
समीर वानखेड़े ब्यूरो चीफ:
देश में चीनी के दामों में हो रही बढ़ोतरी का इथेनॉल उत्पादन से कोई संबंध नहीं है। यह आरोप कि इथेनॉल के लिए चीनी डायवर्ट करने से दाम बढ़े हैं, पूरी तरह से गलत प्रचार है। राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ ने यह सफाई दी है।
महासंघ के अनुसार कुल इथेनॉल सप्लाई में चीनी क्षेत्र का योगदान 86% से घटकर सिर्फ 28% रह गया है। इसलिए यह कहना कि इथेनॉल के कारण चीनी महंगी हुई है, तथ्यों से परे है।
साथ ही महासंघ ने केंद्र सरकार के 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात के फैसले को मौजूदा हालात में सही बताया और इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार को पूरा समर्थन देने का ऐलान किया।
महासंघ के अध्यक्ष ने कहा –
“चीनी की कीमतों को वाजवी स्तर पर लाने के लिए केंद्र सरकार ने व्यापारियों और थोक खरीदारों पर स्टॉक लिमिट लगाना, फैक्ट्रियों में असल स्टॉक की जांच करना और 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति जैसे कदम उठाए हैं। इन फैसलों को सही तरीके से लागू करने के लिए राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना महासंघ भारत सरकार के साथ मजबूती से खड़ा है।”
उन्होंने आगे कहा कि इथेनॉल ब्लेंडिंग राष्ट्रीय प्राथमिकता और गन्ना किसानों के हित का दीर्घकालीन कार्यक्रम है। इस सेक्टर में भारी निवेश हुआ है, लेकिन पिछले चार साल से इथेनॉल के खरीद दाम स्थिर हैं। गन्ने के बढ़े हुए दाम और लागत को देखते हुए इथेनॉल के रेट बढ़ाए जाने चाहिए।
चीनी मिलों को हो रहा है घाटा
महासंघ ने बताया कि इस सीजन में सहकारी चीनी मिलों को चीनी का औसत बिक्री भाव लगभग *40 रुपये प्रति किलो मिला है, जबकि उत्पादन लागत 43 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यानी मिलों को लागत से भी कम दाम पर चीनी बेचनी पड़ रही है।
त्योहारी मांग को पूरा करने के लिए अगर राज्य सरकारें अनुमति दें तो सहकारी मिलें 15 अक्टूबर तक पेराई सीजन शुरू करने की कोशिश करेंगी। लेकिन जल्दी पेराई शुरू करने से चीनी की रिकवरी 2 से 3% घट जाती है, जिससे मिलों को बड़ा आर्थिक नुकसान होता है। इसलिए महासंघ ने मांग की है कि इस नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार करे और अक्टूबर-नवंबर में उत्पादित और बेची जाने वाली चीनी पर GST माफ किया जाए।










