
अजीत मिश्रा (खोजी)
तरेता ग्राम पंचायत में ‘खाकी’ के साये में ‘खादी’ का खेल: पेंशनधारी दरोगा प्रधान ने बेटे को कागजों में बनाया कंगाल, डकारा सरकारी पैसा
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- तरेता पंचायत में प्रधान की जालसाजी: संपन्न परिवार को बीपीएल सूची में करा दिया दर्ज, भंडाफोड़ हुआ तो शुरू की लीपापोती।
- बस्ती: दरोगा प्रधान और सेक्रेटरी की जुगलबंदी ने गरीबों के हक पर मारा डाका, बेटे के नाम पर डकारी सरकारी धनराशि।
- जालसाज प्रधान: पेंशनभोगी दरोगा ने बेटे को दिखाया कंगाल, शौचालय घोटाला उजागर होने पर मची खलबली!
- वाह रे प्रधान जी! खुद लेते हैं दरोगा की पेंशन और बेटे के लिए चाहिए ‘बीपीएल’ शौचालय; भ्रष्टाचार की खुली पोल।
बस्ती (ब्यूरो)। जनपद के साऊँघाट विकास खण्ड अंतर्गत ग्राम पंचायत तरेता से भ्रष्टाचार का एक ऐसा शर्मनाक मामला प्रकाश में आया है, जिसने पंचायती राज व्यवस्था के शुचिता के दावों की हवा निकाल दी है। यहाँ के ग्राम प्रधान, जो स्वयं पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त दरोगा हैं और सरकार से सम्मानजनक पेंशन प्राप्त कर रहे हैं, उन पर अपने पद और प्रभाव का दुरुपयोग कर सरकारी धन की बंदरबांट करने का गंभीर आरोप लगा है।साऊँघाट विकास खंड की ग्राम पंचायत तरेता में भ्रष्टाचार का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने व्यवस्था और नैतिकता दोनों पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। यहाँ के प्रधान, जो स्वयं एक सेवानिवृत्त दरोगा हैं, पर धोखाधड़ी कर अपने संपन्न परिवार को बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) सूची में शामिल कराकर सरकारी धन हड़पने का गंभीर आरोप लगा है।
दरोगा प्रधान की ‘जादुई’ जालसाजी
हैरानी की बात यह है कि ग्राम प्रधान राम सुभाव, जो स्वयं कानून के रक्षक रहे हैं, उन्होंने ही नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपने सगे पुत्र को बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) श्रेणी में दर्ज करा दिया। एक संपन्न परिवार, जिसके पास पेंशन और प्रधान पद की आय के साधन मौजूद हैं, उसे कागजों पर ‘अति निर्धन’ दिखाकर शौचालय निर्माण की धनराशि स्वीकृत कराई गई और उसे डकार लिया गया। यह न केवल वित्तीय अनियमितता है, बल्कि उन गरीब और पात्र परिवारों के हक पर डाका है जो वर्षों से एक अदद सरकारी शौचालय के लिए ब्लॉक के चक्कर काट रहे हैं।मिली जानकारी के अनुसार, तरेता के ग्राम प्रधान राम सुभाव पूर्व में पुलिस विभाग में दरोगा के पद पर तैनात थे और वर्तमान में पेंशनभोगी हैं। इसके बावजूद, उन्होंने पद और प्रभाव का दुरुपयोग करते हुए अपने पुत्र को कागजों में ‘गरीब’ दिखाया और उसे बीपीएल श्रेणी में दर्ज कराकर शौचालय निर्माण की धनराशि स्वीकृत करा ली। सवाल यह उठता है कि एक पूर्व पुलिस अधिकारी और वर्तमान प्रधान का परिवार, जो आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम है, वह बीपीएल सूची में कैसे जगह बना पाया?
सेक्रेटरी और प्रधान की ‘जुगलबंदी’ से हुआ खेल
भ्रष्टाचार की यह पटकथा बिना प्रशासनिक साठगांठ के संभव नहीं थी। चर्चा है कि तत्कालीन ग्राम पंचायत सचिव (सेक्रेटरी) ने बिना किसी भौतिक सत्यापन के प्रधान के पुत्र को गरीबी रेखा के नीचे पात्र मान लिया। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि प्रधान और सेक्रेटरी की इस ‘जुगलबंदी’ ने तरेता पंचायत को भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बना दिया है, जहाँ मनरेगा से लेकर विकास कार्यों की धनराशि में जमकर बंदरबांट की जा रही है।इस पूरे खेल में केवल प्रधान ही नहीं, बल्कि तत्कालीन ग्राम पंचायत सचिव (सेक्रेटरी) की भूमिका भी कठघरे में है। बिना सचिव की मिलीभगत और सत्यापन के किसी संपन्न व्यक्ति का नाम बीपीएल सूची में शामिल होना असंभव है। ग्रामीणों का आरोप है कि तत्कालीन सेक्रेटरी और प्रधान ने मिलकर इस भ्रष्टाचार की पटकथा लिखी और सरकारी बजट पर डाका डाला।
भंडाफोड़ होते ही मची खलबली, शुरू हुई लीपापोती
जैसे ही इस फर्जीवाड़े की सूचना सार्वजनिक हुई और मामले ने तूल पकड़ा, प्रधान खेमे में हड़कंप मच गया। खुद को कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए आनन-फानन में उस स्थान पर शौचालय का निर्माण कार्य शुरू करा दिया गया है, जिसका पैसा बहुत पहले ही निकाला जा चुका था। ग्रामीणों का तर्क है कि अब निर्माण कराना केवल एक ‘कवर-अप’ (लीपापोती) है, ताकि जाँच की स्थिति में अपनी गर्दन बचाई जा सके।भ्रष्टाचार का यह जिन्न जब बाहर निकला और मामले की चर्चा क्षेत्र में शुरू हुई, तो खुद को फंसता देख प्रधान ने आनन-फानन में शौचालय का निर्माण कार्य शुरू करवा दिया है। लेकिन जानकारों का कहना है कि निर्माण शुरू करवा देना इस वित्तीय धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेजों के अपराध को कम नहीं करता।
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
सम्पन्न होते हुए भी खुद को बीपीएल सूची में दर्ज कराना और सरकारी योजना का लाभ लेना सीधे तौर पर धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला बनता है। क्षेत्र की जनता अब जिलाधिकारी बस्ती और विकास खण्ड अधिकारी से यह सवाल पूछ रही है कि:
- क्या एक पेंशनभोगी अधिकारी का परिवार बीपीएल श्रेणी की पात्रता रखता है?
- फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी धन निकालने वाले प्रधान पर मुकदमा कब दर्ज होगा?
- भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाले तत्कालीन सेक्रेटरी पर विभागीय गाज कब गिरेगी?
यद्यपि अब आनन-फानन में निर्माण कार्य कराकर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन क्षेत्र की जनता अब जिला प्रशासन से यह मांग कर रही है कि:
- एक पेंशनधारी और संपन्न परिवार का नाम बीपीएल सूची में कैसे और किसके आदेश पर दर्ज हुआ?
- सरकारी धन के दुरुपयोग और धोखाधड़ी के मामले में दोषी प्रधान और तत्कालीन सचिव पर कड़ी कार्रवाई कब होगी?
फिलहाल, तरेता ग्राम पंचायत में मनरेगा और विकास योजनाओं के नाम पर चल रही लूट की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हैं। प्रशासन की चुप्पी इस मामले में कई संदेह पैदा कर रही है।मनरेगा और अन्य विकास कार्यों में भ्रष्टाचार की परतें अब धीरे-धीरे तरेता ग्राम पंचायत में खुल रही हैं। अब देखना यह है कि बस्ती मंडल का प्रशासन इस ‘खाकी’ से ‘खादी’ तक पहुँचे प्रधान के कारनामों पर क्या रुख अपनाता है।


















