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बस्ती जल निगम की बड़ी लापरवाही: 7 करोड़ डकार गए, पर जनता अब भी प्यासी!

साहब! कागजों पर बह रही 24 घंटे पानी की धार, धरातल पर तीन साल में सिर्फ 25% काम!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती के ‘वीआईपी’ प्यासे, फाइलों में तैर रही 24 घंटे पानी की योजना!

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)

  • अमृत योजना का ‘विष’ पी रहे आवास विकास वासी; 19 दिन बाद डेडलाइन, पर 75% काम अधूरा!
  • बस्ती में ‘नल से जल’ योजना फेल: वीआईपी कॉलोनी के 8 हजार लोग बूंद-बूंद को मोहताज, जवाबदेह कौन?
  • पाइपलाइन में फंसा ‘विकास’: बस्ती जल निगम का शर्मनाक खेल!

बस्ती। प्रदेश की योगी सरकार एक तरफ ‘हर घर नल, हर घर जल’ का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं बस्ती मंडल के मुख्यालय पर जल निगम के कारिंदों ने सरकार की साख को ‘पाइपलाइन’ में फंसाकर रख दिया है। शहर की सबसे पॉश मानी जाने वाली आवास विकास कॉलोनी, जिसे शहर का ‘वीआईपी’ इलाका कहा जाता है, आज अधिकारियों की सुस्ती और कागजी दांव-पेंच के कारण बूंद-बूंद पानी को तरस रही है।

तीन साल, 7 करोड़ का बजट और नतीजा सिर्फ 25% काम!

​हैरानी की बात यह है कि जिस अमृत योजना (फेज-2) के तहत ₹6.90 करोड़ का भारी-भरकम बजट आवंटित हुआ था, तीन साल बीत जाने के बाद भी वहां केवल 25 फीसदी काम ही धरातल पर उतर सका है। 30 मई तक योजना पूरी करने की अंतिम समय सीमा है, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी 75 फीसदी काम अधूरा पड़ा है। सवाल यह है कि आखिर तीन सालों तक जल निगम के अधिकारी क्या कुंभकर्णी नींद सो रहे थे? क्या जनता के टैक्स का पैसा सिर्फ फाइलों को मोटा करने के लिए है?

विवाद का बहाना या विभाग की नाकामी?

​जल निगम के अधिकारी अब स्थानीय नागरिकों के विरोध और जमीन न मिलने का रोना रो रहे हैं। आईटीआई परिसर में नलकूप निर्माण के लिए अब तक सहमति नहीं बन पाई है। जनता पूछ रही है कि जब योजना का खाका तैयार हुआ था, तब जमीन का चिन्हांकन और तकनीकी बाधाओं का आकलन क्यों नहीं किया गया? क्या अधिकारियों को केवल बजट आने का इंतजार था?

पॉश कॉलोनी में नरकीय जीवन

​आवास विकास कॉलोनी के 1624 घरों के करीब 8 हजार नागरिकों को 24 घंटे पानी का सपना दिखाया गया था, लेकिन इस भीषण गर्मी में उन्हें पुराने ढर्रे पर महज कुछ घंटे की आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ रहा है। 11.50 किमी पाइपलाइन बिछनी थी, लेकिन काम केवल 3.5 किमी पर ही दम तोड़ चुका है।

बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?

​सहायक अभियंता सत्यवान सिंह का कहना है कि “विरोध रुका तो तीन माह में काम पूरा होगा”, लेकिन जनता यह पूछ रही है कि पिछले तीन साल से यह ‘विरोध’ प्रबंधन की मेज पर क्यों नहीं सुलझाया गया? 19 दिन बाद समय सीमा समाप्त हो रही है, लेकिन मौके पर सन्नाटा पसरा है।

साफ है कि बस्ती जल निगम की इस सुस्ती ने सरकार की ‘पायलट प्रोजेक्ट’ योजना की धज्जियां उड़ा दी हैं। अगर समय रहते उच्च अधिकारियों ने इस पर कड़ा संज्ञान नहीं लिया, तो आवास विकास कॉलोनी की यह प्यास आने वाले नगर निकाय और विधानसभा चुनावों में सत्ता पक्ष के लिए भारी पड़ सकती है।

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