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“प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स का काला सच: गरीब महिला के लोन के पैसे डकारे, संचालक और कारिंदे पर FIR दर्ज!”

"खाकी की सुस्ती या रसूख का असर? SP से मिलने के 20 दिन बाद प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स के 'जालसाजों' पर टूटा कानून का डंडा।"

अजीत मिश्रा (खोजी)

खाऊ-कमाऊ नीति का शिकार हुई गरीब महिला: ‘प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स’ के संचालक और गुर्गे पर FIR दर्ज!

बस्ती ब्यूरो रिपोर्ट , दिनांक: 22 अप्रैल, 2026

  • ​”सिलाई मशीन के नाम पर ‘ठगी’: प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स के संचालक ने अमानत में की खयानत, अब पुलिस की रडार पर ‘साहब’।”
  • ​”सावधान बस्ती! शोरूम की चमक के पीछे छिपा है जालसाजी का खेल; प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स में महिला से लूट का खुलासा।”
  • ​”नाम बड़े और दर्शन छोटे: प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स के ‘खिलाफ’ केस दर्ज!”
  • ​”धौंस और गाली-गलौज से नहीं चलेगा काम, कानून के घेरे में बस्ती का नामी दुकानदार!”

बस्ती। शहर के कंपनीबाग स्थित नामी प्रतिष्ठान ‘प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स’ इन दिनों अपनी व्यावसायिक ईमानदारी के लिए नहीं, बल्कि अमानत में खयानत और जालसाजी के गंभीर आरोपों के लिए सुर्खियों में है। एक गरीब महिला की मेहनत की गाढ़ी कमाई को डकारने की नीयत रखने वाले दुकान संचालक और उसके एक कारिंदे के खिलाफ पुलिस ने शिकंजा कस दिया है।

क्या है पूरा काला खेल?

थाना कप्तानगंज के ग्राम दुबौला की निवासी कामिनी शुक्ला ने अमानत में खयानत का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया है। जानकारी के अनुसार, महिला के नाम पर सिलाई मशीन के लिए SBI से ₹2,12,500 का लोन स्वीकृत हुआ था। यह रकम सीधे कंपनीबाग स्थित प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स के खाते में आई।

आरोप है कि दुकान संचालक ने बैंक से आए पूरे पैसे के बदले महिला को मात्र ₹1,97,600 ही दिए, वह भी बिना उसकी सहमति के। बाकी रकम और हिसाब मांगने पर संचालक ने शातिर चाल चलते हुए सारा दोष अपने कर्मचारी प्रेमचंद्र (निवासी बैरागल) पर मढ़ दिया।

समझौते के नाम पर भी ‘धोखा’

जब मामला पुलिस के पास पहुँचने लगा, तो शातिरों ने समझौते का पासा फेंका। ₹1,30,000 वापस किए गए और शेष ₹67,000 देने के लिए 26 फरवरी की मोहलत मांगी गई। लेकिन जैसे ही तारीख बीती, इन जालसाजों के रंग बदल गए। आरोप है कि जब महिला अपनी बकाया रकम मांगने दुकान पर जाती, तो उसे डरा-धमका कर भगा दिया जाता था।

प्रशासन की सुस्ती और पीड़ित की हिम्मत

हैरानी की बात यह है कि पीड़ित महिला को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ा। SP बस्ती से मिलने के 20 दिन बाद जाकर कप्तानगंज थाने में FIR दर्ज हुई है। सवाल यह उठता है कि क्या रसूखदार दुकानदारों के आगे कानून इतना लाचार है कि एक गरीब की सुनवाई के लिए हफ़्तों लग जाते हैं?

बड़ा सवाल: FIR में संचालक का नाम और पिता का नाम दर्ज न होना भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा कर रहा है। क्या किसी बड़े नाम को बचाने की कोशिश हो रही है?

ब्यूरो रिपोर्ट की चेतावनी: ‘प्रभा इलेक्ट्रॉनिक्स’ के बाहर लगे बड़े-बड़े ब्रांड्स (Asus, HP, Dell) के बोर्ड शायद अब इस दाग को नहीं छिपा पाएंगे। बस्ती की जनता अब ऐसे व्यापारियों से सावधान रहे जो ग्राहकों के विश्वास और उनके हक के पैसे को अपनी जागीर समझते हैं।

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