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बड़ी खबर: गांधी जी को अंग्रेजों से मिली पेंशन पर उठा देशव्यापी सवाल — सावरकर को नहीं मिले 60 रुपये, पर गांधी को 1930 में 100 रुपये से बढ़कर 550 रुपये तक पेंशन क्यों?

राष्ट्रीय अभिलेखागार से मिले दस्तावेज़ों के हवाले से देश में छिड़ी नई बहस

🔴 बड़ी खबर: गांधी जी को अंग्रेजों से मिली पेंशन पर उठा देशव्यापी सवाल — सावरकर को नहीं मिले 60 रुपये, पर गांधी को 1930 में 100 रुपये से बढ़कर 550 रुपये तक पेंशन क्यों?

✍️ उपशीर्षक: राष्ट्रीय अभिलेखागार से मिले दस्तावेज़ों के हवाले से देश में छिड़ी नई बहस — स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्षरत वीर सावरकर को न मिलने वाली मामूली आर्थिक सहायता के बरअक्स महात्मा गांधी को ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई पेंशन पर गूंज रहे सवाल।

नई दिल्ली। देश में स्वतंत्रता संग्राम के नायकों और ब्रिटिश शासन के दौर में हुई आर्थिक लेन-देन की हकीकत को लेकर बहस तेज हो गई है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार वीर सावरकर जी को अंग्रेजों से 60 रुपये मिलने का कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद रिकॉर्ड बताते हैं कि महात्मा गांधी को 1930 में अंग्रेज सरकार की ओर से प्रतिमाह 100 रुपये की पेंशन मिलती थी, जो बाद में बढ़कर 450 रुपये और फिर 550 रुपये तक पहुंच गई। इस खुलासे के बाद देशभर में यह सवाल गूंजने लगा है कि आखिरकार ऐसी कौन सी सेवाएं थीं जो गांधी जी अंग्रेजों को प्रदान कर रहे थे, जिसके लिए ब्रिटिश सरकार उन्हें पेंशन देती रही, जबकि सावरकर जैसे क्रांतिकारी को काले पानी की सजा और अपमानजनक परिस्थितियों में वर्षों तक जेल में रखा गया। यह मामला इतिहास और राष्ट्रवाद की धारा में एक नई बहस को जन्म दे रहा है। आजादी के आंदोलन के दौरान वीर सावरकर ने अंडमान की सेल्युलर जेल में अमानवीय यातनाएं झेलीं और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र क्रांति का आह्वान किया। वहीं, महात्मा गांधी को कई बार गिरफ्तार जरूर किया गया, लेकिन उनके आंदोलनों और नीतियों को लेकर अंग्रेजों के साथ उनके संबंध हमेशा चर्चा में रहे। इतिहासकारों के अनुसार, गांधी जी के असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन पर दबाव तो बनाया, लेकिन यह भी तथ्य सामने आता है कि उनके आंदोलनों को कई बार अचानक वापस ले लिया गया, जिससे अंग्रेजों को राहत मिली। अब जब यह खुलासा हुआ कि ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी को पेंशन दी, तो यह सवाल और गहराता जा रहा है कि क्या यह पेंशन किसी विशेष कारण से दी गई थी या फिर यह किसी तरह की समझौता नीति का हिस्सा थी। राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह बहस गरमाई हुई है। राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग इस पर तीखे सवाल उठा रहे हैं कि जिस सावरकर को ‘माफीनामा’ को लेकर वर्षों तक बदनाम किया गया, उसे अंग्रेजों से कभी कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली, बल्कि उन्होंने अपना जीवन जेल में यातनाएं झेलते हुए गुजारा। इसके विपरीत, गांधी जी को ब्रिटिश सरकार की ओर से आर्थिक मदद का प्रावधान किया गया, जो आज के संदर्भ में एक बड़े ऐतिहासिक सवाल के रूप में खड़ा है। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई लोग इसे आजादी के संघर्ष के इतिहास में छिपाई गई सच्चाइयों को उजागर करने का मौका मान रहे हैं, जबकि गांधी समर्थक इसे उनके राजनीतिक और सामाजिक कार्यों के संदर्भ में गलत तरीके से पेश करने की कोशिश बता रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बहस का समाधान केवल राष्ट्रीय अभिलेखागार और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों के गहन अध्ययन से ही हो सकता है। तथ्यों को सामने लाना जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक इतिहास की जानकारी मिल सके और किसी भी नेता के योगदान या आचरण को मिथकों के बजाय साक्ष्यों के आधार पर समझा जा सके। यह विवाद महज आर्थिक पेंशन की रकम पर नहीं है, बल्कि इस बात पर भी है कि राष्ट्रपिता कहे जाने वाले गांधी जी और क्रांतिकारी सावरकर के ब्रिटिश शासन के साथ संबंधों को आखिर कैसे आंका जाए। देश की जनता आज भी इस पर स्पष्ट जवाब चाहती है कि आजादी की लड़ाई के दौर में अंग्रेजों की नीतियों के साथ सहयोग और टकराव के बीच किसकी भूमिका कितनी ईमानदार और निस्वार्थ थी।

✍️ रिपोर्ट:
एलिक सिंह
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़ एवं समृद्ध भारत समाचार पत्र
📞 8217554083

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