
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिद्धार्थनगर सिंचाई घोटाला: फाइलों में ‘AI’ का जादू, धरातल पर धूल और झाड़ू! 5 करोड़ के ‘डिजिटल भ्रष्टाचार’ की टीएसी जांच से विभाग में हड़कंप; क्या तकनीक बनी लूट का नया हथियार?
ब्यूरो/ सिद्धार्थनगर (बस्ती मंडल)
- इंजीनियरों की डिजिटल बाजीगरी: एआई से बनाई सड़कों की फोटो, बिना काम किए ले लिया भुगतान!
- गजब! सिद्धार्थनगर में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ से साफ हो गई नहरें, किसानों को पता तक न चला!
- इंजीनियरों का ‘कमाल’: लैपटॉप पर बिछाई सड़कें, माउस से साफ कर दीं नहरें; डकारे 5 करोड़!
- सिंचाई विभाग में ‘डिजिटल लूट’: सरकारी खजाने पर एआई (AI) का ‘डाका’, टीएसी जांच में फंसी गर्दन!
- 25 जनवरी का वीडियो बना गले की फांस, टीएसी टीम ने खंगाले भ्रष्टाचार के साक्ष्य!
- बिना फावड़ा चले साफ हो गई नहर! सिद्धार्थनगर सिंचाई विभाग के ‘डिजिटल खेल’ की लखनऊ तक गूँज।
- सिल्ट सफाई के नाम पर ‘सफेद झूठ’: 5 करोड़ का वारा-न्यारा करने वाले इंजीनियरों पर कस सकता है शिकंजा
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को चुनौती देते हुए सिद्धार्थनगर के सिंचाई विभाग (ड्रेनेज खंड) में एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसने तकनीकी विशेषज्ञों को भी चकित कर दिया है। आरोप है कि विभाग ने सरकारी धन को डकारने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा लेकर फर्जी ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ तैयार की। बिना फावड़ा चले और बिना पसीना बहाए, फाइलों में नहरें चमक उठीं और सड़कों का कायाकल्प हो गया। देखते ही देखते करीब 5 करोड़ रुपये के सरकारी बजट का बंदरबांट कर लिया गया।साइबर अपराधी तो अब तक एआई (AI) का इस्तेमाल ठगी के लिए करते थे, लेकिन सिद्धार्थनगर में सरकारी सिस्टम ने ही इस तकनीक को ‘लूट’ का हथियार बना लिया है। सिंचाई विभाग के ड्रेनेज खंड में भ्रष्टाचार का एक ऐसा “डिजिटल मॉडल” सामने आया है, जिसने शासन के भी होश उड़ा दिए हैं। आरोप है कि विभाग ने एआई तकनीक से फर्जी तस्वीरें तैयार कर फाइलों में काम को चकाचक दिखाया और सरकारी खजाने से करीब 5 करोड़ रुपये का वारा-न्यारा कर दिया।
मामले की गूँज लखनऊ तक पहुँचने के बाद शासन की टीएसी (Technical Advisory Committee) टीम ने गुपचुप तरीके से सिद्धार्थनगर में डेरा डाला और जांच पूरी कर ली है।
शिकायत की ‘चिंगारी’ से सुलग रहा है विभाग
भ्रष्टाचार के इस हाईटेक खेल का खुलासा तब हुआ जब भाजपा के मंडल महामंत्री (हरदी, बस्ती) अमर बहादुर सिंह ने साक्ष्यों के साथ मंडलायुक्त से शिकायत की। उन्होंने आरोप लगाया कि सिंचाई विभाग के ड्रेनेज खंड के चतुर्थ उपखंड में नौगढ़, अंतरी माइनर और सिसवा नेउरा जैसी महत्वपूर्ण नहरों पर सिल्ट सफाई (कीचड़ निकालना) और तटबंध मरम्मत के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए गए हैं।भाजपा मंडल महामंत्री (हरदी, बस्ती) अमर बहादुर सिंह की शिकायत ने इस महाघोटाले की परतें खोल दी हैं। शिकायत के अनुसार:
- डिजिटल हेराफेरी: नौगढ़ व अंतरी माइनर समेत कई जगहों पर सिल्ट सफाई, विशेष मरम्मत और सड़क निर्माण का काम सिर्फ कंप्यूटर स्क्रीन पर हुआ। एआई के जरिए ऐसी तस्वीरें बनाई गईं कि देखने वाले को काम शत-प्रतिशत लगे।
- भ्रष्टाचार की ‘कलई’ खुली: भीमापार से बसौना तक करीब 3 किमी के दायरे में विभाग ने सिल्ट सफाई का दावा किया, लेकिन मौके पर नहरें झाड़ियों से अटी पड़ी हैं।
- सबूत बनाम सरकारी दांव: विभाग ने नवंबर-दिसंबर में काम पूरा होना बताया, जबकि 25 जनवरी का ‘जियो-टैग्ड’ वीडियो (जिसमें अक्षांश-देशांतर दर्ज है) विभाग के झूठ की गवाही दे रहा है।
भाजपा नेता का सबसे गंभीर आरोप यह है कि विभागीय अधिकारियों ने एआई (AI) जनित तस्वीरों का उपयोग कर उन स्थानों पर भी काम पूरा दिखा दिया, जहाँ वास्तव में झाड़ियां उगी हुई थीं। शासन ने इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए टीएसी (Technical Advisory Committee) की टीम को जांच के लिए भेजा, जो हाल ही में मौके से साक्ष्य जुटाकर लौटी है।
ग्राउंड रिपोर्ट: जहाँ काम का दावा, वहां ‘जंगल’ का नजारा
अखबार की पड़ताल में शिकायत के आरोपों को काफी हद तक मजबूती मिली है। विभाग के कागजों और धरातल की हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर दिखा:
- नौगढ़ माइनर का सच: भीमापार से बसौना तक लगभग 3 किलोमीटर के क्षेत्र में विभाग ने ‘व्यापक सिल्ट सफाई’ का दावा किया है। लेकिन मौके पर नहर के किनारों पर बड़ी-बड़ी झाड़ियाँ उगी हैं और पानी का रास्ता सिल्ट (मिट्टी) से अवरुद्ध है।
- वीडियो साक्ष्य ने फंसाया: विभाग ने दावा किया कि नवंबर-दिसंबर में काम पूरा हो गया था। लेकिन 25 जनवरी को सेमरियांव के पास बनाए गए एक वीडियो ने पोल खोल दी। इस वीडियो में जीपीएस कोऑर्डिनेट्स (अक्षांश-देशांतर) और तारीख दर्ज है, जिसमें नहर पूरी तरह चोक दिखाई दे रही है।
- ग्रामीणों का आक्रोश: रेहरा निवासी अरुण मिश्रा ‘बबलू’ बताते हैं कि पिछले साल जून में ग्रामीणों के कड़े विरोध और तत्कालीन डीएम से शिकायत के बाद नाममात्र की सफाई हुई थी, उसके बाद से कोई विभागीय कर्मचारी यहाँ नहीं दिखा।
विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, वानगंगा नहर प्रणाली और जमींदारी नहर प्रणाली के अनुरक्षण के नाम पर लगभग 2.28 करोड़ रुपये (1.38 लाख + 90 लाख) ठिकाने लगाए गए हैं। निविदा संख्या-03/अधी.अभि./2025-26 के तहत जो काम अंतरी और नौगढ़ माइनर पर होने थे, उन्हें दूसरी जगह दिखाकर फर्जी भुगतान ले लिया गया।
जनता की आवाज: “नहर की सफाई तो दूर की बात, पिछले साल जून में ग्रामीणों के हंगामे के बाद थोड़ी मिट्टी निकाली गई थी। अब जो हाल है, उसे देखकर लगता ही नहीं कि यहाँ कभी सरकारी लेबर या मशीनें आई थीं।”— अरुण मिश्रा ‘बबलू’, स्थानीय निवासी (रेहरा)
बजट का गणित: कहाँ-कहाँ हुआ ‘खेल’?
विभागीय अभिलेखों की मानें तो बजट को दो मुख्य मदों में ठिकाने लगाया गया:
- वानगंगा नहर प्रणाली: एनुअल रिपेयर (वार्षिक मरम्मत) के नाम पर 1.38 करोड़ रुपये।
- जमींदारी नहर प्रणाली: अनुरक्षण (Maintenance) के नाम पर करीब 90 लाख रुपये।
- अन्य कार्य: विशेष मरम्मत, सड़क नवीनीकरण और गड्ढामुक्ति के नाम पर भी करोड़ों की निकासी की गई।
हैरानी की बात यह है कि निविदा संख्या 03/अधी.अभि./2025-26 में जिन स्थानों का उल्लेख था, बाद में उन स्थानों को बदलकर अन्य फर्जी लोकेशन के आधार पर भुगतान ले लिया गया।
साहब बोले- सब ठीक है, शिकायतें मनगढ़ंत
घोटाले की खबरों के बीच विभाग पूरी तरह बचाव की मुद्रा में है। अधिशासी अभियंता ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे विभाग की छवि धूमिल करने की कोशिश बताया है।
अधिकारी का पक्ष: “सभी आरोप निराधार हैं। एआई (AI) से फोटो बनाने जैसी कोई बात नहीं है। मौके पर काम कराया गया है। टीएसी टीम और जिलाधिकारी जांच कर चुके हैं, कहीं कोई कमी नहीं मिली है।” — कृपाशंकर भारती, अधिशासी अभियंता (ड्रेनेज खंड)
इस पूरे प्रकरण पर ड्रेनेज खंड के अधिशासी अभियंता कृपाशंकर भारती का रुख बेहद रक्षात्मक है। उनका कहना है, “एआई से फोटो बनाने की बात महज एक कल्पना है। मौके पर काम हुआ है और जिलाधिकारी स्वयं सड़कों का निरीक्षण कर चुके हैं।”
हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि यदि काम हुआ है, तो 25 जनवरी के जियो-टैग्ड वीडियो में नहरें बदहाल क्यों दिख रही हैं? और टीएसी की टीम को आनन-फानन में लखनऊ से सिद्धार्थनगर क्यों आना पड़ा?
आगे क्या?
सूत्रों की मानें तो टीएसी टीम अपनी गोपनीय रिपोर्ट शासन को सौंपने वाली है। यदि एआई के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो यह प्रदेश का अपनी तरह का पहला मामला होगा जहाँ तकनीक का इस्तेमाल भ्रष्टाचार को ‘परफेक्ट’ बनाने के लिए किया गया। बस्ती मंडल के किसानों की निगाहें अब जांच के नतीजों पर टिकी हैं, क्योंकि उनके हिस्से का पानी और पैसा, दोनों भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं।
शिकायतकर्ता ने साक्ष्यों के साथ मंडलायुक्त, प्रमुख सचिव और प्रमुख अभियंता तक दस्तक दी है। अब गेंद शासन के पाले में है। अगर एआई के जरिए फर्जीवाड़े की पुष्टि होती है, तो यह उत्तर प्रदेश के सबसे हाईटेक घोटालों में से एक होगा। सवाल यह है कि क्या टीएसी की रिपोर्ट फाइलों में दब जाएगी या भ्रष्टाचारियों पर बुलडोजर चलेगा?




















