
अजीत मिश्रा (खोजी)
विकासनगर अग्निकांड: मौत की बस्ती पर हाईकोर्ट का ‘हंटर’, व्यवस्था के रक्षकों से पूछे तीखे सवाल
ब्यूरो रिपोर्ट, उत्तर प्रदेश
- 4 बीघा जमीन, 1455 लोग और सिस्टम की गहरी नींद; विकासनगर कांड पर हाईकोर्ट सख्त
- विकासनगर अग्निकांड: हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान; DM, CMO और नगर निगम को फटकार
- मासूमों की मौत का जिम्मेदार कौन? हाईकोर्ट ने PWD और प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया
लखनऊ। राजधानी के विकासनगर में हुए भीषण अग्निकांड ने न केवल मासूम जिंदगियों को राख कर दिया, बल्कि शहर के नियोजन और प्रशासन की सड़ चुकी व्यवस्था को भी बेनकाब कर दिया है। इस हृदयविदारक घटना पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। कोर्ट की टिप्पणियों ने उन अधिकारियों की नींद उड़ा दी है जो अब तक ‘अवैध’ के नाम पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे थे।
सरकारी जमीन पर ‘नरक’ का निर्माण कैसे?
हाईकोर्ट ने सीधे तौर पर व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार करते हुए पूछा कि PWD की सुरक्षित जमीन पर आखिर यह विशाल बस्ती बसी कैसे? कोर्ट का गणितीय सवाल प्रशासन के लिए फांस बन गया है: “मात्र 4 बीघा जमीन पर 1455 लोग कैसे ठूंसे गए थे?” यह सवाल उस भ्रष्ट तंत्र की ओर इशारा करता है जो अपनी नाक के नीचे वर्षों से अवैध कब्जे होने देता है और फिर किसी बड़े हादसे का इंतजार करता है।
जब जमीन ‘अवैध’ तो सुविधाएं ‘वैध’ कैसे?
अदालत ने सिस्टम के दोहरे चरित्र को आड़े हाथों लेते हुए पूछा है कि अगर बस्ती अवैध थी, तो वहां बिजली के मीटर और गैस कनेक्शन की खैरात किसने बांटी?
- क्या विभाग सो रहे थे?
- क्या यह वोट बैंक की राजनीति का नतीजा था?
- या फिर निचले स्तर के अधिकारियों की जेबें गर्म की जा रही थीं?
- कोर्ट ने DM, CMO और नगर निगम को कठघरे में खड़ा करते हुए 30 मई तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का कठोर आदेश दिया है।
राहत और पुनर्वास पर कड़ा रुख
अदालत केवल सवालों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देते हुए पीड़ितों के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं:
- अस्थाई आवास और भोजन: बेघर हुए परिवारों को तत्काल छत और भोजन उपलब्ध कराने का आदेश।
- मुआवजा: हादसे में जान गंवाने वाले दो मासूम बच्चों के परिवारों को 4-4 लाख रुपये के मुआवजे की जानकारी कोर्ट को दी गई है, लेकिन कोर्ट की सख्ती पुनर्वास पर अधिक केंद्रित है।
- इलाज: घायलों के समुचित उपचार की जिम्मेदारी CMO को सौंपी गई है।
सिस्टम की लापरवाही का ‘डेथ वारंट’
यह अग्निकांड महज एक ‘हादसा’ नहीं, बल्कि प्रशासनिक नपुंसकता का परिणाम है। हाईकोर्ट का हस्तक्षेप इस बात का प्रमाण है कि अब कागजी खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा। जब शहर के बीचों-बीच PWD की जमीन पर सैकड़ों परिवार असुरक्षित स्थिति में रह रहे थे, तब नगर निगम और PWD के आला अधिकारी एसी कमरों में बैठकर फाइलों पर कौन सी लकीरें पीट रहे थे?
30 मई की तारीख अब उत्तर प्रदेश के उन तमाम विभागों के लिए अग्निपरीक्षा होगी, जो जवाबदेही से बचने के लिए एक-दूसरे पर गेंद फेंकने के आदी हो चुके हैं। हाईकोर्ट के इस ‘हंटर’ ने स्पष्ट कर दिया है कि गरीबों की जान से खेलने वाले तंत्र को अब बख्शा नहीं जाएगा।



















