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बस्ती का ‘कुबेर’ बना लुटेरा: सरकारी तिजोरी में सेंध या खुली डकैती?

साहब! यह 'त्रुटि' नहीं, सरेआम 'गबन' है; करोड़ों की बंदरबांट का पर्दाफाश! कोषागार या भ्रष्टाचार का अड्डा? CTO की कलम से लिखा गया लूट का महाकाव्य।

अजीत मिश्रा (खोजी)

विशेष रिपोर्ट: बस्ती कोषागार बना भ्रष्टाचार का ‘अड्डा’, CTO की सरपरस्ती में करोड़ों की डकैती!

  • क्या बस्ती के खजाने की चाबी ‘चोरों’ के हाथ में है? करोड़ों का स्वाहा: ‘मां काली ट्रेडर्स’ पर मेहरबानी या कमीशन की सेटिंग? बिना काम, बिना टेंडर, फिर भी भुगतान… आखिर किसका ‘बखरा’ पहुँचा ऊपर?
  • वाह रे साहब! वेतन पर ‘ब्रेक’ और फर्जी बिलों पर ‘ग्रीन सिग्नल’?मार्च का ‘जादू’: एक रात में फाइलें दौड़ीं और खजाना हो गया खाली!
  • ‘बखरा’ सिस्टम का बोलबाला: बस्ती कोषागार में महा-घोटाला! CTO और ठेकेदारों की जुगलबंदी: जनता के पैसे पर डाका। गबन का ‘खिलाड़ी’: कौन है इस लूट का मास्टरमाइंड?

बस्ती। सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार की खबरें तो आम हैं, लेकिन जब जिले के खजाने का रखवाला यानी मुख्य कोषाधिकारी (CTO) ही संदिग्धों के घेरे में आ जाए, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था पूरी तरह सड़ चुकी है। बस्ती जिले से सामने आए आंकड़े और दस्तावेजी साक्ष्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यहाँ ‘नियम’ नहीं, बल्कि ‘कमीशन का खेल’ चल रहा है।

​हालिया शिकायतों और अखबार की पड़ताल में जो खुलासे हुए हैं, वे प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे एक बहुत बड़े वित्तीय महा-घोटाले की ओर इशारा करते हैं।

‘त्रुटि’ का नकाब और गबन की हकीकत

​CTO साहब के कार्यालय में इन दिनों एक नया शब्द गढ़ा गया है— ‘लिपिकीय त्रुटि’। लेकिन सवाल यह है कि क्या करोड़ों का गलत भुगतान महज एक छोटी सी गलती हो सकती है?

शिकायतकर्ता दीपक कुमार मिश्र ने साक्ष्यों के साथ आरोप लगाया है कि ‘मां काली ट्रेडर्स’ जैसी फर्मों को करोड़ों का भुगतान नियमों को ताक पर रखकर किया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस फर्म के खिलाफ स्वयं CTO जांच अधिकारी नामित थे, उसी फर्म का बिल पास कर दिया गया। यह ‘त्रुटि’ नहीं, बल्कि सीधे तौर पर राजस्व का गबन है।CTO साहब जिस ₹2 करोड़ के भुगतान को महज एक ‘लिपिकीय त्रुटि’ बताकर पल्ला झाड़ना चाहते हैं, असल में वह ‘गबन’ की श्रेणी में आता है। सवाल यह है कि:

  • जिस फर्म के खिलाफ स्वयं CTO जांच अधिकारी हों, उसे ही करोड़ों का भुगतान कैसे हो गया?
  • क्या यह महज इत्तेफाक है या फिर जांच को ठंडे बस्ते में डालकर फाइलें ठिकाने लगाने की साजिश?

मार्च की वो ‘काली रातें’ और ₹15 करोड़ का बंदरबांट

​भ्रष्टाचार की इस पटकथा का सबसे बड़ा हिस्सा मार्च के अंतिम दिनों में लिखा गया। बजट लैप्स न हो जाए, इस बहाने से मार्च के अंतिम सप्ताह में सरकारी खजाने के दरवाजे ‘खास’ ठेकेदारों के लिए खोल दिए गए।आरोप है कि जांच और शिकायतों से बचने के लिए भुगतान का ‘खेला’ मार्च के अंतिम दिनों में खेला जाता है।

  • बिना काम कराए, बिना टेंडर के और केवल ‘कोटेशन’ व ‘वर्क ऑर्डर’ के फर्जी खेल के जरिए लगभग ₹15 करोड़ का अनियमित भुगतान किया गया।
  • एक ही फर्म को सिविल, दवा, सर्जिकल और प्रिंटिंग—सबका ठेका दे दिया गया। क्या विभाग में प्रतिभा की कमी थी या ‘कमीशन’ की सेटिंग तगड़ी थी?
  • अंधा बांटे रेवड़ी: नियमों के अनुसार जो काम टेंडर के जरिए होने चाहिए थे, उन्हें ‘कोटेशन’ और ‘वर्क ऑर्डर’ के फर्जी खेल से निपटा दिया गया।
  • एक फर्म, अनेक रूप: स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर एक ही पसंदीदा फर्म को सिविल कार्य, दवा सप्लाई, सर्जिकल आइटम और प्रिंटिंग—सबका ठेका दे दिया गया। आरोप है कि इस प्रक्रिया में लगभग ₹15 करोड़ का अनियमित भुगतान हुआ।

फर्जी बिलिंग का मास्टरप्लान: काम शून्य, भुगतान करोड़ों

​भ्रष्टाचार का यह जाल कितना गहरा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महिला अस्पताल में ₹1 करोड़ का बिजली से संबंधित काम हुआ ही नहीं, लेकिन उसका बिल न केवल बना बल्कि उसे प्राथमिकता के आधार पर पास भी कर दिया गया।मामला तब और गंभीर हो जाता है जब ‘मां काली ट्रेडर्स’ जैसी फर्मों को भुगतान किया जाता है, जिनके हैसियत और चरित्र प्रमाणपत्रों पर ही सवालिया निशान हैं।

गोरखपुर से प्रमाणपत्र और बस्ती से भुगतान? नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ाना बिना ‘ऊपर’ के संरक्षण के मुमकिन नहीं है।

शिकायतकर्ता ने 25 सितंबर और 5 अगस्त को ही जिलाधिकारी (DM) को सारे साक्ष्य सौंप दिए थे, फिर भी CTO साहब की ‘कुंभकर्णी नींद’ क्यों नहीं टूटी?

  • ​आखिर किस आधार पर बिना टेंडर के सिविल कार्यों का भुगतान कर दिया गया?
  • ​स्वास्थ्य विभाग के CMO, SIC और CMS की भूमिका इस पूरे मामले में उतनी ही संदिग्ध है जितनी कि भुगतान करने वाले कोषागार अधिकारियों की।

दस्तावेजों में हेराफेरी और ‘बखरा’ सिस्टम

​जांच में यह भी सामने आया है कि कई फर्मों के हैसियत और चरित्र प्रमाणपत्र दूसरे जिलों (जैसे गोरखपुर) से बने हुए हैं, जो बस्ती के नियमों के अनुसार भुगतान के लिए वैध नहीं थे। फिर भी CTO साहब ने इन तकनीकी कमियों को ‘नजरअंदाज’ कर दिया।

इसे स्थानीय भाषा में ‘बखरा सिस्टम’ कहा जा रहा है, जिसका सीधा मतलब है— “कमीशन पहुंचाइए और फर्जी बिल पास कराइए।” जहाँ साधारण कर्मचारियों के वेतन के लिए सौ सवाल पूछे जाते हैं, वहीं रसूखदार ठेकेदारों के संदिग्ध बिलों पर ‘ग्रीन सिग्नल’ मिल जाता है।इस लूट में अकेले CTO जिम्मेदार नहीं हैं। बिल बनाने वाले CMO, SIC और CMS की भूमिका भी उतनी ही संदिग्ध है।

  • जब बिजली का काम हुआ ही नहीं, तो महिला अस्पताल में ₹1 करोड़ का बिजली बिल कैसे पास हो गया?
  • कर्मचारियों के वेतन पर ‘आपत्ति’ लगाने वाले बाबू और साहब, ठेकेदारों के फर्जी बिलों पर ‘लाल कालीन’ क्यों बिछा देते हैं?

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

​शिकायतकर्ता ने अगस्त और सितंबर के महीनों में ही जिलाधिकारी (DM) को सारे साक्ष्य सौंप दिए थे। बावजूद इसके, अब तक किसी बड़ी कार्रवाई का न होना प्रशासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

निष्कर्ष: यदि सरकार और उच्चाधिकारी इस ‘कुबेर के खजाने’ की लूट को नहीं रोकते, तो यह जनता के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा। बस्ती की जनता अब जवाब चाहती है कि उनके हक का पैसा अधिकारियों और ठेकेदारों की जेबें भरने के लिए क्यों इस्तेमाल हो रहा है?

 

बड़ा सवाल: क्या शासन इन ‘सफेदपोश लुटेरों’ पर बुलडोजर चलाएगा या फाइलें धूल फांकती रहेंगी? क्या प्रशासन केवल छोटी मछलियों पर जाल फेंकेगा या इन ‘बड़े मगरमच्छों’ पर भी कार्रवाई होगी? जनता के टैक्स का पैसा ‘बखरा’ बांटने के लिए नहीं है। अगर CTO साहब को नियम-कानून की समझ नहीं है, तो वे उस कुर्सी पर बैठने के लायक नहीं, और अगर समझ है… तो यह सीधे-सीधे आपराधिक षड्यंत्र है।

सावधान! यह भ्रष्टाचार की वो दीमक है जो बस्ती के विकास को अंदर से खोखला कर रही है। अब गेंद जिलाधिकारी और शासन के पाले में है।

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