
राम की पैड़ी: आस्था के आंगन में ‘अधर्म’ का तड़का!
— एक तीखा कटाक्ष
- अयोध्या का ‘सिस्टम’ फेल: पावन तट पर शराब और कबाब, जिम्मेदार मौन।
- श्रद्धा की बलि चढ़ाता ठेकेदारी प्रथा का ‘गंदा खेल’, संतों ने खोली पोल।
- सुरक्षा में सेंध या आस्था से खिलवाड़? राम की पैड़ी पर ‘रात की पार्टी’।
अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की नगरी में ‘मर्यादा’ शब्द अब शायद सिर्फ भाषणों और सरकारी विज्ञापनों तक सीमित रह गया है। जिस राम की पैड़ी को दुनिया भर के हिंदुओं की आस्था का केंद्र बताकर करोड़ों की लागत से चमकाया गया, उसी की छाती पर बैठकर मांस के लोथड़े उबाले जा रहे हैं। निर्माण कार्य में लगे मजदूरों ने पावन सरयू तट को ‘ऐय्याशी का अड्डा’ बना दिया है, और शासन-प्रशासन की नाक के नीचे ‘मछली-मदिरा’ का दौर बेधड़क जारी है।
व्यवस्था की ‘अंधी’ आंखें
हैरानी इस बात पर नहीं है कि चंद मजदूरों ने नियमों को ठेंगा दिखाया, हैरानी तो उस तंत्र पर है जिसकी जिम्मेदारी इस पावन भूमि की शुचिता बचाए रखने की थी। लक्ष्मण घाट चौकी की दूरी इस ‘पाप की रसोई’ से चंद कदमों की है, लेकिन मजाल है कि खाकी की नजर इन जलते चूल्हों पर पड़ी हो। क्या पुलिस का इकबाल सिर्फ आम आदमी के हेलनट चेक करने तक सीमित है? या फिर ‘निर्माण’ की आड़ में चल रहे इस ‘विनाश’ को अनदेखा करने के लिए ऊपर से कोई विशेष निर्देश था?
जहां आस्था की लौ थी, वहां कड़ाही चढ़ी
संतों ने जब रंगे हाथ इस तमाशे को पकड़ा, तो जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी भी रामभक्त का कलेजा छलनी करने के लिए काफी हैं। घाटों पर हड्डियां बिखरी पड़ी थीं, शराब की बदबू हवाओं में घुली थी। जिस नगरी में परिंदा भी पर मारने से पहले ‘मर्यादा’ का ध्यान रखता हो, वहां विकास के नाम पर बुलाए गए मजदूरों ने मर्यादा की धज्जियां उड़ा दीं। यह सिर्फ एक भोजन की प्लेट का सवाल नहीं है, यह उस आस्था पर प्रहार है जिसके लिए अयोध्या सदियों से जानी जाती है।
सवाल जो चुभेंगे…
- क्या ठेकेदारों को छूट दी गई है कि वे अयोध्या की गरिमा की बलि चढ़ाकर काम पूरा करें?
- क्या जिला प्रशासन की मॉनिटरिंग सिर्फ फाइलों और ड्रोन फुटेज तक सीमित है?
- अयोध्या को ‘विश्व स्तरीय’ शहर बनाने का सपना क्या यही है, जहां विकास की ईंटें मांस के शोरबे से भिगोई जा रही हों?
निष्कर्ष: पत्थरों के साथ संस्कार भी बचाओ
भव्य मंदिर और सुंदर घाटों का क्या फायदा, अगर हम वहां की पवित्रता ही सुरक्षित न रख पाएं। संतों का आक्रोश जायज है और यह आक्रोश अब दिल्ली-लखनऊ की सत्ता को झकझोर रहा है। प्रशासन को समझना होगा कि राम की पैड़ी कोई ‘पिकनिक स्पॉट’ या ‘मजदूर कॉलोनी’ नहीं है। दोषियों पर कार्रवाई तो होगी ही, लेकिन जवाबदेही उन अधिकारियों की भी तय होनी चाहिए जो एसी कमरों में बैठकर अयोध्या की सुरक्षा के दावे करते हैं।
अयोध्या की जनता और संत समाज आज सिर्फ एक ही बात पूछ रहा है— ये राम की पैड़ी है या रात की पार्टी?















