
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष लेख: कलम के सौदागरों के बीच सिसकती पत्रकारिता – क्या बस्ती के ‘हरैया’ में भी बिक गया पत्रकारों का ज़मीर?
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
- “कलम की धार कुंद, ‘जी हुज़ूरी’ बुलंद: क्या हरैया के पत्रकारों ने अपना ज़मीर गिरवी रख दिया है?”
- “विज्ञापन के ‘गिद्ध’ और खबरों के ‘कातिल’: हरैया में सिसकती पत्रकारिता की मरण-गाथा।”
- “अब अखबार में खबरें नहीं, ‘मैनेजमेंट’ छपता है: हरैया के पत्रकारों की नई दुकान का उद्घाटन!”
- “चौकी इंचार्ज की जेब में कलम और नेताओं के जूतों में पत्रकार: बस्ती मंडल की नई तस्वीर!”
- “खबरों का ‘महाकाल’ टी सेंटर: जहाँ चाय की चुस्की के साथ दबा दिए जाते हैं बड़े-बड़े कांड।”
- “पत्रकारिता के नाम पर ‘वसूली’ का नया ब्रांड: हरैया के वीरों को हमारा सलाम!”
- “शर्म मगर इन्हें नहीं आती: जब जनता पीटे तो समझना कि पत्रकार अब ‘दलाल’ बन चुका है।”
बस्ती। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज अपनी ही बुनियाद पर खड़ा होने से कतरा रहा है। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में पत्रकारिता की जो तस्वीर उभर रही है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि शर्मसार करने वाली भी है। हाल ही में ‘कुदरहा’ के पत्रकारों की कार्यशैली पर उठे सवालों की गूँज अभी थमी भी नहीं थी कि अब ‘हैरैया’ क्षेत्र के पत्रकारों की चुप्पी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या हैरैया के पत्रकारों का भी ज़मीर मर चुका है?
जनता का भरोसा टूटा, जश्न मनाती है भीड़
आज स्थिति यह है कि जब किसी पत्रकार के साथ अभद्रता होती है या उसकी पिटाई होती है, तो समाज सहानुभूति दिखाने के बजाय मन ही मन खुशी मनाता है। लोग कहते हैं— “अच्छा हुआ, यह इसी लायक था।” यह विडंबना मीडिया जगत के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। जब जनता पत्रकार, पुलिस और भ्रष्ट नेताओं में फर्क करना बंद कर दे, तो समझ लीजिए कि कलम की धार को स्वार्थ की जंग लग चुकी है।
कुदरहा से हरैया तक: खामोशी का सौदा?
मुद्दों से भटका ध्यान: गैस सिलेंडर और चाय की चुस्की
हरैया के पत्रकारों को न तो 100 बेड वाले सीएचसी (CHCH) अस्पताल में हो रही लूटपाट दिखाई देती है और न ही आम जनता को सताती घरेलू गैस की समस्या। सवाल उठता है कि क्या इन पत्रकारों की प्राथमिकता अब केवल विज्ञापन बटोरना और नेताओं की जीहुजूरी करना रह गई है?
“जब कलम विज्ञापन खरीदने और बेचने का जरिया बन जाए, तो वह पत्रकारिता नहीं, विशुद्ध व्यापार है।”
उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में पत्रकारिता की पवित्रता पर काले बादल मँडरा रहे हैं। हाल ही में कुदरहा के पत्रकारों की कार्यशैली पर उठे सवालों ने अभी जनता के गुस्से को शांत भी नहीं होने दिया था कि अब ‘हैरैया’ क्षेत्र से आ रही खबरें पत्रकारिता के ताबूत में आखिरी कील ठोकती नजर आ रही हैं। सवाल सीधा है और बेहद तीखा है— क्या कुदरहा की तर्ज पर हैरैया के पत्रकारों का भी ‘ज़मीर’ मर चुका है?
१. जनता की अदालत में ‘चौथा स्तंभ’ अपराधी की तरह खड़ा है
कहना गलत नहीं होगा कि आज जनता नेताओं और अधिकारियों से ज्यादा पत्रकारों के चरित्र की समीक्षा कर रही है। जब से मोबाइल हाथ में आने से हर व्यक्ति पत्रकार बन बैठा है, तब से असली और नकली का फर्क मिट गया है। लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जो लोग खुद को ‘महारथी’ कहते हैं, उनकी कलई खुल चुकी है।
आज जब किसी पत्रकार के साथ मारपीट होती है, तो समाज उसे ‘लोकतंत्र पर हमला’ नहीं मानता, बल्कि लोग तालियाँ बजाकर कहते हैं— “अच्छा हुआ, बहुत लूट मचा रखी थी।” यह समाज की नफरत नहीं, बल्कि मीडिया के प्रति उपजे उस आक्रोश का नतीजा है जहाँ पत्रकारों ने जनहित को छोड़कर ‘जेब-हित’ को प्राथमिकता दी है।
२. ‘कुदरहा’ का वायरल सच और ‘हरैया’ की रहस्यमयी चुप्पी
कुदरहा में एक चौकी इंचार्ज के निलंबन की खबर को जिस तरह तीन दिनों तक दबाकर रखा गया, उसने स्पष्ट कर दिया कि वहाँ की मीडिया ‘मैनेज’ हो चुकी थी। लेकिन हैरैया की कहानी तो और भी शर्मनाक है।
आशनाई और हत्या पर मौन: हरैया क्षेत्र में एक युवक की हत्या का आरोप सीधे तौर पर रवि गुप्त और मृतक की पत्नी पर लगता है। मृतक का भाई न्याय की गुहार लगाते हुए तहरीर देता है, लेकिन क्षेत्र के ‘शूरवीर’ पत्रकारों की कलम को लकवा मार जाता है।
दलाली का नया केंद्र: चर्चा है कि ‘महाकाल टी सेंटर’ जैसे ठिकाने अब खबरों के नहीं, बल्कि सौदेबाजी के केंद्र बन गए हैं। सवाल उठता है कि क्या एक चाय की दुकान इतनी ताकतवर हो गई है कि वह हैरैया के धुरंधर पत्रकारों का मुँह बंद कर सके?
३. मुद्दों की मौत: अस्पताल की लूट और गैस की कालाबाजारी
हरैया के पत्रकारों को यह नहीं दिखता कि 100 बेड वाले सीएचसी (CHCH) अस्पताल में गरीब जनता को किस तरह लूटा जा रहा है। उन्हें घरेलू गैस की किल्लत और उसके पीछे चल रहा काला धंधा नजर नहीं आता। क्यों? क्योंकि इन मुद्दों को उठाने से ‘लिफाफा’ नहीं मिलता।
“जब पत्रकार की प्राथमिकता ‘जनता की आवाज’ बनने के बजाय ‘नेताओं की जीहुजूरी’ करना हो जाए, तो समझ लीजिए कि कलम अब चाटुकारिता का औजार बन चुकी है।”
४. विज्ञापन का काला खेल: खबर नहीं, अब धंधा है
आज का पत्रकार खबर नहीं खोजता, वह ऐसे शिकार खोजता है जिससे विज्ञापन वसूला जा सके। अखबार के कार्यालय खुलने का क्या फायदा, जब वहाँ बैठने वाले लोग पत्रकार के चोले में ‘वसूली भाई’ बन चुके हों? विज्ञापन को अधिकार तक सीमित रखने के बजाय इसे ‘कारोबार’ बना दिया गया है। जब पत्रकार खुद विज्ञापन खरीदेगा और बेचेगा, तो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने की हिम्मत खो देगा।
५. आत्ममंथन का समय: क्या अभी भी कुछ बाकी है?
यह लेख हरैया के उन चुनिंदा पत्रकारों के लिए नहीं है जो आज भी जेल जाने का जोखिम उठाकर सच लिखते हैं। बल्कि यह प्रहार उन ‘कलम के सौदागरों’ पर है जिन्होंने चंद रुपयों, लीटी-चोखा और शराब की बोतलों के लिए अपनी आत्मा बेच दी है।
अतीत का गौरव बनाम वर्तमान की कालिख
एक समय था जब हरैया क्षेत्र के पत्रकारों की धमक से भ्रष्ट अधिकारी और नशे के तस्कर कांपते थे। आज वही हैरैया अपनी पहचान खो रहा है। कुछ मुट्ठी भर पत्रकार अब भी ईमानदारी की जंग लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज ‘महासभा’ और ‘लिफाफा संस्कृति’ के शोर में दबती जा रही है।
सुधरने का आखिरी मौका
अगर आज भी मीडिया जगत ने अपनी छवि को सुधारने पर जोर नहीं दिया, तो वह दिन दूर नहीं जब ‘अखबार बेचने वाले’ और ‘सब्जी बेचने वाले’ में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। विज्ञापन को अधिकार तक सीमित रखें, उसे अपना व्यापार न बनाएं। हैरैया और कुदरहा के पत्रकारों को यह समझना होगा कि उनकी कलम किसी की जागीर नहीं, बल्कि जनता की अमानत है।
हरैया और कुदरहा के पत्रकारों को यह समझना होगा कि जनता सब देख रही है। अगर आज आपने अपनी साख नहीं बचाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ आपको पत्रकार नहीं, बल्कि ‘खबरों का दलाल’ कहकर पुकारेंगी। सुधार की गुंजाइश अभी भी है, बशर्ते आपकी कलम नेताओं की चौखट पर सजदा करना छोड़ दे।
सम्पादकीय टिप्पणी:
बस्ती मंडल की पत्रकारिता को फिर से जीवित करने के लिए इन ‘दीमकों’ को पहचानना और समाज से बहिष्कृत करना अनिवार्य हो गया है। कलम की धार को फिर से तेज कीजिए, वरना इतिहास आपको माफ नहीं करेगा।
सावधान! अगर ज़मीर मर गया है, तो याद रखिए, इतिहास की स्याही बहुत क्रूर होती है।
















