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री-एडमिशन के नाम पर निजी स्कूलों की मनमानी फीस, अभिभावकों में उबाल

रिपोर्टर इन्द्र जीत प्रजापति
दिनांक 5-4-26
स्थान कालांवाली
जिला सिरसा हरियाणा
री-एडमिशन के नाम पर निजी स्कूलों की मनमानी फीस, अभिभावकों में उबाल

कालांवाली में निजी स्कूलों द्वारा री-एडमिशन, यूनिफॉर्म और किताबों के नाम पर भारी-भरकम शुल्क वसूले जाने की शिकायतें तेज़ी से सामने आ रही हैं। अभिभावकों का आरोप है कि नए सत्र की शुरुआत के साथ ही स्कूल प्रबंधन ने बिना किसी स्पष्ट औचित्य के फीस में बढ़ोतरी कर दी है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर आर्थिक बोझ असहनीय हो गया है। कई अभिभावकों ने बताया कि बच्चों का दोबारा प्रवेश (री-एडमिशन) कराने के नाम पर अतिरिक्त राशि ली जा रही है, जो शिक्षा विभाग के दिशा-निर्देशों से मेल नहीं खाती।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मामला यहीं तक सीमित नहीं है। स्कूलों द्वारा निर्धारित निजी दुकानों से ही यूनिफॉर्म और किताबें खरीदने का दबाव बनाया जाता है। इन दुकानों पर बाजार दर से कहीं अधिक कीमत वसूली जा रही है। अभिभावकों का कहना है कि यदि वे अन्य दुकानों से सामान खरीदना चाहें तो स्कूल प्रबंधन अप्रत्यक्ष रूप से रोक लगाता है। इससे स्पष्ट होता है कि स्कूल और दुकानों के बीच मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इस व्यवस्था ने न केवल अभिभावकों की जेब पर चोट की है, बल्कि बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित किया है।
कई परिवारों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चों की शिक्षा अब सेवा नहीं, बल्कि व्यवसाय का रूप लेती जा रही है। शिक्षा, जो एक मौलिक अधिकार है, वह अब आर्थिक क्षमता पर निर्भर होती दिखाई दे रही है। कुछ अभिभावकों ने यह भी बताया कि बढ़ती फीस और महंगे सामान के कारण उन्हें उधार लेने या जरूरी खर्चों में कटौती करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
अभिभावकों में इस स्थिति को लेकर गहरा रोष है। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन और शिक्षा विभाग ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। अभिभावकों ने शिक्षा विभाग से मांग की है कि निजी स्कूलों की फीस संरचना, री-एडमिशन शुल्क और यूनिफॉर्म-किताबों की बिक्री से जुड़े नियमों की गहन जांच की जाए। साथ ही, दोषी पाए जाने पर स्कूल प्रबंधन और संबंधित दुकानों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
यह मुद्दा अब केवल कुछ परिवारों की परेशानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक सामाजिक चिंता का विषय बन गया है। पारदर्शिता और नियमों के पालन के बिना शिक्षा व्यवस्था पर से भरोसा उठ सकता है। ऐसे में प्रशासनिक सख्ती और त्वरित कार्रवाई ही अभिभावकों को राहत दिला सकती है, ताकि हर बच्चे को निष्पक्ष, गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा मिल सके।

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