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बस्ती में ‘मौत की दुकान’ चला रहे 80 निजी अस्पताल: सीएमओ ने कसे पेंच, अब सीधे होंगे सील!

सेटिंग के खेल पर फिरा पानी! पोर्टल बंद होते ही 80 निजी अस्पताल संचालकों के छूटे पसीने, अब सीधे होंगे कुर्क!

अजीत मिश्रा (खोजी)

बस्ती में ‘यमराज’ के भरोसे निजी अस्पताल, 80 केंद्रों पर सीलिंग की तलवार!

ब्यूरो, बस्ती (उत्तर प्रदेश)

  • बस्ती में मौत की दुकानें: बिना एनओसी और मानक के चल रहे 80 अस्पतालों की अब खैर नहीं, सीलिंग की उल्टी गिनती शुरू!
  • बस्ती हेल्थ स्कैम: 80 अस्पतालों का लाइसेंस खत्म, फिर भी धड़ल्ले से भर्ती हो रहे मरीज—प्रशासन अब दिखाएगा दम!
  • स्वास्थ्य माफियाओं की शामत: संकरी गलियों में चल रहे ‘डेथ ट्रैप’ होंगे सील, 30 अप्रैल की डेडलाइन फेल!

बस्ती। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे चल रहा ‘मौत का कारोबार’ अब बेनकाब होने वाला है। जिले के 80 निजी अस्पतालों, क्लीनिकों, पैथोलॉजी लैब और डायग्नोस्टिक सेंटरों ने शासन के आदेशों को रद्दी की टोकरी में डालते हुए अपना लाइसेंस नवीनीकरण (Renewal) नहीं कराया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा दी गई 30 अप्रैल की समय सीमा खत्म हो चुकी है और पोर्टल भी बंद हो गया है। अब इन ‘अवैध’ संस्थानों को सीधे सील करने की तैयारी है।जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर खिलवाड़ करने वाले निजी अस्पतालों और लैब संचालकों की अब खैर नहीं है। शासन की तमाम चेतावनियों को ठेंगा दिखाते हुए जिले के करीब 80 निजी अस्पतालों और क्लीनिकों ने अपना लाइसेंस रिन्यू (नवीनीकरण) नहीं कराया है। आलम यह है कि स्वास्थ्य विभाग की डेडलाइन 30 अप्रैल बीतने के बाद भी इन संचालकों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने कड़ा रुख अपनाते हुए इन ‘अवैध’ दुकानों को सीधे सील करने का फरमान सुना दिया है।

तंग गलियां, संकरे भवन: क्या अस्पताल हैं या ‘डेथ ट्रैप’?

​अखबार द्वारा की गई पड़ताल में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जिले के कई अस्पताल ऐसी संकरी गलियों में चल रहे हैं, जहाँ एक एम्बुलेंस तक ठीक से नहीं पहुंच सकती। महिला अस्पताल के समीप, जमडीह, कैली, पचपेड़िया, सोनूपार, ब्लॉक रोड, जिगिना और मुंडेरवा जैसे क्षेत्रों में खुले ये अस्पताल मानकों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

इन अस्पतालों में मौत का सामान तैयार है:

  • फायर सेफ्टी जीरो: अधिकांश केंद्रों के पास फायर एनओसी नहीं है। अगर आग लगी, तो मरीजों का निकलना नामुमकिन है।
  • प्रदूषण मानक गायब: अस्पतालों से निकलने वाला संक्रमित कचरा (Bio-medical waste) सीधे आम नालियों में बहाया जा रहा है।
  • पार्किंग का अता-पता नहीं: मुख्य सड़कों पर मरीजों के तीमारदारों की गाड़ियां खड़ी रहती हैं, जिससे हर वक्त जाम की स्थिति बनी रहती है।

सेटिंग का खेल खत्म, अब ‘भौतिक सत्यापन’ से काप रहे संचालक

​अब तक ये अस्पताल संचालक ‘सांठ-गांठ’ और ‘जुगाड़’ के दम पर रिन्यूअल की फाइलें पास करा लेते थे, लेकिन इस बार सीएमओ डॉ. राजीव निगम की सख्ती ने इनके होश उड़ा दिए हैं। विभाग की टीम अब ऑन-ग्राउंड जाकर भौतिक सत्यापन करेगी।

बड़ा खुलासा: जांच में यह भी देखा जाएगा कि जिन डॉक्टरों की डिग्री कागजों पर लगी है, क्या वे वास्तव में वहां बैठते हैं? विभाग को शक है कि एक ही डॉक्टर की डिग्री पर जिले में कई-कई क्लीनिक संचालित हो रहे हैं। स्टाफ के क्रॉस-वेरिफिकेशन में कई बड़े चेहरों के बेनकाब होने की उम्मीद है।

 

​सूत्रों की मानें तो बस्ती की तंग गलियों और संकरे भवनों में चल रहे इन अस्पतालों के संचालक अब तक ‘सेटिंग’ के भरोसे बैठे थे। लेकिन पोर्टल बंद होने के बाद अब इन स्वास्थ्य माफियाओं में हड़कंप मचा है। पिछले साल जिले में 325 निजी स्वास्थ्य केंद्र पंजीकृत थे, जिनमें से 80 ने रिन्यूअल की प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

बड़ा सवाल: क्या ये अस्पताल किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे थे? बिना फायर एनओसी और प्रदूषण मानक पूरा किए, तंग गलियों में अस्पताल चलाना मरीजों की जान से सीधा खिलवाड़ है।

पिछले साल 325 थे, इस बार 80 ‘भगोड़े’!

​आंकड़ों की बाजीगरी देखिए—पिछले साल जिले में 325 निजी अस्पताल और लैब पंजीकृत थे। इस साल 300 में से केवल 220 ने ही हिम्मत दिखाई, जबकि 80 संचालक मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए या रिन्यूअल के लिए आवेदन ही नहीं किया। इसकी मुख्य वजह एनओसी (NOC) प्राप्त करने में ‘पसीने छूटना’ बताया जा रहा है। बिना फायर और प्रदूषण प्रमाण पत्र के अब नवीनीकरण संभव नहीं है, और यही इन संचालकों की सबसे बड़ी कमजोरी है।

30 मई तक का ‘अंतिम प्रहार’

​जिन अस्पतालों के पास 5 साल का लंबा लाइसेंस है, उन्हें भी विभाग ने रडार पर ले लिया है। यदि 30 मई तक उन्होंने अपने बदले हुए डॉक्टरों और स्टाफ की सूचना पोर्टल पर अपडेट नहीं की, तो उन पर भी गाज गिरना तय है।

ब्यूरो की तीखी टिप्पणी: सिर्फ दिखावा या कार्रवाई?

​बस्ती की जनता पूछ रही है कि जब 30 अप्रैल को पोर्टल बंद हो गया और समय सीमा बीत गई, तो ये अस्पताल आज भी मरीजों को भर्ती कैसे कर रहे हैं? क्या विभाग केवल नोटिस-नोटिस खेल रहा है या वास्तव में इन पर ताला जड़ा जाएगा?

​अगर इन 80 केंद्रों को तत्काल प्रभाव से बंद नहीं किया गया, तो किसी भी बड़े हादसे की पूरी जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की होगी। मरीजों की जान की कीमत पर इन ‘झोलाछाप और मानकविहीन’ सेंटरों को चलने की इजाजत आखिर कौन दे रहा है?

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