
*सिख धर्म के सुनहरी इतिहास के झरोखे से।*
सिख धर्म के चौथे गुरु, अमृतसर शहर के संस्थापक *”सोढी सुल्तान श्री गुरु रामदास साहिब महाराज जी के 490वें प्रकाश पुरब(19 अक्टूबर)* पर विशेष।
साहिब श्री गुरु रामदास महाराज जी का जन्म 1534 को चूना मंडी लाहौर पंजाब(अब पाकिस्तान) में भाई हरि दास जी के गृह माता दया कौर जी के कोख से हुआ, घर में सबसे बड़ी संतान होने के कारण माता पिता ने आपका नाम बहुत प्यार से जेठा रखा, होनी बलवान होती है कि जब आप 7 साल के हुए तो आप के सिर से माताजी का साया उठ गया और जल्दी ही पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया, सगे संबंधियों ने मुंह फेर लिया, शहर लाहौर में भी किसी ने मदद नहीं की इस पर आपके नानी जी आपको पंजाब के जिला अमृतसर के गांव बासरके ले आए, नानी जी की आर्थिक रूप से गरीब थे जिस कारण आप जी के सिर अपने छोटे भाई बहन के पालन पोषण का भार पड़ गया, आप चढ़दी कला के मूरत थे, आपने हौंसला नहीं हारा बल्कि घुंगणियां (पंजाबी व्यंजन) बेचने का कार्य करने लगे परंतु किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।
1546 ई. को आप सिख धर्म के तीसरे गुरु साहिब श्री गुरु अमरदास साहिब महाराज जी दर्शन करने गोइंदवाल साहिब आए और बस वहीं के होकर रह गए।
गोइंदवाल साहिब में श्री गुरु अमरदास साहिब महाराज जी के स्नेह और हमदर्दी ने जेठा जी को गुरुमत के साथ जोड़ने में गहरा असर डाला, जिससे जेठा जी ने अपने जीवन का हर पल गुरु उपदेश अनुसार डाल कर करीब 40 साल की आयु तक पूरी निष्ठा के साथ गुरु घर की सेवा की और श्री गुरु नानक देव साहिब महाराज जी की गद्दी पर चौथे गुरु रूप में विराजमान हुए।
इतिहासकारों के अनुसार एक दिन श्री गुरु अमरदास साहिब महाराज जी अपनी सुपुत्री बीबी भानी जी के रिश्ते बारे विचार कर रहे थे तभी जेठा जी जो उस समय मिट्टी ईंटें उठाने की सेवा में लगे हुए थे, उन्हें देख गुरु अमरदास साहिब महाराज जी के महल(धर्मपत्नी) माता मनसा देवी जी सहज स्वभाव कह दिया कि भानी के लिए जेठा जैसा वर होना चाहिए, इसपर गुरु साहिब जी ने फरमाया “ऐसा ही होगा” और जेठा जी का विवाह बीबी भानी जी के साथ कर दिया।
*स्वभाव और परीक्षा:-*
श्री गुरु रामदास साहिब जी बहुत ही मदृभाषी थे, नम्रता, दया, प्रेम एवं उदारता के गुणों से भरपूर थे, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण श्री गुरु अमरदास जी द्वारा ली गई परीक्षा के समय मिलता है, उन दिनों गुरु साहिब गोइंदवाल साहिब में बावड़ी का निर्माण करवा रहे थे, बावड़ी के निर्माण कार्य को देखने के लिए एक चबूतरा बनाने के लिए कहा, गुरु साहिब जी ने अपने बड़े दामाद भाई रामा जी तथा छोटे दामाद भाई जेठा जी को चबूतरा बनाने के लिए कहा चबूतरे तैयार होने पर गुरु साहिब जी दोनों चबूतरों को तोड़ देते, बार बार चबूतरों को तोड़ देने पर भाई रामा जी को क्रोध आकर बोले कि गुरु जी बुढ़ापे के कारण बौरा गए हैं परंतु भाई जेठा जी ने नम्रतापूर्वक कहा कि “मैं तो अंजान हूँ, भूलनहार हूँ, पर आप तो दयालु हो कृपालु हो, बार बार मेरी भूलों को बख्श देते हो, यह मेरी अज्ञानता है कि जो आप मुझे समझाते हैं, वह मैं अच्छी तरह से समझ नहीं पा रहा। इसी तरह इतिहास में से एक और प्रमाण मिलता है कि जब आप गुरु गद्दी पर विराजमान थे तो श्री गुरु नानक देव साहिब जी के ज्येष्ठ सुपुत्र “बाबा श्री चंद जी” के अमृतसर आगमन पर श्री गुरु रामदास साहिब जी उनके दर्शन करने आए तो बाबा श्री चंद जी आप से पूछा कि इतनी लंबी दाढ़ी क्यों रखी है, इसपर गुरु साहिब जी ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया कि “आप जैसे महापुरुषों के चरण साफ करने के लिए” बाबा श्री चंद जी मुस्कुराते हुए बोले कि ” तुम्हारे बारे में जो सुना था वह आज प्रत्यक्ष रूप से देख लिया।
श्री गुरु अमरदास साहिब जी के दामाद होते हुए भी गुरु घर की सेवा किसी भी प्रकार की ढील नहीं दी, रिश्ते की परवाह किए बिना कीचड़ की भरी टोकरी सिर पर उठा लेते थे, ऐसा देख एक दिन श्री गुरु अमरदास साहिब जी के बचन कर दिए, यह कीचड़ भरी टोकरी नहीं बल्कि *”गुरु गद्दी का छत्र है”*
*बेपरवाह और धन से स्वाधीन:-*
श्री गुरु रामदास साहिब जी को धन दौलत का रति भर भी मोह नहीं था, बल्कि गरीबों की सहायता दिल खोल कर करते थे, इतिहास के अनुसार एक जगत राम नामक एक सेठ ने गुरु साहिब जी को एक बहुमूल्य कंठहार भेंट किया, आपने उसी समय किसी जरूरतमंद को दे दी, एक महिला ने बहुत चाव से एक मोतियों की माला भेंट की आपने रास्ते में बैठे एक मलंग को दे दी, मुगल बादशाह अकबर जब दर्शन करने आया तो अपने साथ मोहरें और रसद लेकर आया और गुरु साहिब जी को भेंट कर दी, गुरु साहिब जी ने रसद गरीब परिवारों को दे दी और मोहरें जरूरतमंद लोगों में बांट दी।
*साहित्यकार तथा संगीत प्रेमी:-*
छोटी उम्र में पढ़ने लिखने और खेलने की चाह पूरी नहीं हो सकी पर जब भी समय मिलता रहा आप बहुत शिद्दत से सेवा के साथ साथ गुरु दरबार में हाजरी भरते और संगीत कला को मन लगा कर सीखते, आपकी बाणी में एक महान साहित्यकार, संगीत प्रेमी तथा राग कला की बारीकियां प्रकट होती हैं, आप रागों में इतने माहिर थे कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में उपयोग किये गए 31 रागों में से 30 रागों आपकी बाणी दर्ज है, सिख धर्म के *अनंद कारज* (विवाह) की बाणी सुही राग में *लावां* भी आपने उचारी है, इस बाणी में गृहस्थ जीवन की महानता, पति पत्नी की बराबरी, एक दूसरे का सत्कार एवं कुर्बानी का आदर्श पेश किया गया है।
*नगर का निर्माण:-*
1570 ई. में श्री गुरु अमरदास साहिब जी ने अपने जीवित रहते हुए *”गुरु का चक”* नाम का नगर बसाना शुरू कर दिया था, यही नगर बाद में *”रामदासपुर”* तथा *”अमृतसर”* कहलाया, जिसमें श्री गुरु रामदास साहिब जी ने *अमृतसर* तथा *संतोखसर* सरोवरों का निर्माण किया, तथा नगर के निर्माण कार्य अलग अलग बाजार अपनी निगरानी में बनवाए ताकि गरीब मेहनतकश लोग यहां आ कर बसें, 52 अलग अलग पेशे के कारीगरों को नगर में बसाया।
एक अनाथ बालक के द्वारा बसाया गया शहर जो आज *”गुरु की नगरी”* के नाम से प्रसिद्ध है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इस शहर में रात को कोई इंसान या पशु पक्षी भूखा नहीं सोता, यह एक चमत्कार नहीं है तो क्या है। गुरबाणी का फरमान है “धन धन रामदास गुर, जिनि सीरिया तिने सवारिया।। (धन्य है गुरु रामदास जी, जिसने भी दिल से याद किया वह संवर गया, निखर गया।।
MANAS Mishra







