
अजीत मिश्रा (खोजी)
🔔बहादुरपुर की बेटियों का अपमान: ‘शौचालय’ का बहाना, शिक्षा पर ताला!🔔
बस्ती मंडल ब्यूरो रिपोर्ट
- बेटियों की ललकार: “शौचालय हमसे ले लो, पर हमारा दाखिला मत रोको!” JLTRC इंटर कॉलेज की संवेदनहीनता: शौचालय नहीं तो शिक्षा भी नहीं? बहादुरपुर में बढ़ा आक्रोश।
- नारा ‘बेटी पढ़ाओ’ का, हकीकत ‘दरवाजे बंद’ की: बस्ती में छात्राएं दर-दर भटकने को मजबूर। साहब, शौचालय का बहाना छोड़ो… बेटियों को पढ़ना है! कलवारी में दाखिले पर छिड़ा संग्राम।
- आधी आबादी का पूरा अपमान: शौचालय की कमी बताकर कॉलेज ने छीना बेटियों से कलम पकड़ने का हक। टॉयलेट सीट लेकर स्कूल पहुंचीं छात्राएं, प्रधानाचार्य का अड़ियल रवैया बरकरार।
- शिक्षा के मंदिर में ‘शौचालय’ की बाधा: ग्रामीण और अधिवक्ता उतरे मैदान में, बड़े आंदोलन की आहट। दाखिले की ‘बलि’ चढ़ता बेटियों का भविष्य; JLTRC कॉलेज के गेट से खाली हाथ लौटीं छात्राएं।
बहादुरपुर (बस्ती) | 18 अप्रैल, 2026
उत्तर प्रदेश में एक ओर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा गूंज रहा है, वहीं दूसरी ओर जनपद बस्ती के बहादुरपुर में बालिका शिक्षा को प्रशासनिक संवेदनहीनता की भेंट चढ़ाया जा रहा है। झिनकू लाल त्रिवेणी राम चौधरी (JLTRC) इंटर कॉलेज, कलवारी में शिक्षा की लौ जलाने आई बेटियों को प्रधानाचार्य ने सिर्फ इसलिए दुत्कार कर वापस भेज दिया क्योंकि विद्यालय के पास एक अदद ‘शौचालय’ तक नहीं है।
यह केवल एक स्कूल में प्रवेश का मामला नहीं है, बल्कि यह उस सड़ी-गली व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो बुनियादी सुविधाओं के अभाव में आधी आबादी का भविष्य अंधकार में धकेल रही है।
साइकिल पर टॉयलेट सीट: विरोध का अनोखा लेकिन शर्मनाक मंजर
शनिवार को बहादुरपुर की सड़कों ने एक ऐसा मंजर देखा जो किसी भी सभ्य समाज को शर्मसार करने के लिए काफी था। शेखपुरा, बेलवाडाड़ और कुसौरा जैसे गांवों की दर्जनों छात्राएं अपनी साइकिलों पर प्रतीकात्मक रूप से टॉयलेट सीट बांधकर कॉलेज पहुंचीं। बेटियों का संदेश साफ था: “अगर आपके पास शौचालय नहीं है, तो हमसे ले लीजिए, लेकिन हमारा भविष्य मत छीनिए।” परंतु, विडंबना देखिए! प्रधानाचार्य आज्ञाराम चौधरी की संवेदनहीनता इतनी गहरी निकली कि उन्होंने न तो छात्राओं का प्रवेश लिया और न ही अभिभावकों द्वारा दी जा रही शौचालय सामग्री को स्वीकार किया।
प्रधानाचार्य का तर्क या जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना?
प्रधानाचार्य का कहना है कि ‘समुचित व्यवस्था’ न होने के कारण प्रवेश संभव नहीं है। सवाल यह उठता है कि क्या एक सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान में शौचालय न होना छात्राओं को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित करने का वैध कारण हो सकता है? क्या प्रशासन वर्षों से सो रहा था? और यदि ग्रामीण खुद व्यवस्था करने को तैयार हैं, तो उस सहयोग को ठुकराना अहंकार नहीं तो और क्या है?
“हमें संविधान ने समानता का अधिकार दिया है। महंगे निजी स्कूलों की फीस भरने की हमारी हैसियत नहीं है, तो क्या हम अनपढ़ रहें?” > — एक पीड़ित छात्रा का दर्द
उबल रहा है आक्रोश: अब आर-पार की लड़ाई
इस अड़ियल रवैये के खिलाफ अब ग्रामीण और बुद्धिजीवी लामबंद हो चुके हैं। शेखपुरा पंचायत के प्रधान प्रतिनिधि अमरनाथ चौधरी ने इसे बेटियों के हक पर डाका करार दिया है। वहीं, अधिवक्ता आलोक मिश्रा और जसवंत कुमार ने विद्यालय परिसर में ही हुंकार भरते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यह संघर्ष अब जिला प्रशासन की चौखट तक जाएगा।
ब्यूरो की तीखी टिप्पणी:
यह शर्मनाक है कि डिजिटल इंडिया के दौर में बस्ती की बेटियों को एक शौचालय के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है। यदि प्रशासन और विद्यालय प्रबंधन इस समस्या का समाधान नहीं निकाल सकते, तो उन्हें उन कुर्सियों पर बैठने का कोई हक नहीं है। बेटियां टॉयलेट सीट लेकर स्कूल के दरवाजे पर खड़ी रहीं और सिस्टम तमाशबीन बना रहा—इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा?
बस्ती जिला प्रशासन, क्या आप सुन रहे हैं? या इन बेटियों की पढ़ाई की बलि चढ़ने का इंतज़ार है?




















