
अजीत मिश्रा (खोजी)
सिस्टम की ‘लीकेज’: कतार में जिंदगी और ब्लैक में ‘खुशी’ 1800 रुपये का ‘ब्लैक-मैजिक’: बस्ती में गैस किल्लत नहीं, नीयत की खोट है!
- सफेदपोशों की नाक के नीचे काला कारोबार: क्या सो रहा है रसद विभाग?
- बुकिंग के बाद भी ‘धक्के’ की गारंटी: बस्ती में सिस्टम का दम घोंट रही गैस एजेंसियाँ।
- आम आदमी की जेब पर ‘डाका’: 1800 दो, तभी चूल्हा जलाओ!
- कतार में खड़ा कतर-कतर कर रहा आम आदमी, एजेंसियों की चांदी-चांदी!
- सिलिंडर के लिए ‘रण’, जनता बेहाल और प्रशासन मौन! गैस की रसीद हुई ‘दुर्लभ’, बस्ती में ब्लैक की बढ़ी ‘बुलंद’ आवाज़!
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
बस्ती। अगर आप सोच रहे हैं कि लोकतंत्र में जनता जनार्दन है, तो जरा बस्ती के गैस सिलिंडर वितरण केंद्रों की कतारों में खड़े उन चेहरों को देख लीजिए, जिनकी ‘किस्मत’ का फैसला गैस एजेंसी का एक अदना सा कर्मचारी करता है। मंडल में रसोई गैस की किल्लत ने अब एक ऐसे ‘अर्थशास्त्र’ को जन्म दे दिया है, जहाँ नियम कागजों पर दम तोड़ रहे हैं और कालाबाजारी खुलेआम सीना ताने खड़ी है।
कतार में ‘कोल्हू के बैल’, काउंटर पर ‘कुबेर’
पटेल चौक स्थित गैस एजेंसी के बाहर का मंजर किसी मेले से कम नहीं है, फर्क बस इतना है कि यहाँ लोग खुशी में नहीं, बल्कि मजबूरी में जमा हैं। चिलचिलाती धूप में घंटों खड़े रहने के बाद भी जब उपभोक्ता को बताया जाता है कि ‘स्टॉक खत्म हो गया’, तो वह दर्द सिर्फ वही समझ सकता है जिसके घर का चूल्हा ठंडा पड़ा है। लेकिन इसी भीड़ के बीच एक ‘जादुई खिड़की’ भी है। चर्चा है कि यदि आपकी जेब में 1800 रुपये की गर्मी है, तो नियम-कायदे आपके लिए कालीन बिछा देते हैं। जो रसीद घंटों लाइन में लगने के बाद नहीं मिलती, वह ‘अतिरिक्त सेवा शुल्क’ (कालाबाजारी) चढ़ाते ही तुरंत हाथ में थमा दी जाती है। यह डिजिटल इंडिया के दौर में ‘अंडर द टेबल’ वाला वह पुराना इंडिया है, जो आज भी फल-फूल रहा है।
खाद्य विभाग: कुंभकर्णी नींद या मौन सहमति?
हैरानी की बात यह है कि पुलिस को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, हंगामा रोज की बात हो गई है, लेकिन विभाग के आला अफसर एसी कमरों में बैठकर ‘सब चंगा सी’ का बोर्ड लगाए बैठे हैं। आपूर्ति निरीक्षकों की ‘ड्यूटी’ सिर्फ फाइलों तक सीमित नजर आती है। जब सरेआम 1800 रुपये में सिलिंडर की रसीदें कट रही हैं, तब जांच टीमों का न मिलना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या यह अव्यवस्था सिर्फ कुप्रबंधन है, या फिर इसमें ऊपर से नीचे तक ‘सांठ-गांठ’ का चिकना तेल लगा हुआ है?
‘सिलिंडर’ नहीं, ‘साधना’ है!
आज के दौर में बस्ती मंडल में गैस सिलिंडर पाना किसी हिमालयी तपस्या से कम नहीं है। पहले आप हफ्तों तक बुकिंग के ‘डिजिटल मायाजाल’ में फंसते हैं, फिर हफ्तों तक एजेंसी के चक्कर काटकर अपने पैरों की चप्पलें घिसते हैं। और जब अंत में आप हार मान जाते हैं, तब कोई बिचौलिया कान में आकर कहता है- “काहे परेशान हैं, थोड़ा ज्यादा ढीला कीजिए और गरमा-गरम सिलिंडर घर ले जाइए।”
लाइन का ‘निर्वाण’: मोक्ष मिले न मिले, रसीद मिल जाए!
पटेल चौक से लेकर कटरा तक, गैस एजेंसियों के बाहर खड़ी भीड़ को देखकर लगता है जैसे यहाँ कोई ‘अमृत’ बंट रहा है। घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद जब उपभोक्ता काउंटर तक पहुँचता है, तो अंदर से ऑपरेटर ऐसे देखता है जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो।
व्यंग्य की धार: “स्टॉक खत्म है” – यह वाक्य नहीं, बल्कि एक ब्रह्मास्त्र है जो हर गरीब की उम्मीदों पर रोज चलाया जाता है। अजीब विडंबना है; जिस देश में मंगल ग्रह पर पानी खोजा जा रहा है, वहाँ बस्ती के ‘मंगल’ (आम नागरिक) को एक भरा हुआ सिलिंडर खोजने के लिए तीन जन्मों की तपस्या करनी पड़ रही है।
1800 का ‘जादुई आंकड़ा’ और अर्थशास्त्र
अखबार की रिपोर्ट कहती है कि 1800 रुपये दीजिए और रसीद घर ले जाइए। वाह! क्या गजब का प्रबंधन है। सरकारी रेट और ब्लैक रेट के बीच का यह ‘खांचा’ ही वह स्वर्ग है, जहाँ बिचौलिए और भ्रष्ट कर्मचारी अपनी अटैचियां भर रहे हैं।
“आम आदमी के लिए नियम ‘लोहे के चने’ हैं, और रसूखदारों के लिए यही नियम ‘मक्खन’ हैं।”
जो बुजुर्ग 15 किलोमीटर दूर से लाठी टेककर आता है, उसे ‘सर्वर डाउन’ का प्रसाद मिलता है। लेकिन जो ‘गांधी जी’ के गुलाबी नोटों की चमक दिखाता है, उसके लिए सर्वर क्या, साक्षात भगवान भी जमीन पर उतर आते हैं। ऐसा लगता है कि गैस एजेंसी के काउंटर नहीं, बल्कि ‘ब्लैक मनी’ के एक्सचेंज सेंटर खुल गए हैं।
प्रशासन की ‘गांधारी’ दृष्टि
सप्लाय विभाग और जिला प्रशासन की आंखों पर बंधी पट्टी इतनी मजबूत है कि उसे न तो चिलचिलाती धूप में तड़पते लोग दिखते हैं और न ही सरेआम हो रही अवैध वसूली। शायद उनके लिए ‘जनता की सेवा’ का मतलब है- जनता को लाइन में लगाकर उनकी सहनशक्ति की परीक्षा लेना। शहर के होटलों और कमर्शियल अड्डों पर नीले-लाल सिलिंडरों की कतार लगी है। वहाँ न सर्वर डाउन होता है, न स्टॉक खत्म होता है। वहाँ सिर्फ ‘लेन-देन’ का लुब्रिकेंट काम करता है, जिससे भ्रष्ट व्यवस्था की गाड़ी फर्राटे भर रही है।
उपभोक्ताओं का दर्द: रसीद के लिए ‘रण’
कटरा और अन्य एजेंसियों के बाहर खड़ी जनता का धैर्य अब जवाब दे रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे 15-20 किलोमीटर दूर से किराए के पैसे फूंककर आते हैं, और शाम को खाली हाथ वापस लौट जाते हैं। उधर, होटल और रेस्टोरेंट संचालकों को ऊंचे दामों पर सिलिंडर की निर्बाध सप्लाई हो रही है, क्योंकि वहाँ से ‘मोटा मुनाफा’ जो जुड़ा है।
बस्ती मंडल की यह तस्वीर प्रशासन के दावों की पोल खोलती है। अगर जल्द ही इस ‘ब्लैक मार्केटिंग’ और अव्यवस्था पर नकेल नहीं कसी गई, तो जनता का आक्रोश सड़कों पर उतरने को मजबूर होगा। फिलहाल तो स्थिति यही है कि— दाम बढ़े हैं, कतार बढ़ी है, बस नहीं बढ़ी तो आम आदमी की सहूलियत! चूल्हा जले न जले, भ्रष्टाचार की भट्टी जलनी चाहिए! बस्ती मंडल की इस बदहाली पर अगर आज व्यंग्य न किया जाए, तो यह उन लोगों के साथ नाइंसाफी होगी जो रोज सुबह चार बजे से लाइन में ‘हजिरी’ लगाते हैं। एजेंसियां अब सेवा केंद्र नहीं, बल्कि ‘यातना केंद्र’ बन चुकी हैं।
अंतिम चुटकी: साहब! अगर सिलिंडर नहीं दे सकते, तो कम से कम लाइन में खड़े लोगों के लिए टेंट और शरबत का ही इंतजाम करवा दीजिए। आखिर ‘डिजिटल इंडिया’ की रसीद कटवाते-कटवाते जनता ‘डिलीट’ न हो जाए, इसका ख्याल तो आपको ही रखना होगा!



















