

🚨🚨🚨 MEGA SUPER EXCLUSIVE | “बुलडोजर रुका या सिस्टम झुका?—सहारनपुर विकास प्राधिकरण में ‘मेट राज’ का महाघोटाला, अवैध निर्माणों का सिंडिकेट, सेटिंग-सिफारिश और करोड़ों के खेल का बड़ा खुलासा!” 🚨🚨🚨
सहारनपुर। जनपद में अवैध निर्माण का मुद्दा अब विस्फोटक रूप ले चुका है और सहारनपुर विकास प्राधिकरण (SDA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जोन-3 से सामने आए ताजा मामलों ने यह संकेत दे दिया है कि शहर में अवैध निर्माण अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक “संगठित सिस्टम” का हिस्सा बन चुका है। सूत्रों के अनुसार विभागीय स्तर पर एक ऐसा नेटवर्क सक्रिय है, जिसमें मेट से लेकर तकनीकी कर्मचारियों तक की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चाओं में नाम सामने आ रहा है मेट रिजवान का, जिन पर आरोप है कि उनके संरक्षण में कई बड़े अवैध निर्माण धड़ल्ले से खड़े किए गए और नियमों को खुलेआम ताक पर रखा गया।
सूत्रों के मुताबिक गांव छजपुरा क्षेत्र में राधा स्वामी सत्संग के पास आमने-सामने दो विशाल गोदामों का निर्माण कराया गया, वहीं उसी मार्ग पर एक बड़ा बारातघर भी खड़ा कर दिया गया। इसके अलावा राणा स्टील के सामने और आसपास कई दुकानों का निर्माण भी बिना वैध अनुमति के किया गया। यही नहीं, आरोप यह भी है कि कामधेनु क्षेत्र में तीन गोदाम, पाडली गांव में एक फैक्ट्री, दुधली रोड रोज पैलेस के पास चार दुकानें, ट्रांसपोर्ट नगर के पास एक दुकान और खुर्द अड्डे पर एक शोरूम भी कथित रूप से बिना स्वीकृति के खड़े किए गए हैं। इन निर्माणों की संख्या और स्तर को देखकर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह सब बिना विभागीय जानकारी के संभव है?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन अवैध निर्माणों के लिए मोटी रकम वसूली गई और एक सुनियोजित तरीके से निर्माण कार्यों को अंजाम दिया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि निर्माण का लिंटर अक्सर रात के अंधेरे या छुट्टियों के दिन डलवाया जाता है, ताकि किसी भी तरह की कार्रवाई से बचा जा सके और उच्च अधिकारियों की नजर से मामला दूर रखा जा सके। इससे यह संदेह और गहरा जाता है कि कहीं न कहीं इस पूरे खेल में मिलीभगत का बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सहारनपुर विकास प्राधिकरण का बुलडोजर कहां है? क्या वास्तव में “तेल खत्म” हो गया है या फिर बुलडोजर जानबूझकर रोका गया है? क्योंकि जहां एक ओर आम नागरिक छोटे-छोटे निर्माणों पर नोटिस और कार्रवाई का सामना करते हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े स्तर पर हो रहे निर्माणों पर कथित रूप से आंखें मूंद ली जाती हैं। यह दोहरी नीति न सिर्फ प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठाती है, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी कमजोर करती है।
सूत्रों के अनुसार, विभाग के भीतर केवल निर्माणों को संरक्षण देने का ही खेल नहीं चल रहा, बल्कि शिकायतों को दबाने का भी तंत्र सक्रिय है। आरोप है कि जो लोग जनसुनवाई पोर्टल या अन्य माध्यमों से शिकायत करते हैं, उन तक विभागीय लोग पहुंचकर सिफारिशों के जरिए शिकायत वापस लेने का दबाव बनाते हैं। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब एक तरफ लोकायुक्त में विभाग से जुड़े मामलों की जांच चल रही है और दूसरी ओर ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं।
जनसुनवाई पोर्टल, जिसे आम जनता की आवाज माना जाता है, वहां भी कथित तौर पर “नोटिस जारी” दिखाकर मामलों को निपटाने का खेल चल रहा है। जमीनी स्तर पर न तो सीलिंग होती है और न ही ध्वस्तीकरण, जिससे अवैध निर्माणकर्ताओं के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं। अंसारी रोड स्थित शिवालिक बैंक के सामने चल रहा अवैध निर्माण इसका ताजा उदाहरण बताया जा रहा है, जहां स्थानीय लोगों का कहना है कि विभागीय अधिकारियों की कथित मेहरबानी से निर्माण लगातार जारी है।
इस पूरे मामले में मेट रिजवान की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में है। आरोप यह भी है कि जो व्यक्ति कभी एक मामूली कर्मचारी माना जाता था, आज उसके प्रभाव और संपत्ति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो करोड़ों रुपये के घोटाले का पर्दाफाश हो सकता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रही सूचनाओं ने प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
❗ जनता के बड़े सवाल
👉 क्या SDA में बिना “सेटिंग” के कोई काम संभव नहीं रह गया?
👉 क्यों अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई नहीं हो रही?
👉 क्या मेट स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक मिलीभगत है?
👉 क्यों शिकायतकर्ताओं को दबाने और डराने की कोशिश की जा रही है?
यह मामला अब सिर्फ अवैध निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सहारनपुर के पूरे प्रशासनिक ढांचे, पारदर्शिता और कानून व्यवस्था की साख पर सीधा सवाल बन चुका है। अगर इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल विभागीय भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण होगा, बल्कि शहर के नियोजित विकास के लिए भी एक गंभीर खतरा साबित होगा।
अब निगाहें जिला प्रशासन, शासन और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष और कड़ी कार्रवाई की जाएगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह “अवैध निर्माण सिंडिकेट और सिस्टम की मिलीभगत” का सबसे बड़ा उदाहरण बन सकता है।





