
सागर। वंदे भारत लाईव टीवी न्यूज रिपोर्टर सुशील द्विवेदी ,8225072664- “जी का जनजाल” नेता जी का जन्मदिन
हर साल की तरह इस बार भी हमारे क्षेत्र के वरिष्ठतम, सबसे अनुभवी, सबसे वरिष्ठ और सबसे खुद को ‘जनप्रिय’ मानने वाले नेता जी का जन्मदिन आया। अब जन्मदिन आना तो सामान्य बात है, पर जब नेता जी का हो, तो यह राष्ट्रीय त्योहार जैसा महसूस होता है — कम से कम उनके चेले-चपाटियों के लिए।
सुबह होते ही पूरे शहर की दीवारें पोस्टरों से रंग दी गईं — “माननीय नेता जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।” कहीं-कहीं तो यह भी लिखा था — “देश की धड़कन, जनता के मसीहा, राजनीति के सूर्यपुत्र को शत-शत नमन।”
बगल में नेता जी की तस्वीर — जिसमें वे कुछ अधिक ही फ़ोटोशॉप्ड लग रहे थे। बाल काले, दाँत सफेद, और चेहरे पर वह ‘पढ़े-लिखे’ मुस्कान जिसे देखकर आम जनता को शक होता है कि कहीं बिजली का बिल तो नहीं बढ़ने वाला।
अब जन्मदिन है तो कार्यक्रम भी होंगे। पहले तो नेता जी ने एक वृद्धाश्रम जाकर सेल्फी सेवा की। बुजुर्गों को केक नहीं, उनके साथ फोटो खिंचवाना ज़रूरी समझा गया। फिर एक स्कूल में जाकर बच्चों को “सपनों के महत्व” पर भाषण दे डाला — खुद भले कभी स्कूल का मुँह ठीक से न देखा हो, पर मंच से ज्ञान बाँटना कोई इनसे सीखे।
इसके बाद असली तमाशा शुरू हुआ — जनता को धन्यवाद देने की रैली।
नेता जी ने खुद को जनता का सेवक बताते हुए 5 किलोमीटर लंबा रोड शो किया। गाड़ियाँ, बैंड-बाजा, ढोल-ताशे, गुलाब की पंखुड़ियों की बारिश — ऐसा लगा मानो कोई राजा सिंहासन पर बैठने वाला हो।
आम जनता को क्या मिला? ट्रैफिक जाम, धूल, शोर, और नेताजी की गाड़ी निकलने तक इंतज़ार। एक ऑटो वाला बुदबुदा रहा था —
“ये नेता लोग जनता के नाम पर ही जनता की नाक में दम कर देते हैं।”
नेता जी की पार्टी के कार्यकर्ता एक-दूसरे को फूलों की माला पहना रहे थे। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपने नेता के जन्मदिन पर 21 किलो लड्डू बाँटे थे — और 500 फोटो फेसबुक पर डाले थे। हर कैप्शन में था:
“आज नेता जी के जन्मदिवस पर फलां जगह फलां सेवा।”
सेवा कितनी हुई, पता नहीं। पर फोटो खूब चमकी।
शाम को एक विशाल ‘सांस्कृतिक कार्यक्रम’ रखा गया, जिसमें स्थानीय कलाकारों को मंच से नीचे बिठाकर, बाहर के DJ और बॉलीवुड डांसरों को बुलाया गया। जनता को कहा गया — “ये संस्कृति है, इसे अपनाओ।”
बुजुर्ग महिला ने सवाल पूछ लिया —
“बेटा, ये संस्कृति है या सस्ती नकल?”
जवाब आया — “दादी जी, समय के साथ बदलना पड़ता है।”
दादी जी ने चैनल बदल दिया।
रात को सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा था — #HappyBirthdayNetaji
सब फोटो, भाषण, फूल और नारेबाज़ी में डूबे थे।
सिर्फ़ एक चीज़ ग़ायब थी — जनता की असली मुस्कान।
और मैं सोच रहा था —
“ये जन्मदिन है या जनतंत्र का जलसा?
या फिर नेता जी की लोकप्रियता की लाठी में लिपटी हुई लोलीपॉप?”
कुल मिलाकर नेता जी का जन्मदिन ‘जनता’ के लिए नहीं, जन-जाल साबित हुआ।
सच कहा जाए —
“जनता के नाम पर ही सबसे ज़्यादा जंजाल जनता पर ही टूटता है!”









