
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष रिपोर्ट: कुदरहा के ‘कसाईखानों’ में खामोश होती किलकारियां; रसूखदारों की सरपरस्ती में जारी है मौत का व्यापार
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- नेताओं की ‘मलाई’ में डूबा कुदरहा का स्वास्थ्य विभाग; क्या एमओआईसी और नोडल अधिकारी भी हैं प्रकाश नर्सिंग होम के ‘पार्टनर’?
- बड़ा खुलासा: लखनऊ में आराम फरमा रहे डॉक्टर साहब, और बस्ती में झोलाछाप कर रहे पेट की चीर-फाड़; आखिर कब सील होगा मौत का यह अड्डा?
- वोट के लिए ‘दद्दा’ और इलाज के लिए ‘कसाई’? कुदरहा के प्रकाश नर्सिंग होम की मनमानी पर अब खामोश क्यों हैं सफेदपोश?
बस्ती। जनपद का कुदरहा क्षेत्र आज विकास की बाट जोहे न जोहे, लेकिन यहाँ के ‘नर्सिंग होम’ मौत के ऐसे कारखाने बन चुके हैं जहाँ इंसानियत का हर दिन कत्ल होता है। यहाँ चिकित्सा सेवा के नाम पर जो नंगा नाच चल रहा है, उसे देखकर सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाए। लेकिन अफसोस! यहाँ के सफेदपोश नेताओं, भ्रष्ट अधिकारियों और कथित ‘मैनेजमेंट’ के गुरुओं की खाल इतनी मोटी हो चुकी है कि उन्हें मासूमों की मौत में भी सिर्फ मुनाफे का गणित नजर आता है।
मैक्स से प्रकाश तक: संवेदनाओं का अंत
कुदरहा के तथाकथित अस्पतालों—चाहे वह मैक्स हो या प्रकाश नर्सिंग होम—ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हैं। मैक्स हॉस्पिटल में घटित वह हृदयविदारक घटना, जिसमें एक नवजात का धड़ बाहर और सिर माँ के पेट के अंदर रह गया, कोई साधारण चिकित्सकीय लापरवाही नहीं थी। वह एक जघन्य अपराध था। कल्पना कीजिए उस माँ की, जो आज भी जिला अस्पताल में अपनी किस्मत और इन ‘नरपिशाचों’ की दरिंदगी पर आंसू बहा रही है। क्या यह वही ‘रामराज्य’ है जिसका ढिंढोरा पीटा जाता है, जहाँ एक गरीब महिला की कोख को अनुभवहीन हाथों के सुपुर्द कर दिया जाता है?
किराए के कमरों में ‘चीर-फाड़’ का खेल
प्रकाश नर्सिंग होम की कहानी तो किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। एएनएम विनोदा सिंह के आलीशान बंगले में यह मौत का खेल फल-फूल रहा है। ऊपर परिवार चैन की नींद सोता है और नीचे ओमप्रकाश चौधरी जैसे लोग बिना किसी वैध डिग्री या विशेषज्ञता के लोगों का पेट चीर रहे हैं।
गजब का सिस्टम है—जिस डॉक्टर के नाम पर अस्पताल का लाइसेंस लिया गया, वह साहब लखनऊ के किसी आलीशान बंगले में बैठकर अपनी ‘रॉयल्टी’ वसूल रहे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि जब एमओआईसी और नोडल अधिकारी जांच करने पहुँचते हैं, तो वहां न कोई डॉक्टर मिलता है और न ही नर्सिंग स्टाफ। फिर भी, सवाल यह है कि ये दुकानें सील क्यों नहीं होतीं? क्या प्रशासन को किसी और बड़ी बलि का इंतजार है?
नेताओं की ‘मलाई’ और जनता की ‘तबाही’
क्षेत्र में भाजपा के दिग्गज कहे जाने वाले नेताओं की भरमार है। ये नेता राजनीति की बिसात पर लंबी-चौड़ी चालें चलते हैं, मलाई काटते हैं और खुद को क्षेत्र का भाग्यविधाता बताते हैं। लेकिन जब बात किसी गरीब गर्भवती महिला के जीवन-मरण की आती है, तो इन ‘माननीयों’ को सांप सूंघ जाता है।
सीधा सवाल: जो नेता अपने गांव के लोगों को स्वास्थ्य की बुनियादी सुरक्षा नहीं दे सकते, उन्हें ‘जनप्रतिनिधि’ कहलाने का क्या हक है? फर्जी पैथोलॉजी, अवैध अल्ट्रासाउंड केंद्र और बिना डॉक्टर के चल रहे ये नर्सिंग होम क्या इन नेताओं की जानकारी के बिना चल रहे हैं? या फिर इन ‘मौत के अड्डों’ से होने वाली काली कमाई का एक हिस्सा खाकी और खादी की जेबों तक भी पहुँच रहा है?
प्रशासनिक मिलीभगत या लाचारी?
नोडल अधिकारी डॉ. एस.बी. सिंह और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवालिया निशान हैं। जांच के नाम पर केवल खानापूर्ति की जाती है। जब किसान यूनियन (भानू गुट) के जिला उपाध्यक्ष उमेश गोस्वामी जैसे लोग आवाज उठाते हैं और डीएम से शिकायत करते हैं, तब जाकर तंत्र थोड़ा हिलता है। लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल नोटिस का खेल खेला जाता है।
निष्कर्ष: कब थमेगा यह तांडव?
कुदरहा की जनता अब जाग रही है। यह लेख उन तमाम जिम्मेदार लोगों के लिए एक चेतावनी है जो नोटों की खनक के बदले गरीबों की लाशें बिछा रहे हैं। यदि इन ‘कसाईखानों’ को तत्काल सील नहीं किया गया और इन तथाकथित डॉक्टरों व मालिकों पर हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, तो आने वाले समय में जनता का आक्रोश इस पूरे भ्रष्ट तंत्र को लील जाएगा।
सावधान कुदरहा! यहाँ इलाज नहीं, सौदा होता है। यहाँ दुआएं नहीं, मौत दी जाती है।




















