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बस्ती का मुड़घाट: कागजों पर ‘स्वर्ग’, हकीकत में ‘नर्क’! सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता: अंतिम सफर में भी जिल्लत, कहाँ गया सौंदर्यीकरण का बजट?

कुआनो तट पर 'भ्रष्टाचार' की भेंट चढ़ती आस्था: नए निर्माण की चमक में पुराने खंडहरों को भूल गया प्रशासन!

अजीत मिश्रा (खोजी)

🔥बस्ती: करोड़ों का ‘नव-निर्माण’ या सिर्फ दिखावा? मुड़घाट पर दम तोड़ती व्यवस्थाएं और प्रशासन की अंधी दौड़🔥

  • शर्मनाक! अपनों को विदा करने आए लोगों को मिल रही गंदगी और बदहाली; जिम्मेदार मौन।
  • नवनिर्माण या केवल बजट खपाने का खेल? मुड़घाट की जर्जर सीढ़ियां दे रही हैं व्यवस्था को चुनौती।
  • मुड़घाट की बदहाली: विकास की अंधी दौड़ में हाशिए पर बुनियादी सुविधाएं।
  • सिर्फ पत्थर लगाने से नहीं सुधरेंगे हालात, रखरखाव के अभाव में दम तोड़ रहा बस्ती का मुख्य शवदाह स्थल।

विशेष रिपोर्ट: ब्यूरो, बस्ती मंडल

10 अप्रैल 26, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है, लेकिन बस्ती का मुड़घाट प्रशासन की संवेदनहीनता का जीवित प्रमाण बन चुका है। कुआनो नदी के पावन तट पर स्थित इस प्रमुख शवदाह स्थल की तस्वीर आज ‘चमकते नए’ और ‘सड़ते पुराने’ के बीच के उस भयानक फासले को बयां कर रही है, जिसे जिम्मेदार अधिकारी देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं।

🔥दिखावे की चमक में दफन होता यथार्थ

विभागीय फाइलें भले ही ‘सौंदर्यीकरण’ और ‘नवनिर्माण’ के दावों से भरी हों, लेकिन धरातल पर सच्चाई कड़वी है। एक ओर जहां नए कंक्रीट के ढांचे खड़े कर बजट खपाया जा रहा है, वहीं पहले से बने पुराने शवदाह शेड और प्लेटफॉर्म खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। सवाल यह है कि जब पुराने ढांचे का रख-रखाव नहीं हो सकता, तो नए निर्माण की उम्र क्या होगी? क्या यह सिर्फ ठेकेदारों की जेब भरने की कवायद है?

🔥बरसात में ‘अग्नि परीक्षा’: कहाँ जाएं शोक संतप्त परिजन?

मानसून की आहट मात्र से मुड़घाट आने वाले लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं। पुराने शेड जर्जर हैं, छतें टपक रही हैं और प्लेटफॉर्म टूटे पड़े हैं। ऐसी स्थिति में बारिश के दौरान शव का अंतिम संस्कार करना किसी नारकीय यंत्रणा से कम नहीं होता। शासन-प्रशासन के ‘स्वच्छ भारत’ के दावों की धज्जियां उड़ाता यह घाट गंदगी का अंबार बन चुका है।

🔥न सीढ़ियां, न सफाई: बुजुर्गों के लिए घाट बना ‘मुसीबत’

घाट पर नदी तक उतरने के लिए सुव्यवस्थित सीढ़ियों का अभाव प्रशासन की अदूरदर्शिता का सबसे बड़ा प्रमाण है। फिसलन भरी ढलानों पर अपनों के शव को कंधा देकर उतरना और फिर अस्थि संचय के लिए संघर्ष करना, परिजनों की भावनाओं के साथ क्रूर मजाक है। खासकर बुजुर्गों के लिए तो यहाँ तक पहुंचना किसी दुर्गम चढ़ाई को पार करने जैसा है।

“क्या अंतिम विदाई भी सम्मानजनक नहीं मिल सकती? नए निर्माण के नाम पर पुराने को सड़ने के लिए छोड़ देना प्रशासनिक अक्षमता है।” – एक स्थानीय पीड़ित नागरिक

✍️हमारा सीधा सवाल:

  • रख-रखाव के नाम पर आने वाला बजट कहाँ जाता है?
  • सिर्फ नए टेंडर निकालने में दिलचस्पी क्यों, पुराने ढांचे के जीर्णोद्धार में क्यों नहीं?
  • क्या कुआनो की पवित्रता और घाट की गरिमा को बहाल करना प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं है?

🎯जन-आक्रोश :

बस्ती की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। प्रशासन को ‘फोटो खिंचवाने वाले’ नवनिर्माणों से इतर पुराने शवदाह स्थलों के कायाकल्प, नियमित सफाई और बुनियादी सुविधाओं पर तत्काल ध्यान देना होगा। यदि अंतिम सफर में भी आम आदमी को जिल्लत झेलनी पड़े, तो इसे व्यवस्था का पतन ही कहा जाएगा।

अब समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुंभकर्णी नींद से जागें, वरना जनता का यह मौन आक्रोश किसी दिन बड़े आंदोलन की शक्ल ले लेगा।

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