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बस्ती के ‘सफेदपोश’ लुटेरे: अस्पताल की आड़ में ठगी का धंधा, 68 लाख डकार कर बैठे रसूखदार!

रिश्तों का कत्ल, भरोसे की डकैती: पति-पत्नी और भाई ने मिलकर लूटा बस्ती का विश्वास।

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में ‘पारिवारिक ठगों’ का तांडव: रसूख की आड़ में ६८ लाख डकारे, अब खाकी की सुस्ती पर सवाल!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • सावधान! बस्ती में सक्रिय है ‘पारिवारिक ठग गिरोह’, निवेश के नाम पर आपकी जमीन और जेवर पर नजर।
  • ठगों की ‘ऐश’ और पुलिस की ‘सुस्ती’: आखिर कब तक खाकी की सरपरस्ती में फलेंगे-फूलेंगे अपराधी?
  • जुल्म की पराकाष्ठा: पैसे भी हड़पे और पीड़ितों पर ही ठोक दिया SC/ST एक्ट, कहाँ है न्याय?
  • वाह रे रेड स्टार! मरीजों का इलाज कम, निवेशकों की जेब साफ करने में माहिर निकले मालिक।
  • चार गुना मुनाफे का ‘जहर’: मासूमों की गाढ़ी कमाई से ठगों ने सजाई अपनी आलीशान दुनिया।

बस्ती। ताज्जुब होता है यह देखकर कि जिस शहर को हम अपनी संस्कृति और मर्यादा के लिए जानते हैं, वहां ‘ठगी’ अब एक पारिवारिक व्यवसाय बन चुका है। ताजा मामला बस्ती के ‘रेड स्टार अस्पताल’ के मालिक और ‘एसबीजी ग्लोबल’ के कर्ता-धर्ताओं का है, जिन्होंने मिलकर न केवल ६८ लाख रुपये की चपत लगाई, बल्कि निवेश करने वालों की जिंदगी भर की कमाई को धुएं में उड़ा दिया।

सफेदपोशों का ‘काला’ खेल

​रेड स्टार अस्पताल के मालिक शैलेंद्र कुमार उर्फ राणा, प्रमेंद्र कुमार और उनकी पत्नी रिंकी के साथ अनिल यादव ने मिलकर जो जाल बुना, उसमें मध्यमवर्गीय परिवार पूरी तरह फंस गए। ठगी का यह तरीका इतना शातिराना था कि इसमें पूरे परिवार को शामिल किया गया ताकि निवेशकों को ‘ईमानदारी’ का भ्रम हो।

​”जब पूरा परिवार साथ दिखे, तो लोग भरोसा कर लेते हैं। लेकिन बस्ती के इन ठगों ने साबित कर दिया कि रिश्तों की ओट में डकैती डालना इनका पुराना पेशा है।”

 

लालच का ‘चार गुना’ चक्रव्यूह

​अविनाश चौधरी और उनके जैसे दर्जनों युवाओं ने चार गुना मुनाफे के चक्कर में अपनी जमीन बेची, गहने गिरवी रखे और कर्ज लेकर ठगों की झोली भर दी। चौंकाने वाली बात यह है कि जब इन पीड़ितों ने अपने पैसे वापस मांगे, तो ठगों ने उलटा उन पर SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया। यह सीधे तौर पर कानून का मजाक उड़ाना और पीड़ित को ही मुजरिम बना देने की सोची-समझी साजिश है।

खाकी की भूमिका पर तीखे सवाल

​सवाल यह उठता है कि क्या बस्ती पुलिस केवल ‘मूकदर्शक’ बनने के लिए है? रिपोर्ट के अनुसार:

  • ​जब मामला पुलिस के पास जाता है, तो जांच में वह तेजी क्यों नहीं दिखती?
  • ​क्या ठगों के ‘रसूख’ के आगे खाकी नतमस्तक है?
  • ​क्या जानबूझकर मामले को इतना लंबा खींचा जाता है कि ठग दूसरे जिले में जाकर नई ‘ऐशगाह’ बसा लें?

​अखबार के माध्यम से प्रशासन से यह सीधा सवाल है— आखिर कब तक बस्ती के मध्यमवर्गीय परिवारों को इन जैसे ‘नामचीन’ भेड़ियों का निवाला बनने के लिए खुला छोड़ा जाएगा? अगर पुलिस ने समय रहते इन ठगों पर नकेल नहीं कसी और पीड़ितों का पैसा वापस नहीं कराया, तो जनता का कानून व्यवस्था से भरोसा उठना तय है।

चेतावनी: निवेशक सावधान रहें! अगर कोई आपको रातों-रात अमीर बनाने का सपना दिखा रहा है, तो समझ लीजिए कि वह आपकी तिजोरी नहीं, बल्कि आपकी बर्बादी की पटकथा लिख रहा है।

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