
अजीत मिश्रा (खोजी)
प्रशासन की ‘मदहोशी’ या राजस्व का लालच? महुली में शराबियों के आतंक के बीच घुट रही आधी आबादी!
- “राजस्व के लालच में ‘अंधा’ हुआ विभाग, अधिवक्ता की दर्जनों शिकायतों के बाद भी कार्रवाई शून्य।”
- “सावधान! महुली में सड़क पर चलना दूभर, सरेआम फब्तियां कसते हैं शराब के शौकीन।”
- “अधिवक्ता सविता त्रिपाठी का हल्लाबोल: क्या आबकारी इंस्पेक्टर को बस 2.50 करोड़ का राजस्व दिखता है?”
- “प्रशासन की लापरवाही कहीं पड़ न जाए भारी: शराब दुकान को लेकर महुली में जन-आक्रोश चरम पर।”
- “महुली शराब कांड: प्रशासन की ‘मदहोशी’ बनाम आधी आबादी का संघर्ष”
- “सरकारी शराब दुकान, निजी असुरक्षा: महुली की सड़कों पर खौफ का माहौल”
- “न्याय की गुहार: राज्यपाल की चौखट तक पहुंची महुली की व्यथा”
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश
संतकबीरनगर/महुली। उत्तर प्रदेश में एक तरफ नारी शक्ति के सम्मान के दावे किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ संतकबीरनगर के महुली में सरकारी संरक्षण में फल-फूल रहा शराब का अड्डा मासूम बच्चियों और महिलाओं की अस्मत के लिए खतरा बन गया है। तहसील धनघटा के महुली खास में स्थित देशी व अंग्रेजी शराब की दुकान अब केवल दुकान नहीं, बल्कि असामाजिक तत्वों का गढ़ बन चुकी है, जहाँ प्रशासन की नाक के नीचे कानून की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं।
वकील की गुहार, प्रशासन बेजार
स्थानीय निवासी और पेशे से अधिवक्ता सविता त्रिपाठी ने मोर्चा खोलते हुए सीधे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को पत्र लिखकर इस काले साम्राज्य का कच्चा चिट्ठा खोला है। उनका आरोप है कि बस्ती-नाथनगर मुख्य मार्ग पर स्थित इस दुकान के बाहर सुबह 8:00 बजे से ही शराबियों का हुजूम उमड़ पड़ता है। खुलेआम मांस, अंडा और चखने की दुकानों के बीच खड़ी महिलाएं और स्कूल जाती बच्चियां इन शराबियों की फब्तियों और अश्लील इशारों का शिकार हो रही हैं।
“2.50 करोड़ का राजस्व प्यारा है, जनता की सुरक्षा नहीं”
लेख में सबसे तीखा प्रहार आबकारी विभाग पर किया गया है। सविता त्रिपाठी का आरोप है कि जब उन्होंने इस समस्या को लेकर आबकारी इंस्पेक्टर से शिकायत की, तो उन्हें कार्रवाई के बजाय ‘राजस्व का गणित’ समझाया गया। अधिकारी का तर्क है कि इस दुकान से सरकार को 2.50 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है।
सवाल यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार के लिए चंद करोड़ों का राजस्व बेटियों की गरिमा से बड़ा है? क्या आबकारी विभाग ने शराबियों को महिलाओं के साथ अभद्रता करने का लाइसेंस दे रखा है?
तारीखों के जाल में उलझा न्याय
अधिवक्ता ने अपने शिकायती पत्र में उन तमाम तारीखों का उल्लेख किया है (17.01.26, 07.02.26, 21.02.26, 27.02.26, 27.03.26 और 23.03.26), जब उन्होंने समाधान दिवस और प्रशासनिक अधिकारियों के चौखट पर दस्तक दी। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। शासन-प्रशासन की यह चुप्पी किसी बड़ी अनहोनी को न्यौता दे रही है।
चेतावनी: उग्र हो सकती है जनता
पत्र के अंत में अधिवक्ता ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि इस दुकान को तत्काल आबादी वाले क्षेत्र से हटाकर कहीं और स्थानांतरित नहीं किया गया, तो वहां की जनता का धैर्य जवाब दे सकता है। आक्रोशित जनता कभी भी सड़कों पर उतर सकती है और किसी भी कानून-व्यवस्था की स्थिति की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
इस गंभीर मामले की प्रतियाँ मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव, और आबकारी आयुक्त को भी भेजी गई हैं। अब देखना यह है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करने वाली सरकार इन शराबियों और मूकदर्शक बने अधिकारियों पर क्या हंटर चलाती है।



















