्ट अधिकारियों की राह अब आसान नहीं है। जांच रिपोर्ट के लीक होने और उसमें की गई लीपापोती ने विभाग की साख को धूल में मिला दिया है। अब देखना यह है कि शासन के उच्च अधिकारी इस ‘साठगांठ’ पर क्या कार्रवाई करते हैं या फिर बस्ती मंडल में भ्रष्टाचार की यह गंगा इसी तरह बहती रहेगी।
बस्ती की जनता पूछ रही है: साहब! नौकरी प्यारी है या नेताओं की यारी?















