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ज़मीन निगल रही ज़िंदगियाँ, और तंत्र सो रहा गहरी नींद

तंत्र की ‘लीपापोती’ और गरीबों की जान—सोनारडीह की चीखें कब सुनेगा प्रशासन?

कतरास / बीसीसीएल (BCCL) पिछले 50 वर्षों से इस क्षेत्र की कोख से कोयला निकाल रही है, लेकिन इसके बदले स्थानीय निवासियों को क्या मिला? पिछले कुछ वर्षों का इतिहास उठा कर देखें, तो भू-धसान (Land Subsidence) की खबरें सुर्खियों में तो रहती हैं, पर समाधान के नाम पर ‘शून्य’ दिखाई देता है। आज भी हजारों लोग मौत के मुहाने पर बसे हैं, लेकिन सरकारी तंत्र जांच के नाम पर केवल फाइलों का पेट भरता है।

1″मेरे परिवार को गड्ढे से निकाल दो” बीसीसीएल एरिया 3 के सोनारडीह ओपी क्षेत्र अंतर्गत टंडाबारी में हुई हृदय विदारक घटना ने एक बार फिर रोंगटे खड़े कर दिए हैं। जब बाघमारा विधायक शत्रुघ्न महतो पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे, तो वहां का मंजर देखकर हर किसी की आँखें नम हो गईं।
परिजनों के विलाप ने सिस्टम की पोल खोल दी। रोती-बिलखती महिलाओं ने विधायक के सामने अपना दर्द बयां करते हुए कहा:
> “यहाँ धड़ल्ले से अवैध कोयला निकाला जा रहा है। मेरा परिवार वहां काम करने नहीं जाता था, हमने उनका एक रुपया नहीं खाया। बस मेरे परिवार को उस गड्ढे से निकाल दो…”
>
यह करुणा भाव और लाचारी वहां खड़े हर व्यक्ति के दिल को चीर रही थी। सवाल उठता है कि जब आम जनता को पता है कि कहाँ अवैध खनन हो रहा है, तो भारी-भरकम तंत्र और सुरक्षा एजेंसियां इससे बेखबर कैसे हैं?
क्यों ठंडे बस्ते में चली जाती है जांच?
जब भी ऐसी बड़ी घटनाएं होती हैं, प्रशासन ‘जांच कमेटी’ गठित कर औपचारिकता पूरी कर लेता है। लेकिन कड़वा सच यह है कि कुछ दिनों बाद मामला ‘लीपापोती’ की भेंट चढ़ जाता है।
* क्या गरीबों की जान की कोई कीमत नहीं है?
* अवैध खनन का सिंडिकेट: क्या तंत्र और खनन माफियाओं की मिलीभगत इतनी गहरी है कि बेगुनाहों की मौत पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती?
* असुरक्षित बस्तियां: बीसीसीएल और प्रशासन ने वर्षों से असुरक्षित घोषित बस्तियों के पुनर्वास के लिए कोई ठोस पहल क्यों नहीं की?
अब और कितना बलिदान?
टंडाबारी की घटना ने स्थानीय लोगों को झकझोर कर रख दिया है। लोग अब खुलकर पूछ रहे हैं कि आखिर हम क्या करें? जब रक्षक ही मौन हो जाएं, तो गरीब किसके पास जाए? यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उन लोगों के प्रति तंत्र की क्रूरता है जो कोयले की इस काली दुनिया में अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं।
आखिर कब तक इन गरीबों की जान जाती रहेगी? क्या प्रशासन किसी बड़े नरसंहार का इंतज़ार कर रहा है या फिर इस बार ‘लीपापोती’ की जगह ‘इंसाफ’ होगा?
यह एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील विषय है। धनबाद के कोयला क्षेत्रों में बीसीसीएल (BCCL) की कार्यप्रणाली और अवैध खनन के कारण होने वाली दुर्घटनाएं सिर्फ ‘हादसे’ नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक हैं

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