
अजीत मिश्रा (खोजी)
जनता की जान से खिलवाड़: ‘मौत के तहखानों’ में कब तक तड़पेगी बस्ती की स्वास्थ्य व्यवस्था?
ब्यूरो, बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)।
- स्वास्थ्य महकमे की नाक के नीचे ‘यमराज’ का धंधा: नाम बदलकर दोबारा खोला मौत का कुआँ, छापेमारी में खुली पोल!
- बस्ती स्वास्थ्य विभाग पर बड़ा कलंक: जिसे खुद किया था रजिस्टर्ड, वह निकला बिना डॉक्टर का अवैध नर्सिंग होम!
- लापरवाही से महिला की जान जोखिम में डालने वाले गिरोह ने बदला था नाम, बेसमेंट में खोल दिया ‘प्रकाश नर्सिंग होम’।
- चार अप्रशिक्षित युवतियों के भरोसे था पूरा अस्पताल, नोडल अधिकारी की छापेमारी में मौके से डॉक्टर और संचालक फरार।
- कागजी डॉक्टरों के सहारे ३ साल से कट रही थी चांदी, अवैध पैथोलॉजी चलाकर हो रही थी मरीजों से खुली लूट।
उत्तर प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य महकमा भले ही सूबे में ‘रामराज्य’ और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं का ढिंढोरा पीटता रहे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। बस्ती जिले के कुदरहा कस्बे से आई ताजा तस्वीर न सिर्फ डरावनी है, बल्कि यह बताने के लिए काफी है कि यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद ‘वेंटीलेटर’ पर है। जिला मुख्यालय से चंद किलोमीटर दूर कुदरहा में जो कुछ देखने को मिला, उसने पूरे जिले के प्रशासनिक दावों की धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं।

पंजीकरण की आड़ में ‘यमराज’ का खुला धंधा!
कुदरहा कस्बे में एक बेसमेंट (तहखाने) के भीतर ‘प्रकाश नर्सिंग होम’ नाम की मौत की दुकान धड़ल्ले से चल रही थी। सबसे हैरान और गुस्सा दिलाने वाली बात यह है कि यह अस्पताल स्वास्थ्य विभाग के कागजों में बाकायदा पंजीकृत (Registered) था! तीन साल से यह गोरखधंधा सीएमओ कार्यालय की नाक के नीचे चल रहा था।
सवाल यह उठता है कि क्या स्वास्थ्य विभाग के आलाधिकारी कुंभकर्णी नींद सो रहे थे? जब शुक्रवार को नोडल अधिकारी डॉ. एस.बी. सिंह ने वहां औचक छापेमारी की, तो जो सच सामने आया वो किसी के भी रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी था:
- न डॉक्टर, न ट्रेनर: अस्पताल में न तो कोई योग्य चिकित्सक मौजूद था और न ही कोई प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ।
- लड़कियों के भरोसे इलाज: वहां काम कर रही चार युवतियां भर्ती मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही थीं, जिन्हें मेडिकल की ‘ए-बी-सी-डी’ भी नहीं पता।
- लापता संचालक: जब जांच टीम पहुंची तो अस्पताल का मुख्य कर्ता-धर्ता फोन पर लुका-छिपी खेल रहा था, लेकिन मौके पर आने की उसकी हिम्मत नहीं हुई।
नाम बदला, पर नहीं बदला ‘अवैध’ धंधा
स्थानीय लोगों के दावों ने तो इस पूरे सिस्टम के भ्रष्टाचार की कलई ही खोल दी है। बताया जा रहा है कि यह वही ‘दुकान’ है जो पहले रामजानकी मार्ग पर ‘पटेल क्लिनिक’ के नाम से चलती थी। वहां चकिया गांव की एक बेबस महिला के ऑपरेशन के दौरान इतनी घोर लापरवाही बरती गई कि बवाल हो गया। हंगामा हुआ तो क्लिनिक बंद कर दिया गया।
लेकिन, कुछ ही महीनों बाद ‘साहबों’ की सरपरस्ती में इसी गिरोह ने नाम बदला, जगह बदली और बेसमेंट में नया ‘शिकारगाह’ खोल दिया। आखिर किसकी शह पर इन हत्यारों के हौसले इतने बुलंद हैं?
पैथोलॉजी के नाम पर ‘लूट’ का अड्डा
तहखाने के अंधेरे में बिना किसी गाइडलाइन के एक अवैध पैथोलॉजी भी संचालित हो रही थी। मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर गलत रिपोर्ट थमाना और मोटी रकम वसूलना ही इनका एकमात्र मकसद था। जांच टीम ने नाराजगी तो जताई, फटकार भी लगाई, लेकिन सवाल वही है कि यह नौबत आने ही क्यों दी गई?
सिस्टम से सीधे तीखे सवाल:
- जब अस्पताल पिछले तीन साल से पंजीकृत था, तो आज तक सीएमओ कार्यालय ने इसकी जमीनी हकीकत जांचने की जहमत क्यों नहीं उठाई? क्या फाइलों को पास करने के लिए ‘मलाई’ का खेल चल रहा था?
- कागजों पर जिन डॉक्टरों और स्टाफ नर्सों के डिग्री-दस्तावेज लगाए गए थे, क्या वे सिर्फ कागजी भूत हैं? उन फर्जी डॉक्टरों पर धोखाधड़ी का मुकदमा कब दर्ज होगा?
- ऑपरेशन के नाम पर मरीजों को मौत के मुंह में धकेलने वाले इन रसूखदारों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण देने वाले चेहरे कौन हैं?
निष्कर्ष: सिर्फ सील करना काफी नहीं!
कुदरहा के इस नर्सिंग होम को सील कर देना इस बीमारी का इलाज नहीं है। यह तो सिर्फ एक बानगी है; बस्ती मंडल के कौड़ी-कौड़ी के कस्बों में ऐसे सैकड़ों ‘अंधेरे तहखाने’ खुले हुए हैं जहां गरीबों का खून चूसा जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग अगर सच में गंभीर है, तो सिर्फ ‘प्रकाश नर्सिंग होम’ पर नहीं, बल्कि उन भ्रष्ट बाबुओं और अधिकारियों पर भी रासुका जैसी कार्रवाई करे जिन्होंने इस मौत के कुएं को हरी झंडी दी थी। जनता अब जवाब चाहती है, खोखली कागजी कार्रवाई नहीं!




















