
अजीत मिश्रा (खोजी)
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- शांति इंडियन गैस की गुंडागर्दी: हर्रैया में गैस की कालाबाजारी चरम पर, आपूर्ति विभाग ने साधी रहस्यमयी चुप्पी
- “महाभ्रष्टाचार! हर्रैया में गैस सिलेंडरों की लूट: जेब गर्म कर सो रहे जिम्मेदार, मायूस होकर घर लौट रही जनता।”
- “गैस माफिया और अधिकारियों का नापाक गठजोड़: शांति गैस एजेंसी बनी कालाबाजारी का अड्डा!”
- “बस्ती में ‘हवा’ हुई योगी सरकार की सख्ती: आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा शांति गैस की कालाबाजारी का साम्राज्य?”
बस्ती। जनपद के हर्रैया स्थित ‘शांति इंडियन गैस’ एजेंसी इन दिनों उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि गैस सिलेंडरों की खुलेआम कालाबाजारी के लिए चर्चा में है। शासन के कड़े निर्देशों के बावजूद, हर्रैया शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक गैस की रीफिलिंग और ऊंचे दामों पर बिक्री का काला खेल धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे खेल से अनजान बने हुए हैं, जिससे उपभोक्ताओं में भारी आक्रोश व्याप्त है।
सुविधा शुल्क के प्रभाव में मूकदर्शक बने अधिकारी?
क्षेत्र में चर्चा है कि आपूर्ति कार्यालय की इस चुप्पी के पीछे ‘जेब गर्म’ होने का बड़ा खेल है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? अधिकारियों के बड़े-बड़े दावे धरातल पर पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं। आरोप है कि “विटामिन-एम” (रिश्वत) की खुराक ने विभाग की आंखों पर पट्टी बांध दी है, यही कारण है कि एजेंसी संचालक के हौसले बुलंद हैं और वह नियमों को ताक पर रखकर व्यापार कर रहा है।
रात भर लाइन में जनता, सुबह मिलता है ‘गैस खत्म’ का बोर्ड
एजेंसी पर बदइंतजामी का आलम यह है कि आम जनता रात 8:00 बजे से ही लाइन लगाकर सुबह होने का इंतजार करती है। भीषण गर्मी और रातों की नींद खराब करने के बाद जब सुबह 7:00 बजे बारी आती है, तो संचालक की ओर से ‘गैस खत्म’ होने का फरमान सुना दिया जाता है। खाली सिलेंडर लेकर मायूस होकर घर लौटते उपभोक्ताओं के चेहरे प्रशासन की नाकामी की कहानी खुद बयां कर रहे हैं।
सवालों के घेरे में आपूर्ति विभाग
कालाबाजारी के इस सिंडिकेट से आम जनमानस त्रस्त है। आखिर क्या कारण है कि शिकायतों के बाद भी शांति इंडियन गैस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती? क्या विभाग किसी बड़ी अनहोनी या जन-आंदोलन का इंतजार कर रहा है?
अब देखना यह होगा कि खबर प्रकाशित होने के बाद क्या जिलाधिकारी और विभागीय उच्चाधिकारी इस कालाबाजारी पर लगाम कसते हैं, या फिर रसूखदार संचालक और भ्रष्ट अधिकारियों की साठगांठ यूं ही जनता का हक मारती रहेगी।
















