
अजीत मिश्रा (खोजी)
⛽बस्ती में ‘हाहाकार’: सिस्टम फेल, तेल का खेल और जनता बेहाल!⛽
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
- प्रशासन की ‘सुस्ती’ और जनता की ‘ख्वारी’: तेल संकट ने बस्ती मंडल की कमर तोड़ी!
- बस्ती में ‘अच्छे दिन’ गायब: पेट्रोल पंपों पर तेल नहीं, सिर्फ मायूसी की कतारें!
- साहब! फाइलें नहीं, तेल भेजिए; बस्ती की रफ्तार पर लगा सरकारी ‘ब्रेक’।
- पंपों पर लटका ‘No Stock’ का बोर्ड, क्या यही है बस्ती का विकास?
- सहालग और खेती के बीच तेल का महासंकट: बस्ती के किसानों की मेहनत पर प्रशासन का ‘पानी’!
- शहर से गांव तक हाहाकार: तेल खत्म, धैर्य खत्म, अब क्या सड़कों पर उतरेगी बस्ती?
- पंपों पर लंबी कतारें, मन में भारी रोष: आखिर कब थमेगा तेल का ये खेल?
दिनांक: 21 अप्रैल, 2026 बस्ती। जिले में पेट्रोल-डीजल की किल्लत ने अब ‘इमरजेंसी’ जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। शहर से लेकर रुधौली और मुंडेरवा के ग्रामीण अंचलों तक, पंपों पर ‘No Stock’ के बोर्ड लटक रहे हैं। कहने को तो हम डिजिटल इंडिया और विकास की बातें करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आज बस्ती का किसान, छात्र और आम आदमी एक-एक बूंद तेल के लिए दर-दर भटक रहा है।
⛽53 पंप ‘ड्राई’, प्रशासन ‘मौन’
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, जिले के 53 पेट्रोल पंप पूरी तरह सूख चुके हैं। रविवार से शुरू हुआ यह संकट सोमवार तक गहरा गया और मंगलवार को इसने विकराल रूप ले लिया। रुधौली क्षेत्र के कई पंपों पर तो ताले लटक गए हैं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन को इस संकट की आहट पहले नहीं हुई थी? या फिर तेल कंपनियों और डिपो के बीच के तालमेल की कमी का खामियाजा हमेशा की तरह आम जनता को ही भुगतना पड़ेगा?
⛽किल्लत या ‘कालाबाजारी’ का खेल?
सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें लगी हैं, लेकिन कुछ ही घंटों में तेल खत्म होने का ऐलान कर दिया जाता है। ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ पंपों पर तेल नहीं है, वहीं गलियों और छोटी दुकानों में पेट्रोल-डीजल ऊंचे दामों पर बिकने की खबरें आ रही हैं। आखिर यह ‘कृत्रिम संकट’ किसके फायदे के लिए पैदा किया गया है? क्या विभागीय अधिकारी सिर्फ फाइलों में ‘पर्याप्त स्टॉक’ का दावा करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेंगे?
⛽जनता के सब्र का इम्तिहान
“साहब, सुबह से तीन पंपों के चक्कर काट चुका हूँ। खेती का काम रुका है, लेकिन यहाँ तेल का पता नहीं। गैलन लेकर आने वालों को भगाया जा रहा है, जबकि रसूखदारों की गाड़ियां पीछे के रास्ते से भरी जा रही हैं।” — एक परेशान किसान (बस्ती)
🎯अधिकारियों से सीधे सवाल:
- जब डिपो से सप्लाई में दिक्कत थी, तो समय रहते ‘बैकअप’ प्लान क्यों नहीं बनाया गया?
- कालाबाजारी करने वालों पर अब तक कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- शादी-ब्याह (सहालग) और खेती के सीजन में जनता को इस तरह लाचार छोड़ना क्या ‘सुशासन’ है?
निष्कर्ष:
बस्ती की जनता अब आश्वासनों से थक चुकी है। अगर अगले 24 घंटों में तेल की आपूर्ति सामान्य नहीं हुई, तो आक्रोश की यह आग सड़कों पर उतर सकती है। प्रशासन को चाहिए कि वह एसी कमरों से बाहर निकले और धरातल पर उतरकर इस ‘तेल के खेल’ को खत्म करे।
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल
















