
अजीत मिश्रा (खोजी)
🧑⚕️स्वास्थ्य विभाग की मेहरबानी या मिलीभगत? बिना हस्ताक्षर रिपोर्ट बांटने वाले केंद्र को सिर्फ ‘चेतावनी’ का झुनझुना!🧑⚕️
- बस्ती में पीसीपीएनडीटी एक्ट का जनाजा: रसूखदार सेंटर को विभाग का संरक्षण, मरीजों की जान जोखिम में!
- बड़ा सवाल: जब डॉक्टर को दस्तखत की फुरसत नहीं, तो क्या पोर्टल पर चढ़ रहा होगा मरीजों का रिकॉर्ड?
- कागजों पर ‘भूल’, पर हकीकत में बड़ा अपराध? चेतावनी देकर विभाग ने बंद की जांच की फाइल!
- सीएमओ कार्यालय की लचर कार्यप्रणाली: गंभीर अपराध पर सिर्फ ‘नोटिस-नोटिस’ का खेल, कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति!
- साहब! बिना हस्ताक्षर की रिपोर्ट रद्दी के भाव है, फिर अपराधी संचालक पर इतनी दरियादिली क्यों?
ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल। उत्तर प्रदेश
12 अप्रैल 26
बस्ती।। जिले के स्वास्थ्य महकमे में इन दिनों नियम-कानून ताक पर हैं और जवाबदेही किसी ‘बंद फाइल’ में दफन हो चुकी है। जिला अस्पताल-कैली रोड पर स्थित एक चर्चित डायग्नोस्टिक सेंटर की जो करतूत सामने आई है, वह न केवल हैरान करने वाली है, बल्कि पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट की सरेआम धज्जियां उड़ाने वाली है। लेकिन उससे भी ज्यादा शर्मनाक विभाग का वह रवैया है, जिसने इस गंभीर अपराध को महज एक ‘चेतावनी’ देकर रफा-दफा कर दिया।
🧑⚕️एक रिपोर्ट, तीन डॉक्टर और गायब हस्ताक्षर: आखिर खेल क्या है?
मामला तब गरमाया जब शिकायत मिली कि उक्त सेंटर से लंबे समय से बिना किसी चिकित्सक के हस्ताक्षर वाली अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट धड़ल्ले से बांटी जा रही है। ताज्जुब की बात यह है कि एक ही रिपोर्ट पर तीन-तीन डॉक्टरों के नाम दर्ज मिल रहे हैं। नोडल अधिकारी डॉ. एके चौधरी ने खुद स्वीकार किया कि सेंटर से पूछा गया था कि आखिर यह ‘मल्टीपल डॉक्टर’ का मायाजाल क्या है और बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट क्यों दी जा रही है?
हैरानी की बात यह है कि संचालक ने अपनी इस भारी लापरवाही को महज एक ‘भूल’ बताकर पल्ला झाड़ लिया और विभाग ने भी दरियादिली दिखाते हुए सिर्फ चेतावनी देकर मामला रफा-दफा कर दिया। क्या इंसानी जान से खिलवाड़ को सिर्फ एक ‘भूल’ मान लेना उचित है?
🧑⚕️तो क्या रिकॉर्ड में भी हो रही थी हेराफेरी?
बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट पर अब यह बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या उस सेंटर का रिकॉर्ड वाकई मेंटेन किया जा रहा था? नियमानुसार, पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत हर गर्भवती महिला के अल्ट्रासाउंड का विवरण ऑनलाइन दर्ज करना अनिवार्य है।
तर्क यह है कि जिस केंद्र के डॉक्टरों के पास रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने का समय नहीं है, वे ऑनलाइन पोर्टल पर डेटा फीडिंग की जहमत क्यों उठाएंगे? इस बात की प्रबल संभावना है कि जांच का रिकॉर्ड ही मेंटेन नहीं होता होगा। क्या यह सीधे तौर पर भ्रूण परीक्षण जैसी अवैध गतिविधियों को छिपाने की सुनियोजित साजिश तो नहीं?
🧑⚕️रसूख के आगे नतमस्तक हुआ प्रशासन
इतने बड़े अपराध के बाद विभाग की ‘लचर कार्यप्रणाली’ अब सवालों के घेरे में है। बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट की कानूनी मान्यता शून्य होती है और इसका उपयोग किसी साक्ष्य के रूप में नहीं किया जा सकता। ऐसे में अगर मरीज के साथ कोई अनहोनी हो जाए, तो क्या विभाग इसकी जिम्मेदारी लेगा?
प्रशासन से चुभते सवाल:
- जांच या दिखावा: क्या विभाग ने सिर्फ नोटिस देकर खानापूर्ति की, या वाकई में पोर्टल पर ऑनलाइन डेटा का मिलान किया गया?
- सजा का मजाक: इतने गंभीर उल्लंघन पर ‘चेतावनी’ देना अपराधियों को संरक्षण देने जैसा नहीं है?
- डीएम की चुप्पी: पीसीपीएनडीटी कमेटी की अध्यक्षता करने वाले जिला मजिस्ट्रेट इस मामले में निष्पक्ष जांच और सख्त दंडात्मक कार्रवाई कब सुनिश्चित करेंगे?
जनता की जान से खिलवाड़ कब तक?
जिले की जनता अब यह पूछ रही है कि रसूखदार सेंटर संचालकों के लिए नियम इतने ढीले क्यों हैं? जब तक ऐसे केंद्रों का लाइसेंस रद्द कर उन पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होती, तब तक स्वास्थ्य विभाग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान उठते रहेंगे।
प्रशासन को चाहिए कि वह चेतावनी का मोह छोड़कर इस पूरे ‘सिंडिकेट’ की तह तक जाए। अगर रिकॉर्ड में हेराफेरी पाई जाती है, तो सेंटर को तत्काल सील कर ऐसी मिसाल पेश की जाए कि दोबारा कोई मरीजों की जिंदगी और कानून के साथ खिलवाड़ करने की जुर्रत न करे।

















