
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती बिजली विभाग की गुंडई पर चला आयोग का चाबुक: 20 साल से आदेश को रद्दी समझ रहे अफसरों का रुकेगा वेतन!
ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।
- सुधर जाओ! उपभोक्ता आयोग ने कड़ा किया रुख, आदेश न मानने वाले बिजली विभाग के अफसरों की रुकी सैलरी!
- 20 साल का इंतज़ार… और आयोग का हंटर! बस्ती के तीन बड़े बिजली अफसरों का वेतन रोकने का आदेश।
- इजरा वाद में बड़ी कार्रवाई—वेतन रोकने की तलवार लटकी, बिजली विभाग के बड़े अफसरों में हड़कंप!
बस्ती। सिस्टम की सुस्ती और अफसरों की हठधर्मी पर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने कड़ा प्रहार किया है। बस्ती मंडल में बिजली विभाग की तानाशाही का आलम यह है कि जिस मामले का फैसला 20 साल पहले हो जाना चाहिए था, उस पर विभाग के आला अफसर कुंडली मारकर बैठे हैं। आयोग के अध्यक्ष अमरजीत वर्मा ने इस लापरवाही को ‘अत्यंत गंभीर और आपत्तिजनक’ मानते हुए अधीक्षण अभियंता समेत तीन बड़े अधिकारियों का वेतन रोकने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है।
20 साल का ‘वनवास’ और अफसरों की बेशर्मी
यह मामला किसी सामान्य देरी का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता का जीता-जागता सबूत है। परिवाद संख्या 347/2000 में आयोग ने 19 फरवरी 2003 को ही अपना निर्णय सुना दिया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि दो दशक बीत जाने के बाद भी विभाग ने टस से मस होना मुनासिब नहीं समझा।
वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण कुमार उपाध्याय की प्रभावी पैरवी के बाद आयोग ने माना कि अधीक्षण अभियंता, अधिशाषी अभियंता और सहायक अभियंता जानबूझकर इस मामले को लटका रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन अधिकारियों के लिए उपभोक्ता के अधिकार और कोर्ट के आदेश महज कागजी टुकड़े हैं।
इन अधिकारियों पर गिरी गाज
आयोग ने पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम, वाराणसी के मैनेजिंग डायरेक्टर को कड़े निर्देश देते हुए कहा है कि यदि 22 मई 2026 तक आदेश का अनुपालन नहीं हुआ या प्रगति रिपोर्ट नहीं दी गई, तो निम्नलिखित अधिकारियों की जेब पर ताला लगा दिया जाए:
- खालिद सिद्दीकी (अधीक्षण अभियन्ता)
- शुभम पाण्डेय (अधिशाषी अभियन्ता)
- प्रभाकर कुमार (सहायक अभियन्ता)
पूरी व्यवस्था को चेतावनी
आयोग ने इस आदेश की प्रतिलिपि UPPCL, मंडलायुक्त बस्ती और जिलाधिकारी बस्ती को भी भेज दी है, जिससे विभाग के भीतर हड़कंप मच गया है। सवाल यह उठता है कि क्या इन सफेदपोश अफसरों को सजा मिलने के बाद ही जनता को न्याय मिलेगा?
बड़ी बात: “जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और न्यायपालिका के आदेशों का मजाक उड़ाने लगें, तो ऐसे अफसरों को कुर्सी पर रहने का कोई हक नहीं है। 20 साल का इंतजार एक उपभोक्ता के धैर्य की परीक्षा नहीं, बल्कि विभाग की नाकामी का रिपोर्ट कार्ड है।”












