
अजीत मिश्रा (खोजी)
कप्तानगंज शिक्षा विभाग में ‘अंगद’ बने बीईओ, व्यवस्था या भ्रष्टाचार की जुगलबंदी?
- गोरखपुर के दागदार अतीत के बाद कप्तानगंज में कैसे मिली ‘क्लीन चिट’?
- शिक्षक संगठन मौन, बीएसए मेहरबान; क्या यही है बेसिक शिक्षा का नया अभियान?
- 75 फीसदी शिक्षक असंतुष्ट, फिर भी कुर्सी सुरक्षित; आखिर इस ‘जुगलबंदी’ का राज क्या है?
बस्ती, उत्तर प्रदेश ।। ब्यूरो रिपोर्ट।। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहाँ एक ओर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति और अधिकारियों के पटल परिवर्तन (तबादला नीति) पर जोर दे रहे हैं, वहीं जनपद बस्ती का शिक्षा विभाग अपनी अलग ही कहानी लिख रहा है। विकास खण्ड कप्तानगंज में खण्ड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) प्रभात कुमार श्रीवास्तव की तैनाती अब केवल प्रशासनिक मामला नहीं, बल्कि चर्चाओं का एक ‘हॉटस्पॉट’ बन गई है। सवाल यह है कि क्या पूरा विभाग एक अधिकारी के आगे नतमस्तक है या फिर यह कोई गहरा ‘सेटिंग-गेटिंग’ का खेल है?
कप्तानगंज विकास खण्ड: खण्ड शिक्षा अधिकारी प्रभात कुमार श्रीवास्तव की लंबी पारी पर उठते सुलगते सवाल
- कप्तानगंज में बीईओ की तैनाती से जुड़ा पेचीदा मामला: आखिर तीन साल से एक ही खूँटे पर क्यों टिकी है व्यवस्था?
- जनपद का कोई भी बीईओ तैनाती स्थल पर नहीं करता निवास, फिर भी बीएसए की नज़र में ‘आल इज वेल’
पुरानी दागदार छवि और कप्तानगंज का ‘कठोर’ अनुशासन
सूत्रों की मानें तो प्रभात कुमार श्रीवास्तव जब गोरखपुर जनपद में तैनात थे, तब भी उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। बस्ती आगमन के बाद कप्तानगंज में उनके लगभग तीन साल के कार्यकाल का रिकॉर्ड देखा जाए, तो यह ‘अनुशासन’ से ज्यादा ‘खौफ’ की कहानी बयां करता है। इस दौरान:
- लगभग आधा दर्जन शिक्षकों का निलंबन किया गया।
- तनावपूर्ण स्थितियों के बीच दो शिक्षकों की अकाल मृत्यु हो चुकी है।
- विरोधाभास: एक तरफ कार्रवाई की तलवार लटकी रहती है, तो दूसरी तरफ कथित तौर पर उनके चहेते शिक्षक-शिक्षिकाओं को ‘स्कूल न आने’ की मौन स्वीकृति के रूप में सौगात दी गई है।
तीन साल की ‘लंबी पारी’: नियमों को ठेंगा
सरकारी नियमावली के अनुसार, किसी भी पटल या क्षेत्र में एक अधिकारी की अति-दीर्घकालीन तैनाती अवांक्षित गतिविधियों और भ्रष्टाचार को जन्म देती है। प्रभात कुमार श्रीवास्तव को कप्तानगंज की कमान संभाले लगभग तीन साल होने को हैं। ताज्जुब की बात यह है कि उनके पास बहादुरपुर विकास खण्ड का भी अतिरिक्त प्रभार है। क्या पूरे जनपद में अधिकारियों का इतना अकाल है कि एक ही व्यक्ति पर मेहरबानियों की बारिश की जा रही है? या फिर बहादुरपुर और कप्तानगंज की ‘मलाई’ का प्रबंधन केवल इन्हीं के पास है?
“यदि कप्तानगंज में उनके कार्यकाल के दौरान हुए आय-व्यय, निर्माण कार्यों और खरीददारी की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो भ्रष्टाचार की परतें उधड़ने में देर नहीं लगेगी।” — विभागीय सूत्र
दहशत और मेहरबानी का दोहरा चेहरा
यह कड़वा सच है कि इनके कार्यकाल में कप्तानगंज के भीतर एक अजीब सा विरोधाभास जन्मा है।
- कार्रवाई का चाबुक: आधा दर्जन शिक्षकों का निलंबन इस बात का संकेत है कि यहाँ ‘अनुशासन’ के नाम पर भय का माहौल है। चर्चा है कि दो शिक्षकों की मौत के पीछे का मानसिक दबाव कहीं न कहीं विभागीय उत्पीड़न से जुड़ा था।
- वफादारों को ‘अघोषित अवकाश’: जहाँ एक तरफ निलंबन की कार्रवाई हो रही है, वहीं दूसरी तरफ बीईओ के ‘खास’ माने जाने वाले शिक्षक और शिक्षिकाएं महीनों स्कूल से नदारद रहने के बावजूद वेतन पा रहे हैं। यह ‘मैनेजमेंट’ बिना उच्चाधिकारियों की मूक सहमति के संभव नहीं है।
कस्तूरबा और पीएम श्री: भ्रष्टाचार की नई प्रयोगशाला?
प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘पीएम श्री’ और गरीब बच्चियों के लिए बने ‘कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों’ की हालत कप्तानगंज में कागजों पर तो सुनहरी है, लेकिन धरातल पर धूल फांक रही है। सूत्रों का दावा है कि इन विद्यालयों के संचालन, खरीदारी और आय-व्यय में भारी बंदरबांट हुई है। यदि शासन स्तर से इसकी ‘स्पॉट जांच’ कराई जाए, तो कप्तानगंज से लेकर जिला मुख्यालय तक के कई सफेदपोशों की गर्दन फंसना तय है।
बीएसए की चुप्पी: ‘मजबूरी’ या ‘साझेदारी’?
जनपद के बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) का यह दावा कि “आल इज वेल” (सब कुछ ठीक है), अपने आप में एक हास्यास्पद बयान है। जब जनपद का कोई भी बीईओ अपने तैनाती स्थल पर निवास नहीं करता और रोज घंटों का सफर तय कर दफ्तर पहुंचता है, तो वे क्षेत्र की निगरानी कैसे करते होंगे? बीएसए और बीईओ के बीच की यह ‘मधुरता’ उस समय संदेह के घेरे में आती है जब नियम-कायदों को ताक पर रखकर एक ही अधिकारी को वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाता है।
शिक्षक संगठनों का ‘मौन’ व्रत
कप्तानगंज के 75% से अधिक शिक्षक अंदर ही अंदर घुट रहे हैं और बीईओ की कार्यप्रणाली से असहमत हैं। फिर भी, जिले के बड़े-बड़े शिक्षक संगठन इस मुद्दे पर मौन हैं। क्या इन संगठनों के रहनुमाओं को भी ‘सिस्टम’ का हिस्सा बना लिया गया है? विरोध के सुरों का न उठना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी और संगठित हैं।
जांच की दरकार
कप्तानगंज का यह प्रकरण अब केवल तबादले का मुद्दा नहीं रह गया है। यह सरकारी तंत्र की साख पर सवाल है। यदि समय रहते प्रभात कुमार श्रीवास्तव के कार्यकाल के वित्तीय लेनदेन और उनके द्वारा की गई दंडात्मक कार्रवाइयों की समीक्षा नहीं की गई, तो कप्तानगंज में बेसिक शिक्षा का ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा।
ब्यूरो रिपोर्ट की सीधी मांग है: क्या जिलाधिकारी और शासन के आला अधिकारी इस ‘जुगलबंदी’ को तोड़ेंगे, या फिर कप्तानगंज इसी तरह ‘मजबूरी’ का शिकार बना रहेगा?



















