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मिठवल में विकास के नाम पर ‘सरकारी डकैती’, कागजों पर दौड़ी विकास की गंगा!

भ्रष्टाचार का 'ब्लैक होल' बना मिठवल: मुर्दों के नाम पर नाली और हवा में जल रही एलईडी!

अजीत मिश्रा (खोजी)

मिठवल में ‘लूट’ का सरकारी मॉडल: कागजों पर दौड़ी विकास की गंगा, हकीकत में खाली मिले डिब्बे!

विशेष ब्यूरो रिपोर्ट: सिद्धार्थनगर , बस्ती मंडल: उत्तर प्रदेश

  • सावधान! सिद्धार्थनगर में सरकारी धन की खुली लूट, प्रधान और सचिव ने मिलकर डकारी जनता की गाढ़ी कमाई।
  • सिद्धार्थनगर महाघोटाला: जहाँ ‘सुधीर’ का वजूद नहीं, वहां नाली निर्माण पर फूंके 1.36 लाख!
  • कागजों पर चमचमाती सड़क, जमीन पर सिर्फ धूल; मिठवल ब्लॉक में जांच के बाद मचा हड़कंप।
  • बच्चों की सेहत पर भी डाका: ओपन जिम के बजट में भी जिम्मेदारों ने काट ली अपनी ‘कमीशन’।
  • जांच में घोटाला सिद्ध, फिर भी दोषियों को संरक्षण क्यों? प्रशासन की चुप्पी पर सुलगते सवाल।
  • FIR कब? रिकवरी कब? मिठवल के भ्रष्ट ‘सिंडिकेट’ पर कब चलेगा प्रशासन का चाबुक?
  • योगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ को ठेंगा: जीवा ग्राम पंचायत में हुआ लाखों का वारा-न्यारा।

सिद्धार्थनगर। उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले का मिठवल ब्लॉक इन दिनों विकास के नाम पर हुई ‘महा-लूट’ का केंद्र बन गया है। खण्ड विकास अधिकारी (BDO) की जांच रिपोर्ट ने उन रसूखदारों की नींद उड़ा दी है, जिन्होंने जनता की खून-पसीने की कमाई को अपनी तिजोरी का साधन बना लिया था। ग्राम पंचायत ‘जीवा’ में हुए घोटाले की यह परतें इतनी डरावनी हैं कि ईमानदार तंत्र भी शर्मसार हो जाए।

🔍 जांच के 4 बड़े खुलासे: कैसे हुआ खेल?

1. सीसी रोड का ‘कागजी’ जाल:

शत्रुघ्न के घर से रामफेर के घर तक मनरेगा के तहत ₹3,99,189 की लागत से 100 मीटर सीसी रोड का निर्माण होना था। अभिलेखों में इसे पूरा दिखाकर भुगतान भी ले लिया गया। लेकिन जब जांच टीम मौके पर पहुंची, तो माप में भारी कमी मिली। यही नहीं, तकनीकी सहायक कमलापति वर्मा की मिलीभगत से पुराने क्षतिग्रस्त रोड को ही नया बताकर बजट डकारने की कोशिश की गई। परिणामतः, अब ₹66,218 की रिकवरी (कटौती) का आदेश जारी हुआ है।

2. ओपन जिम: सेहत के नाम पर ₹27,500 की ‘कमीशनबाजी’:

प्राथमिक विद्यालय के पास ओपन जिम बनाने के लिए ₹4.02 लाख का भारी-भरकम बजट जारी हुआ। लेकिन जांच में पाया गया कि कराए गए कार्य और भुगतान की गई धनराशि में ₹27,500 का सीधा विचलन (गड़बड़ी) है। यानी बच्चों की सेहत के बजट में भी जिम्मेदारों ने अपना ‘हिस्सा’ निकाल लिया।

3. एलईडी लाइट: उजाले का बजट, गलियों में अंधेरा:

भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा तो यहाँ दिखी, जहाँ वित्तीय वर्ष 2023-24 में एलईडी लाइट लगाने के नाम पर ₹36,000 सरकारी खाते से निकाल लिए गए, लेकिन पूरे गांव में एक भी लाइट नहीं लगी। ग्रामीणों ने साफ कहा कि उन्होंने लाइट की शक्ल तक नहीं देखी। यह सीधे तौर पर गबन का मामला है।

4. नाली निर्माण: सुधीर के घर तक नाली, पर सुधीर है ही नहीं!

सबसे हास्यास्पद और शर्मनाक तथ्य यह है कि ‘सनी के घर से सुधीर के घर तक’ नाली निर्माण के नाम पर ₹1,36,822 फूंक दिए गए। जबकि भौतिक सत्यापन में पता चला कि गांव में ‘सुधीर’ नाम का कोई व्यक्ति ही नहीं रहता और नाली का निर्माण अधूरा पड़ा है।

⚠️ जिम्मेदारों के नाम: जो रडार पर हैं

खण्ड विकास अधिकारी की रिपोर्ट ने निम्नलिखित लोगों को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया है:

  • श्रीमती मीरा: ग्राम प्रधान (जीवा)
  • विकेन्द्र नाथ यादव: सचिव
  • कमलापति वर्मा: तकनीकी सहायक
  • सुनील कुमार: कंसल्टिंग इंजीनियर

कागजी घोड़े दौड़ाकर डकार गए लाखों

जांच में जो खुलासे हुए हैं, वे यह बताने के लिए काफी हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। जहाँ सरकारी रिकॉर्ड में चमचमाती सीसी रोड और मजबूत नालियां दर्ज हैं, वहां हकीकत में या तो काम अधूरा है या फिर उसका वजूद ही नहीं है।

  • अदृश्य एलईडी लाइटें: गांव को रोशन करने के नाम पर एलईडी लाइटों का भुगतान तो हो गया, लेकिन गांव की गलियां आज भी अंधेरे में डूबी हैं।
  • ओपन जिम का ‘खेल’: युवाओं की सेहत बनाने के लिए आए बजट से जिम्मेदारों ने अपनी जेबें गर्म कर लीं। भुगतान और मौके की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर पाया गया है।
  • अधूरी नालियां, पूरा भुगतान: निर्माण कार्य आधा-अधूरा छोड़कर पूरी रकम निकाल ली गई। यह सीधे तौर पर सरकारी धन की लूट का मामला है।

प्रशासनिक मौन पर उठते सुलगते सवाल

सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि जब जांच में भ्रष्टाचार की पुष्टि हो चुकी है, तो अभी तक दोषियों के हाथ में ‘हथकड़ी’ क्यों नहीं लगी? जांच रिपोर्ट आने के बाद भी जिम्मेदारों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई न होना, जिले के उच्चाधिकारियों की मंशा पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है। क्या भ्रष्टाचार की यह गंगा ऊपर से नीचे तक बह रही है?

“यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संगठित अपराध है। गरीब जनता के हक के पैसे पर डाका डालने वालों को आखिर किसका संरक्षण प्राप्त है?”

अब आर-पार की बारी

  • जनता अब केवल आश्वासन नहीं, ‘एक्शन’ चाहती है।
  • क्या इस महाघोटाले में शामिल अधिकारियों और ठेकेदारों पर FIR दर्ज होगी?
  • क्या दोषियों को निलंबित कर उनसे पाई-पाई की रिकवरी की जाएगी?
  • या फिर हर बार की तरह जांच की फाइलें किसी अलमारी में धूल फांकती रहेंगी?

प्रशासन से तीखे सवाल:

“क्या महज ‘कारण बताओ नोटिस’ और ‘रिकवरी’ काफी है? क्या सरकारी धन को व्यक्तिगत जागीर समझने वाले इन सफेदपोशों पर FIR नहीं होनी चाहिए?”

निष्कर्ष:

मिठवल ब्लॉक की यह जांच तो महज एक बानगी है। यदि पूरे जिले की ग्राम पंचायतों की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो भ्रष्टाचार का एक ऐसा पहाड़ निकलेगा जिसे देख सरकार भी दंग रह जाएगी। खण्ड विकास अधिकारी ने एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है, लेकिन जनता पूछ रही है कि क्या ‘स्पष्टीकरण’ से नाली बन जाएगी या गायब हुई लाइटें वापस आ जाएंगी?

मांग: जिले के आला अधिकारी इस मामले में हस्तक्षेप करें और दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजकर एक मिसाल कायम करें।प्रशासन को चाहिए कि वह तत्काल प्रभाव से दोषियों को सलाखों के पीछे भेजे। यदि कार्रवाई में देरी हुई, तो यह स्पष्ट माना जाएगा कि भ्रष्टाचार के इस खेल में प्रशासन खुद ढाल बनकर खड़ा है। बस्ती मंडल की जनता और ‘ब्यूरो रिपोर्ट’ इस मामले की तह तक नजर बनाए हुए है।

न्याय की उम्मीद में…

ब्यूरो रिपोर्ट, सिद्धार्थनगर (बस्ती मंडल)

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