
सुरेन्द्र दुबे 9425179527 मीना अग्रवाल
नेचुरोपैथी
गुस्सा
गुस्सा इंसान की स्वाभाविक भावना है, लेकिन जब यह नियंत्रण से बाहर हो जाता है तो सबसे पहले हमें ही नुकसान पहुँचाता है। गुस्सा आने पर सामने वाले पर निकालना आसान लगता है, क्योंकि उस समय मन को लगता है कि हम सही हैं और दूसरा गलत। लेकिन सच यह है कि गुस्से में कही गई बातें और लिए गए फैसले अक्सर रिश्तों, सम्मान और भविष्य को नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए गुस्सा आने पर तुरंत प्रतिक्रिया देने की बजाय थोड़ा रुकना, गहरी सांस लेना और खुद को समय देना ज्यादा समझदारी भरा कदम होता है। गुस्सा ऊर्जा है, इसे किसी व्यक्ति पर नहीं बल्कि सही दिशा में लगाना चाहिए।

सबसे ज्यादा गुस्सा तब आता है जब हमें लगता है कि हमें सुना नहीं जा रहा या हमारी बात की कोई कीमत नहीं है। यह भावना अंदर से चोट देती है और वही चोट गुस्से के रूप में बाहर आती है। इंसान को लगता है कि उसकी समझ, उसका अनुभव और उसकी बात को नजरअंदाज किया जा रहा है। लेकिन हर व्यक्ति की सोच, समझ और समय अलग होता है। हर कोई तुरंत हमारी बात नहीं समझ सकता। ऐसे में सामने वाले को गलत साबित करने से ज्यादा जरूरी है खुद को शांत रखना और यह स्वीकार करना कि हर इंसान अपने अनुभव से सीखता है।
गुस्से के बाद मन के अंदर बहुत कुछ चलता रहता है। पहले तो थोड़ी देर के लिए हल्का महसूस होता है, लेकिन उसके बाद पछतावा, अपराधबोध और बेचैनी घेर लेती है। बार-बार वही घटना दिमाग में घूमती है और मन अशांत हो जाता है। शरीर भी थकान महसूस करता है, क्योंकि गुस्सा केवल मानसिक नहीं बल्कि शारीरिक ऊर्जा भी खर्च करता है। इसीलिए कहा जाता है कि गुस्सा एक ऐसा तूफान है जो गुजर तो जाता है, लेकिन पीछे बिखराव छोड़ जाता है।
गुस्से को रोकने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी खुद इंसान की होती है। इसके लिए अपने जीवन में अच्छे भोजन और अच्छे विचारों का होना बहुत जरूरी है। जैसा हम खाते हैं और जैसा हम देखते-सुनते हैं, वैसा ही हमारा मन बनता है। ज्यादा उत्तेजक भोजन और नकारात्मक बातें मन को अस्थिर बनाती हैं, जबकि सरल भोजन और सकारात्मक विचार मन को शांत रखते हैं। इसलिए केवल शरीर ही नहीं, मन को भी सही चीजों से पोषण देना जरूरी है।
कई बार ऐसा होता है कि हमारे पास अनुभव होता है और हम चाहते हैं कि हमारे परिवार या रिश्तेदार हमारी बात मानें, लेकिन वे नहीं सुनते और अपनी ही राह पर चलते हैं। ऐसी स्थिति में गुस्सा आना स्वाभाविक है, क्योंकि हमें लगता है कि हम उनका भला चाहते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हर इंसान अपनी गलतियों और अनुभवों से ही सीखता है। आपका अनुभव आपका है, और सामने वाले का अनुभव अलग होगा। आप रास्ता दिखा सकते हैं, लेकिन चलना उसे खुद ही पड़ेगा। बार-बार अपनी बात थोपने की कोशिश करने से केवल तनाव बढ़ता है।
इसलिए सबसे पहले खुद पर काम करना जरूरी है, क्योंकि परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुसार नहीं होंगी। असली बात यह है कि हम किसी भी स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। गुस्से के समय अगर इंसान खुद से यह पूछ ले कि उसकी प्रतिक्रिया उसे आगे ले जाएगी या पीछे, तो बहुत कुछ बदल सकता है। धीरे-धीरे वह बिना सोचे प्रतिक्रिया देने की बजाय समझदारी से जवाब देना सीख जाता है।
मन में विचार आना पूरी तरह स्वाभाविक है, लेकिन उन विचारों को पकड़कर बैठ जाना ही अहंकार की जड़ है। जब इंसान यह मान लेता है कि जो वह सोच रहा है वही सही है, तब समस्या शुरू होती है। विचार आसमान में आने वाले बादलों की तरह होते हैं, वे आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन हम उन्हें पकड़ लेते हैं, बार-बार सोचते हैं और खुद को ही परेशान करते रहते हैं।
विचारों को केवल आते-जाते देखना आसान नहीं है, इसके लिए अभ्यास और धैर्य चाहिए। जैसे चिड़िया आंधी में अपना घोंसला टूट जाने के बाद भी उसी टूटे हुए घोंसले को पकड़कर नहीं बैठती, बल्कि नया घोंसला बनाती है, वैसे ही इंसान को भी पुरानी बातों को छोड़कर आगे बढ़ना सीखना चाहिए। लेकिन इंसान अक्सर पुरानी बातों को पकड़े रहता है और खुद को ही दुख देता रहता है।
विचारों को देखने का एक सरल तरीका है कि जब भी कोई विचार आए, उसे पहचानें और बस उसका नाम देकर छोड़ दें। जैसे अगर मन में गुस्सा आए तो बस इतना समझें कि “यह गुस्सा है”, या अगर डर आए तो “यह डर है”। ऐसा करने से इंसान उस विचार से थोड़ा अलग हो जाता है और उसमें बहने से बच जाता है।
शुरुआत करने के लिए इंसान को अपने जीवन के उन पलों को याद करना चाहिए जब उसने मुश्किल परिस्थितियों को पार किया था। तब भी समय बीत गया और आज भी वह खड़ा है। इससे यह समझ आता है कि हर स्थिति और हर विचार अस्थायी है। अगर इंसान जागरूक रहकर अपने मन को देखना सीख ले, तो धीरे-धीरे गुस्सा उस पर हावी होना बंद कर देता है और वह अंदर से शांत होने लगता है।
Health is wealth
मीना अग्रवाल
आगरा






