
अजीत मिश्रा (खोजी)
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता बस्ती का विकास; फाइलों में दबे नक्शे, रेंगता प्राधिकरण
बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश संवाददाता: ब्यूरो रिपोर्ट
- अफ़सरों की ‘अरुचि’ और फाइलों की ‘फांस’, बस्ती के मास्टर प्लान का निकला दम।
- उधार के इंजीनियरों के भरोसे ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना: BDA की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल।
- राजस्व को चपत, जनता को आफत: नक्शा लटकाने की नीति से टूट रही शहर की कमर।
- सीलिंग ठप, अवैध निर्माण मस्त: बस्ती विकास प्राधिकरण के दोहरे मापदंड उजागर।
- 217 गांवों का भविष्य अधर में, मास्टर प्लान-2031 बना अधिकारियों की ‘जादुई छड़ी’।
- बस्ती में ‘कछुआ चाल’ विकास: नक्शा पास कराने में बीत रही उम्र, अफ़सरों को फिक्र नहीं।
- वाह रे बी़डीए! न अपना स्टाफ, न अपनी रफ़्तार; बस नोटिस भेजकर दिखा रहे रसूख।
- सांख्यिकी रिपोर्ट ने खोली पोल: विकास कम, ‘खानापूर्ति’ ज्यादा कर रहा प्राधिकरण।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार एक ओर ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी ओर बस्ती विकास प्राधिकरण (BDA) अपनी सुस्ती, लापरवाही और कथित आंतरिक साठगांठ के चलते शहर के सुनियोजित विकास के गले की फांस बन गया है। सांख्यिकी विभाग की हालिया रिपोर्ट ने प्राधिकरण के दावों की पोल खोलकर रख दी है।बस्ती जनपद को एक आधुनिक और सुव्यवस्थित शहर बनाने का जिम्मा जिस बस्ती विकास प्राधिकरण (BDA) के कंधों पर था, आज वही विभाग शहर के विकास के मार्ग का सबसे बड़ा ‘अवरोध’ बन चुका है। सांख्यिकी विभाग की रिपोर्ट और धरातल की हकीकत के बीच का अंतर यह बताने के लिए काफी है कि विभाग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।
सुस्त रफ़्तार: जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक
BDA में नक्शा पास होने की औसत दर में भारी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, चालू सत्र (2025-26) अब समाप्ति की ओर है, लेकिन अब तक मात्र 189 आवासीय और 42 गैर-आवासीय नक्शे ही पास हो सके हैं। यह आंकड़ा पिछले वर्षों (2022-23 में 225 आवासीय नक्शे) की तुलना में विभागीय विफलता का स्पष्ट प्रमाण है। नक्शा पास करने की प्रक्रिया में देरी का सीधा असर राजस्व पर पड़ रहा है, जो विकास के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाने जैसा है।
सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि प्राधिकरण की कार्यक्षमता साल-दर-साल घटती जा रही है।
- वर्ष 2022-23: 225 आवासीय और 26 गैर-आवासीय नक्शे पास हुए।
- वर्ष 2023-24: कुल 207 नक्शे पास हुए।
- वर्तमान सत्र (2025-26): अब तक केवल 189 आवासीय नक्शे ही पास हो सके हैं।
सत्र समाप्त होने को है, लेकिन फाइलों का अंबार कम होने का नाम नहीं ले रहा। सवाल यह है कि जब तकनीक डिजिटल (ऑनलाइन मानचित्र) हो चुकी है, तब भी फाइलों को हफ़्तों और महीनों तक दबाए रखने के पीछे की ‘मंशा’ क्या है?
‘नोटिस’ का खेल: सुधार या वसूली का जरिया?
प्राधिकरण ने हाल ही में 50 से अधिक भू-स्वामियों और व्यापारियों को नोटिस थमाया है। विभागीय अधिकारियों का तर्क है कि ये निर्माण बिना स्वीकृत मानचित्र के हो रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि:
- जब आवेदन महीनों से लंबित हैं, तो आम आदमी निर्माण न करे तो क्या करे?
- क्या यह नोटिस केवल कागजी खानापूर्ति है या फिर ‘लेन-देन’ का कोई नया रास्ता?
नक्शा पास करने में ‘दलाली’ और ‘देरी’ का गठजोड़
प्राधिकरण में नक्शा पास कराना आम नागरिक के लिए किसी जंग से कम नहीं है। रिपोर्ट में स्पष्ट है कि जेई, मेट और जिम्मेदार अधिकारियों की अरुचि के कारण नक्शों का निस्तारण नहीं हो रहा।
- षड्यंत्र का संदेह: सूत्रों की मानें तो जानबूझकर नक्शों में छोटी-छोटी तकनीकी खामियां निकाली जाती हैं, ताकि भू-स्वामी ‘समझौते’ की मेज पर आए।
- राजस्व की हानि: जब नक्शा समय पर पास नहीं होता, तो भवन स्वामी बिना नक्शे के निर्माण शुरू कर देता है। इससे प्राधिकरण को मिलने वाला ‘विकास शुल्क’ और ‘भवन परमिट शुल्क’ लटक जाता है, जिससे सरकारी राजस्व को करोड़ों की क्षति हो रही है।
विभागीय जिम्मेदार केवल नोटिस देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं, जबकि धरातल पर अवैध निर्माण धड़ल्ले से जारी हैं।
प्रतिनियुक्ति के भरोसे विकास की गाड़ी
BDA की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ तकनीकी विशेषज्ञों की भारी कमी है। वर्तमान में पीडब्ल्यूडी (PWD) और सिंचाई विभाग के जेई (JE) प्रतिनियुक्ति पर प्राधिकरण का काम संभाल रहे हैं। दूसरे विभागों से उधार लिए गए इन इंजीनियरों की निष्ठा और कार्यक्षमता पर सवाल उठना लाजिमी है। जब मुख्य विभाग के पास खुद का मजबूत ढांचा ही नहीं है, तो शहर का ‘मास्टर प्लान’ कैसे सफल होगा?
महायोजना-2031: उम्मीद कम, भ्रम ज्यादा
महायोजना-2031 के तहत प्राधिकरण का दायरा 51 वर्ग किमी से बढ़ाकर 151.50 वर्ग किमी कर दिया गया है, जिसमें 217 गांव शामिल हैं। लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि इन गांवों के निवासियों को योजना के स्वरूप की जानकारी तक नहीं है। मास्टर प्लान के नाम पर केवल मानचित्र खींचे गए हैं, बुनियादी सुविधाओं (सड़क, नाली, लाइट) का विस्तार आज भी मालवीय रोड और कंपनीबाग जैसे कुछ पुराने इलाकों तक ही सीमित है।
‘उधार’ के इंजीनियरों के भरोसे महायोजना-2031
किसी भी विकास प्राधिकरण की रीढ़ उसके अवर अभियंता (JE) और सहायक अभियंता (AE) होते हैं। लेकिन BDA की हालत यह है कि इसके पास अपना पर्याप्त तकनीकी स्टाफ ही नहीं है।
- विभागीय विफलता: पीडब्ल्यूडी और सिंचाई विभाग से आए इंजीनियरों के सहारे प्राधिकरण चल रहा है।
- प्रभाव: इन इंजीनियरों का मूल विभाग दूसरा होने के कारण न तो इनकी जवाबदेही तय हो पाती है और न ही ये पूरी तत्परता से जांच रिपोर्ट लगाते हैं। नतीजा यह होता है कि नक्शा पास करवाने के लिए आम आदमी को इन ‘साहबों’ के चक्कर काटने पड़ते हैं।
सीलिंग की कार्रवाई ठप: रसूखदारों को अभयदान?
चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान में सीलिंग की कार्रवाई पूरी तरह ठप है। जो निर्माण अवैध घोषित होने चाहिए, वे अधिकारियों की “अनदेखी” के चलते पूरे हो रहे हैं। सांख्यिकी विभाग की रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि जवाबदेही तय करने का समय आ गया है।
नोटिस की राजनीति और सीलिंग का डर
- 50 से अधिक भू-स्वामियों को नोटिस देना प्राधिकरण की अपनी नाकामी को छिपाने का एक तरीका प्रतीत होता है।
- दोहरा मापदंड: एक तरफ रसूखदारों के बड़े-बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बिना बाधा के खड़े हो जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ छोटा घर बनाने वाले को नोटिस थमा दिया जाता है।
- ठप पड़ी कार्रवाई: सीलिंग की कार्रवाई का ठप होना यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं पर्दे के पीछे ‘सौदेबाजी’ चल रही है।
217 गाँवों का भविष्य अंधकार में?
महायोजना-2031 के तहत प्राधिकरण की सीमा में 217 गाँवों को शामिल कर इसका क्षेत्रफल 151.50 वर्ग किमी कर दिया गया है।
- कागजी विकास: सीमा विस्तार तो कर दिया गया, लेकिन क्या इन गाँवों में बुनियादी ढांचा पहुँचा? आज भी सड़कों का जाल, जल निकासी और स्ट्रीट लाइटें केवल वीआईपी इलाकों (मालवीय रोड, कंपनीबाग) तक सीमित हैं।
- भ्रम की स्थिति: गाँवों के किसान और छोटे भू-स्वामी इस भ्रम में हैं कि उनकी जमीन का लैंड यूज (Land Use) क्या है। इस स्पष्टता के अभाव में अवैध कॉलोनाइजर सक्रिय हैं और भोली-भाली जनता को ठग रहे हैं।
समीक्षात्मक निष्कर्ष : बस्ती विकास प्राधिकरण वर्तमान में केवल ‘नोटिस और खानापूर्ति’ का केंद्र बनकर रह गया है। ले-आउट और नक्शा पास करने में हो रही देरी न केवल भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है, बल्कि आम जनता के मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न का कारण भी बन रही है। यदि शासन स्तर से इसकी गहन जांच नहीं हुई, तो महायोजना-2031 केवल फाइलों में दफन होकर रह जाएगी और बस्ती का विकास एक ‘दुस्वप्न’ बनकर रह जाएगा।














