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लखनऊ। वर्दी की शर्मनाक ‘डीलिंग’: मासूम का पैर कटा, पुलिस ने बस भगाई!

हेरिटेज ज़ोन में 'खून' का खेल: आरटीओ और पुलिस की चुप्पी ने छीना बच्ची का बचपन। खाकी की 'जुगलबंदी' या कानून का कत्ल? मासूम को कुचलने वाली बस को पुलिस ने खुद सुरक्षित निकाला।

अजीत मिश्रा (खोजी)

हेरिटेज ज़ोन में ‘खून’ से रंगा अवैध बस अड्डा: मासूम का पैर कटा, खाकी ने निभाई ‘वफादारी’

ब्यूरो रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश।

  • लखनऊ बना डग्गामारों का ‘अड्डा’: क्या विभाग को मासूम के खून के छींटों का इंतज़ार था?
  • विरासत के साये में ‘वसूली’ का तंत्र; अवैध बस अड्डों की भेंट चढ़ी एक मासूम की जिंदगी।
  • अंधा प्रशासन, बहरी पुलिस: हेरिटेज ज़ोन में मासूम की चीख के आगे ‘डीलिंग’ जीती!
  • साहब! मासूम का पैर कट गया, पर आपकी जेब तो भर गई न?
  • खून से सनी लखनऊ की सड़कें: अवैध बसों के पहियों ने कुचला एक परिवार का सपना।
  • फरार ड्राइवर, मददगार पुलिस: राजधानी में इंसाफ नहीं, रसूख का पहिया घूम रहा है।

लखनऊ। नवाबों के शहर की ऐतिहासिक विरासत (हेरिटेज ज़ोन) अब मासूमों के खून से नहलाई जा रही है। प्रशासन की नाक के नीचे फल-फूल रहे अवैध बस अड्डों ने आज एक हंसती-खेलती जिंदगी को बैसाखी थमा दी। एक बेलगाम प्राइवेट बस ने मासूम बच्ची को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे उसका पैर कट गया। लेकिन इस हादसे से भी ज्यादा शर्मनाक रही लखनऊ पुलिस की भूमिका, जिसने आरोपी को पकड़ने के बजाय ‘साक्ष्य मिटाने’ और ‘सेटिंग’ करने में ज्यादा फुर्ती दिखाई।

हादसा या प्रशासनिक हत्या?

​राजधानी का हेरिटेज ज़ोन, जिसे पर्यटन और खूबसूरती के लिए जाना जाना चाहिए, आज डग्गामार बसों का चारागाह बन चुका है। क्षेत्रीय थाना, आरटीओ और परिवहन विभाग की ‘त्रिमूर्ति’ की छत्रछाया में ये अवैध बस अड्डे सड़कों को निगल रहे हैं। आज हुआ हादसा कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि उन जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत का नतीजा है जिनकी जेबें इन अवैध अड्डों की कमाई से गरम होती हैं।

पुलिस की ‘दरियादिली’: आरोपी को भगाया, बस को ठिकाने लगाया?

​प्रत्यक्षदर्शियों के आरोप रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। बताया जा रहा है कि हादसे के तुरंत बाद असली आरोपी ड्राइवर मौके से फरार हो गया। कायदे से पुलिस को बस जब्त कर वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने चाहिए थे, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने अपनी ‘खास डीलिंग’ का परिचय देते हुए आनन-फानन में दूसरे ड्राइवर को बुलाकर बस को मौके से हटवा दिया।

बड़ा सवाल: आखिर पुलिस को बस हटवाने की इतनी जल्दी क्यों थी? क्या यह आरोपी को बचाने और रसूखदार बस मालिकों को क्लीन चिट दिलाने की पटकथा थी?

 

विरासत के साये में ‘डीलिंग’ का काला खेल

​हेरिटेज ज़ोन में परिंदा भी पर नहीं मार सकता, तो फिर ये विशालकाय बसें यहाँ किसके आदेश पर खड़ी हो रही हैं? क्या विभाग वाकई ‘बेखबर’ है या फिर ‘महीने’ की फिक्स रकम ने उनकी आंखों पर पट्टी बांध दी है? जनता के बीच चर्चा आम है कि यह सब कुछ एक सोची-समझी ‘डीलिंग’ के तहत चल रहा है।

जनता मांग रही जवाब

​मासूम का कटा हुआ पैर प्रशासन की संवेदनहीनता पर एक गहरा घाव है। लखनऊ की जनता आज इन सवालों का जवाब चाहती है:

  • ​अवैध बस अड्डों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • ​दोषी ड्राइवर के बजाय बस बचाने में जुटी पुलिस पर कार्रवाई कब होगी?
  • ​क्या मासूम के खून की कीमत भी किसी ‘डीलिंग’ का हिस्सा बन जाएगी?

​प्रशासन अब चाहे जितनी लीपापोती कर ले, लेकिन सड़क पर बिखरा वह खून चीख-चीख कर कह रहा है कि लखनऊ की सड़कों पर कानून का नहीं, बल्कि ‘अवैध वसूली’ का राज चल रहा है।

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