
झालावाड़ 14 अप्रैल 2026। डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय इतिहास के वह स्तंभ हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ते हुए खपा दिया। 14 अप्रैल 1891 को महू में जन्मे बाबासाहेब ने बचपन से ही छुआछूत और भेदभाव का दंश झेला, लेकिन उसे अपनी कमजोरी नहीं, ताकत बनाया।
शिक्षा का हथियार
कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़े अंबेडकर समझ गए थे कि ज्ञान ही शोषण की जंजीरें तोड़ सकता है। उन्होंने कहा था, “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”
न्याय के निर्माता
आजाद भारत के संविधान निर्माता के रूप में उन्होंने हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का अधिकार दिया। अनुच्छेद 17 से छुआछूत को खत्म करना हो या दलित-वंचितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था, बाबासाहेब ने कानून को कमजोर का सबसे बड़ा हथियार बनाया।
जीवन का खपना
महाड़ सत्याग्रह, काला राम मंदिर प्रवेश, हिंदू कोड बिल — हर कदम पर उन्होंने समाज की सदियों पुरानी बेड़ियों पर चोट की। 6 दिसंबर 1956 को महापरिनिर्वाण तक वे दलितों, महिलाओं और मजदूरों के हक के लिए लड़े।
बाबासाहेब केवल एक व्यक्ति नहीं, एक आंदोलन थे। उनका जीवन बताता है कि जब इरादे मजबूत हों, तो एक इंसान पूरे समाज की तकदीर बदल स
कता है।



