
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: बस्ती मंडल
सड़कों पर दौड़ता ‘शैतानी शोर’: क्या कुंभकर्णी नींद में है बस्ती पुलिस और आरटीओ?
- “खाकी की वीरता: हेलमेट पर ‘कारबाइन’ सा कैमरा, पर डीजे वाले ‘भोंपुओं’ के सामने घुटने!”
- “साहब! जब डैशबोर्ड पर बोतल रखना जायज़ नहीं, तो ट्रकों पर ये ‘म्यूजिक सिस्टम’ कैसा?”
- “कानून के कान फटे या प्रशासन ने डाल रखी है रुई? बस्ती की सड़कों पर ‘तांडव’ करता शोर।”
- “सभ्यता का गला घोंटते ‘मोबाइल डीजे’: आरटीओ की मेहरबानी या वर्दी की लाचारी?”
- “सड़क पर सामान कम, ‘शैतानी शोर’ ज्यादा: क्या बस्ती पुलिस को धमाकों का इंतज़ार है?”
बस्ती। सरकार के सख्त निर्देश हैं, माननीय अदालत की तीखी टिप्पणी है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कड़े मानक भी हैं। बावजूद इसके, बस्ती की सड़कों पर ‘जाहिलियत’ का शोर सीना तानकर दौड़ रहा है। सवाल यह है कि आखिर मोटर वाहनों पर लगे इन जानलेवा ध्वनि विस्तारक यंत्रों पर खाकी का हंटर कब चलेगा?
सभ्यता बनाम जाहिलियत की जंग
पढ़े-लिखे और सभ्य समाज में संगीत सुकून का माध्यम है, लेकिन कुछ ‘विशेष’ मानसिकता वाले लोगों के लिए शोर ही सुख है। विडंबना देखिए कि 5 किलो मुफ्त राशन पर गुजर-बसर करने वाले कुछ लोग और तथाकथित ‘असुरक्षित’ बस्तियों के हुड़दंगी, डीजे की आवाज जब तक अंतिम सीमा तक न पहुंचा दें, तब तक उन्हें उत्सव का आनंद नहीं आता। यह मानसिक दिवालियापन अब राहगीरों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
ट्रक-ट्रैक्टर या ‘चलता-फिरता’ डीजे घर?
हैरानी की बात तो यह है कि बालू, मिट्टी और ईंट ढोने वाले ट्रकों और ट्रैक्टरों पर अब सामान से ज्यादा जगह बड़े-बड़े डीजे सेट और भारी-भरकम साउंड सिस्टम ले रहे हैं। इन ‘तीखे भोंपुओं’ को गाड़ियों के माथे पर इस शान से लगाया गया है, जैसे ये किसी कानून व्यवस्था संभालने वाले क्षेत्राधिकारी (CO) की गाड़ियाँ हों। सड़क पर चलते समय इन वाहनों के इंजन की आवाज कम और इन अवैध यंत्रों का शोर ज्यादा सुनाई देता है, जिससे पीछे चल रहे वाहन सवार का मानसिक संतुलन बिगड़ना तय है।
कुतर्कों का बाजार: ‘स्टीरियो है तो बजाएंगे’
जब इन शोरबाजों को टोका जाता है, तो कुतर्क सामने आता है— “कंपनी ने साउंड सिस्टम दिया है, तो क्यों न बजाएं?”
करारा जवाब यह है: कंपनियों ने तो डैशबोर्ड पर गिलास और बोतल रखने की जगह भी दी है, तो क्या शराब पीकर गाड़ी चलाना जायज़ हो जाएगा? सुविधा और शौक के नाम पर दूसरों की जान से खिलवाड़ करने का हक इन उपद्रवियों को किसने दिया?
यातायात पुलिस की ‘वीरता’ पर सवाल
चौराहों पर हेलमेट और सीट बेल्ट न दिखने पर अपनी मोबाइल रूपी ‘राइफल’ और ‘कार्बाइन’ निकालकर फोटो खींचने वाले यातायात पुलिस के वीर जवानों की वीरता से जनता भली-भांति परिचित है। चालान का लक्ष्य पूरा करने में माहिर पुलिस को क्या इन वाहनों पर लदे ‘ध्वनि विस्तारक यंत्र’ दिखाई नहीं देते? या फिर इन पर कार्रवाई करने में हाथ-पांव फूलते हैं?
मांग: लोकहित में हो कड़क कार्रवाई
ऊंची आवाज के कारण हृदय गति रुकने, मानसिक तनाव और सड़क दुर्घटनाओं की खबरें आम हो गई हैं। अब समय आ गया है कि:
- आरटीओ (RTO) और स्थानीय पुलिस थानों को प्राथमिकता के आधार पर इन ‘नाजायज’ वाहनों का कड़क चालान करना चाहिए।
- सिर्फ फोटो खींचने तक सीमित न रहकर, इन अवैध साउंड सिस्टमों को जब्त किया जाए।
- ऐसे वाहनों का रजिस्ट्रेशन निरस्त हो, ताकि लोग सबक ले सकें।
बस्ती मंडल की जनता पूछ रही है— साहब, लोकहित में भारी-भरकम चालान की यह ‘वीरता’ कब शुरू होगी?




















