
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिस्टम की नसों में ‘फर्जीवाड़े’ का जहर: कब जागेगा बस्ती का स्वास्थ्य महकमा?
- ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर: रिपोर्ट नहीं, मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ का ‘डेथ वारंट’!
- कागजों पर जांच, हकीकत में धोखा; बस्ती के स्वास्थ्य तंत्र को आखिर किसका संरक्षण?
- CMO साहब जवाब दें! एक महीने से जांच की फाइल पर धूल क्यों जम रही है?
- अधिकारियों की चुप्पी या मिलीभगत? ओझा डायग्नोस्टिक पर कार्रवाई से क्यों कांप रहे हाथ?
- बस्ती मंडल में ‘जांच माफिया’ सक्रिय: बिना विशेषज्ञ के चल रहे लैब, प्रशासन की नींद कब टूटेगी?
- सावधान! बस्ती में रिपोर्ट डॉक्टर नहीं, ‘लापरवाही’ तैयार करती है।
- स्वास्थ्य सेवाओं का ‘जनाजा’: जब जांच रिपोर्ट ही संदेह के घेरे में हो, तो इलाज पर कैसे करें भरोसा?
- सेवा या लूट? ओझा डायग्नोस्टिक की कारगुजारी ने पूरे सिस्टम को किया शर्मसार।
ब्यूरो रिपोर्ट, बस्ती मंडल | 13 अप्रैल 2026
बस्ती। स्वास्थ्य सेवा को ‘सेवा’ कहना अब शायद इस शहर के साथ सबसे बड़ा मजाक होगा। जब कैली रोड स्थित ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर जैसे संस्थानों से बिना डॉक्टर के हस्ताक्षर वाली ‘हवाई’ रिपोर्टें निकलने लगें, तो समझ लीजिए कि बस्ती का स्वास्थ्य तंत्र वेंटिलेटर पर है। यह केवल एक सेंटर की लापरवाही नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे पनप रहा एक संगठित अपराध है।
जांच के नाम पर ‘तारीख पर तारीख’ का खेल
हैरानी की बात यह है कि मामला सामने आए एक महीने से अधिक बीत चुका है। मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) डॉ. राजीव निगम ने आदेश दिए, एसीएमओ डॉ. अशोक कुमार चौधरी को जांच सौंपी गई, लेकिन नतीजा? शून्य। सवाल यह है कि क्या यह जांच रिपोर्ट भी उन्हीं बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्टों की तरह किसी अंधेरे कोने में पड़ी धूल फांक रही है? एक महीने का समय क्या दोषियों को सबूत मिटाने के लिए दिया गया है या फिर स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती किसी ‘अदृश्य दबाव’ का परिणाम है?
मरीजों की जान से ‘सौदा’ क्यों?
एक मरीज जब डायग्नोस्टिक सेंटर जाता है, तो वह अपनी मेहनत की कमाई के साथ-साथ अपनी जिंदगी की उम्मीद भी सौंपता है। अगर डॉक्टर के हस्ताक्षर के बिना रिपोर्ट जारी हो रही है, तो इसका सीधा मतलब है:
- जांच किसी योग्य विशेषज्ञ ने नहीं, बल्कि नौसिखियों ने की है।
- मशीनों और मानको की कोई प्रामाणिकता नहीं है।
- संस्थान केवल ‘नोट छापने की मशीन’ बन चुका है, जिसे मरीज की जान की रत्ती भर परवाह नहीं।
ऐसी फर्जी रिपोर्टों के आधार पर अगर डॉक्टर गलत इलाज शुरू कर दे, तो होने वाली मौत का जिम्मेदार कौन होगा? क्या ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर इसके लिए तैयार है? या फिर स्वास्थ्य विभाग ने इसे ‘रूटीन की चूक’ मानकर फाइल बंद करने का मन बना लिया है?
प्रशासनिक नपुंसकता या मिलीभगत?
बस्ती जैसे उभरते शहर में निजी सेंटरों की बाढ़ आ गई है, लेकिन उन पर लगाम कसने वाला कोई नहीं। नियम कहते हैं कि हर रिपोर्ट डिजिटल रूप से सत्यापित और अधिकृत डॉक्टर द्वारा हस्ताक्षरित होनी चाहिए। जब खुलेआम इन नियमों की धज्जियाँ उड़ रही हैं, तो नियामक तंत्र की चुप्पी आपराधिक मिलीभगत की ओर इशारा करती है।
सीधा सवाल: क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? क्या गरीबों की जान इतनी सस्ती है कि रसूखदारों के ‘धंधे’ को बचाने के लिए जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए?
अब आर-पार की कार्रवाई जरूरी
अब केवल जांच के आदेश से काम नहीं चलेगा। बस्ती की जनता को जवाब चाहिए। प्रशासन को चाहिए कि:
- तत्काल प्रभाव से ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर का लाइसेंस रद्द हो।
- जांच में देरी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
- जिले के सभी निजी सेंटरों का ‘सरप्राइज ऑडिट’ हो ताकि फर्जीवाड़े के इस मकड़जाल को तोड़ा जा सके।
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर जो ‘खूनी खेल’ चल रहा है, उसने अब मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। कैली रोड स्थित ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर का ताजा प्रकरण महज एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आम नागरिक की हत्या की साजिश जैसा है। जब पैथोलॉजी की रिपोर्ट पर किसी अधिकृत डॉक्टर के हस्ताक्षर ही न हों, तो वह कागज का टुकड़ा रिपोर्ट नहीं, बल्कि किसी के जीवन के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है।
1. जांच के नाम पर ‘लीपापोती’ की रणनीति
एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की फाइलें कछुए की गति से भी धीमी चल रही हैं। मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) डॉ. राजीव निगम द्वारा गठित जांच कमेटी, जिसकी कमान एसीएमओ डॉ. अशोक कुमार चौधरी के हाथों में है, अब तक किसी नतीजे पर क्यों नहीं पहुँची?
यह देरी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
- क्या जांच अधिकारियों पर किसी सफेदपोश राजनेता या रसूखदार का दबाव है?
- क्या ‘जांच’ का नाटक सिर्फ जनता के गुस्से को शांत करने के लिए रचा गया है?
- एक महीने का समय क्या दोषियों को दस्तावेजी हेरफेर करने के लिए दिया गया है?
2. बिना हस्ताक्षर की रिपोर्ट: एक तकनीकी अपराध
मेडिकल एथिक्स और ‘क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के अनुसार, बिना किसी एमडी (MD) पैथोलॉजिस्ट या विशेषज्ञ डॉक्टर के हस्ताक्षर के कोई भी डायग्नोस्टिक रिपोर्ट मान्य नहीं है। ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर द्वारा बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्टें जारी करना यह दर्शाता है कि यहाँ मशीनें तो हैं, लेकिन विशेषज्ञ नदारद हैं। मरीज इस रिपोर्ट को लेकर विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाता है, और उसी आधार पर दवाइयां शुरू होती हैं। यदि रिपोर्ट ही गलत या अप्रमाणित है, तो इलाज कैसे सही होगा? यह सीधा-सीधा मरीजों को ‘गलत इलाज’ की भट्टी में झोंकने जैसा है।
3. ‘नोट छापने की मशीन’ बने निजी सेंटर
बस्ती शहर में कुकुरमुत्ते की तरह उगे निजी डायग्नोस्टिक सेंटर सेवा के बजाय ‘मुनाफाखोरी के अड्डे’ बन चुके हैं। लागत कम करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों को नहीं रखा जाता और तकनीशियनों के भरोसे ही बड़ी-बड़ी जांचें कर दी जाती हैं। ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर का मामला तो बस ‘हिमशैल का सिरा’ (tip of the iceberg) है; जिले में न जाने ऐसे कितने सेंटर हैं जो बिना किसी मानक के संचालित हो रहे हैं।
4. नियामक तंत्र की ‘अपराधिक चुप्पी’
स्वास्थ्य विभाग का काम केवल शिकायत मिलने पर जागना नहीं है, बल्कि नियमित रूप से इन केंद्रों का निरीक्षण करना है। अगर ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर में यह अनियमितता लंबे समय से चल रही थी, तो अब तक विभाग की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? क्या स्वास्थ्य विभाग के निरीक्षक केवल ‘मासिक वसूली’ तक ही सीमित रह गए हैं?
प्रशासन से तीखे सवाल:
- लाइसेंस रद्द क्यों नहीं?: इतनी बड़ी गड़बड़ी के बाद भी सेंटर को सील क्यों नहीं किया गया? क्या प्रशासन किसी की जान जाने का इंतजार कर रहा है?
- अस्पतालों के साथ साठगांठ: क्या शहर के बड़े डॉक्टरों और इन सेंटरों के बीच कोई ‘कमीशन का खेल’ चल रहा है, जिसके कारण बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्टें भी स्वीकार की जा रही हैं?
- जनता का भरोसा: अगर सरकारी तंत्र ही दोषियों को संरक्षण देगा, तो गरीब जनता न्याय के लिए किसके पास जाएगी?
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर जो ‘खूनी खेल’ चल रहा है, उसने अब मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। कैली रोड स्थित ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर का ताजा प्रकरण महज एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आम नागरिक की हत्या की साजिश जैसा है। जब पैथोलॉजी की रिपोर्ट पर किसी अधिकृत डॉक्टर के हस्ताक्षर ही न हों, तो वह कागज का टुकड़ा रिपोर्ट नहीं, बल्कि किसी के जीवन के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है।
1. जांच के नाम पर ‘लीपापोती’ की रणनीति
एक महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की फाइलें कछुए की गति से भी धीमी चल रही हैं। मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) डॉ. राजीव निगम द्वारा गठित जांच कमेटी, जिसकी कमान एसीएमओ डॉ. अशोक कुमार चौधरी के हाथों में है, अब तक किसी नतीजे पर क्यों नहीं पहुँची?
यह देरी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
- क्या जांच अधिकारियों पर किसी सफेदपोश राजनेता या रसूखदार का दबाव है?
- क्या ‘जांच’ का नाटक सिर्फ जनता के गुस्से को शांत करने के लिए रचा गया है?
- एक महीने का समय क्या दोषियों को दस्तावेजी हेरफेर करने के लिए दिया गया है?
2. बिना हस्ताक्षर की रिपोर्ट: एक तकनीकी अपराध
मेडिकल एथिक्स और ‘क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट’ के अनुसार, बिना किसी एमडी (MD) पैथोलॉजिस्ट या विशेषज्ञ डॉक्टर के हस्ताक्षर के कोई भी डायग्नोस्टिक रिपोर्ट मान्य नहीं है। ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर द्वारा बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्टें जारी करना यह दर्शाता है कि यहाँ मशीनें तो हैं, लेकिन विशेषज्ञ नदारद हैं। मरीज इस रिपोर्ट को लेकर विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाता है, और उसी आधार पर दवाइयां शुरू होती हैं। यदि रिपोर्ट ही गलत या अप्रमाणित है, तो इलाज कैसे सही होगा? यह सीधा-सीधा मरीजों को ‘गलत इलाज’ की भट्टी में झोंकने जैसा है।
3. ‘नोट छापने की मशीन’ बने निजी सेंटर
बस्ती शहर में कुकुरमुत्ते की तरह उगे निजी डायग्नोस्टिक सेंटर सेवा के बजाय ‘मुनाफाखोरी के अड्डे’ बन चुके हैं। लागत कम करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों को नहीं रखा जाता और तकनीशियनों के भरोसे ही बड़ी-बड़ी जांचें कर दी जाती हैं। ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर का मामला तो बस ‘हिमशैल का सिरा’ (tip of the iceberg) है; जिले में न जाने ऐसे कितने सेंटर हैं जो बिना किसी मानक के संचालित हो रहे हैं।
4. नियामक तंत्र की ‘अपराधिक चुप्पी’
स्वास्थ्य विभाग का काम केवल शिकायत मिलने पर जागना नहीं है, बल्कि नियमित रूप से इन केंद्रों का निरीक्षण करना है। अगर ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर में यह अनियमितता लंबे समय से चल रही थी, तो अब तक विभाग की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? क्या स्वास्थ्य विभाग के निरीक्षक केवल ‘मासिक वसूली’ तक ही सीमित रह गए हैं?
प्रशासन से तीखे सवाल:
- लाइसेंस रद्द क्यों नहीं?: इतनी बड़ी गड़बड़ी के बाद भी सेंटर को सील क्यों नहीं किया गया? क्या प्रशासन किसी की जान जाने का इंतजार कर रहा है?
- अस्पतालों के साथ साठगांठ: क्या शहर के बड़े डॉक्टरों और इन सेंटरों के बीच कोई ‘कमीशन का खेल’ चल रहा है, जिसके कारण बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्टें भी स्वीकार की जा रही हैं?
- जनता का भरोसा: अगर सरकारी तंत्र ही दोषियों को संरक्षण देगा, तो गरीब जनता न्याय के लिए किसके पास जाएगी?
अगर आज कार्रवाई नहीं हुई, तो कल हर गली-नुक्कड़ पर ऐसे ‘मौत के केंद्र’ खुलेंगे और आम नागरिक केवल एक ‘आंकड़ा’ बनकर रह जाएगा। जागिए साहब! इससे पहले कि बस्ती का भरोसा सिस्टम से पूरी तरह उठ जाए।























